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यूकेडी की अंदरूनी कलह से तीसरी ताकत बनने की उम्मीद को झटका

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posted on : सितम्बर 9, 2026 11:11 अपराह्न

गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले तीसरी ताकत के रूप में उभरने की कोशिश कर रही उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती उसके भीतर चल रहा विवाद बन गया है। एक तरफ पार्टी भू-कानून, मूल निवास, पलायन, रोजगार और गैरसैंण जैसे मुद्दों को लेकर राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटी है, वहीं दूसरी ओर नेतृत्व और संगठनात्मक फैसलों को लेकर सामने आ रहे विवाद पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

यूकेडी में हाल के महीनों में केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों को लेकर विवाद खुलकर सामने आया है। केंद्रीय उपाध्यक्ष रहे आशुतोष नेगी को पहले संगठनात्मक जिम्मेदारियों से मुक्त किया गया और बाद में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासन की कार्रवाई की गई। इसके अलावा राकेश ध्यानी के खिलाफ भी संगठनात्मक कार्रवाई हुई। इन कार्रवाइयों के बाद पार्टी के भीतर असहमति और नेतृत्व को लेकर सवालों की चर्चा तेज हुई।

विवाद यहीं नहीं थमा। अगस्त के अंत में पार्टी के भीतर चल रही खींचतान के बीच केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती से जुड़ी एक कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आने की रिपोर्टों ने नेतृत्व की कार्यप्रणाली और निर्णय प्रक्रिया को लेकर चर्चाओं को और हवा दी। हालांकि ऑडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इससे पार्टी के अंदर चल रहे मतभेद सार्वजनिक बहस का विषय जरूर बन गए।

सितंबर की शुरुआत में 2027 विधानसभा चुनाव के लिए 36 सीटों से जुड़ी एक कथित सूची सामने आने के बाद भी विवाद बढ़ा। रिपोर्ट के अनुसार इस सूची में पार्टी से निष्कासित आशुतोष नेगी का नाम भी शामिल था। इससे उम्मीदवार चयन और संगठन के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे हैं।

राजनीतिक तौर पर यूकेडी के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी के पास इस समय अपने पुराने क्षेत्रीय मुद्दों के जरिए राजनीतिक स्पेस बनाने का मौका है। भू-कानून, मूल निवास, पलायन, पहाड़ में रोजगार और गैरसैंण जैसे मुद्दों पर जनता के बीच बहस है। भाजपा और कांग्रेस से अलग विकल्प तलाश रहे मतदाताओं का एक वर्ग यूकेडी की ओर देख सकता है। लेकिन यही संभावित वोट बैंक पार्टी की अंदरूनी खींचतान से बिखरने का खतरा भी है। यदि संगठन में अलग-अलग गुट सक्रिय रहे, नेतृत्व को लेकर विवाद जारी रहा और टिकट वितरण को लेकर असहमति सामने आती रही तो क्षेत्रीय वोटों को एक मंच पर लाना मुश्किल होगा। इसका सीधा फायदा भाजपा और कांग्रेस को मिल सकता है।

यूकेडी के सामने इस समय केवल उम्मीदवार खड़े करने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह तय करना भी जरूरी है कि पार्टी चुनाव में किस नेतृत्व और किस रणनीति के साथ उतरेगी। संभावित उम्मीदवारों की सूचियों और संगठनात्मक फैसलों को लेकर बार-बार उठते विवाद यह संकेत दे रहे हैं कि चुनावी तैयारी के साथ पार्टी को अपने भीतर की असहमति भी सुलझानी होगी।

यदि यूकेडी अपने विवादों को खत्म कर एकजुट नेतृत्व के साथ मैदान में उतरती है तो क्षेत्रीय मुद्दों के सहारे कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय बनाने की स्थिति पैदा हो सकती है। कुछ सीटों पर मजबूत प्रदर्शन और कई सीटों पर निर्णायक वोट हासिल कर पार्टी विधानसभा में किंगमेकर की भूमिका भी तलाश सकती है। इसके उलट यदि अंदरूनी खींचतान चुनाव तक जारी रही तो भाजपा और कांग्रेस विरोधी क्षेत्रीय वोट कई हिस्सों में बंट सकता है। ऐसे में यूकेडी के सामने तीसरी ताकत बनने के बजाय अपने ही संभावित जनाधार को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो जाएगी।

2027 का चुनाव यूकेडी के लिए राजनीतिक वापसी का बड़ा अवसर है, लेकिन उससे पहले पार्टी को अपने घर की लड़ाई खत्म करनी होगी। क्षेत्रीय मुद्दे उसके पास हैं, राजनीतिक जमीन भी बन रही है, लेकिन संगठन एकजुट नहीं हुआ तो तीसरी ताकत बनने की संभावना फिर अंदरूनी कलह की भेंट चढ़ सकती है।

 

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