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जंगल की आग से वन्य जीव कर रहे गांव की ओर रूख 

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posted on : दिसम्बर 22, 2025 9:42 अपराह्न

गोपेश्वर (चमोली)। जंगलों की आग, वनो का घटता दायरे ने मानव और वन्य जीव संघर्ष की घटनाओं को बढ़ाने का कार्य किया है। इससे वन्य जीवों के स्वभाव में भी बदलाव आ रहा है। जंगलों में खाद्य श्रृंखला में गड़बड़ी तथा भोजन की कमी के चलते वन्यजीवों की आवासीय इलाकों और गांवों के आसपास सक्रियता बढ़ी है। यह अब एक गंभीर संकट का रूप लेने लगा है। यह तथ्य सीपी भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र गोपेश्वर की ओर से वनाग्नि रोकथाम और मानव एवं वन्यजीव संघर्ष शोध यात्रा के दौरान ग्रामीणों से बातचीत के दौरान उभर कर निकली।

अध्ययन दल ने यात्रा के पहले दिन गैरसैण विकास खंड के खंसर क्षेत्र के राइकोट, गडैथ, मालकोट लाटूगैर गांव में बैठक कर ग्रामीणों के साथ प्रत्यक्ष संवाद कर वनाग्नि  मानव तथा वन्यजीवों के मध्य बड़ रहे संघर्ष के कारणों पर बात की। इस दौरान ग्रामीणों ने खुलकर अपनी बात रखी। मालकोट के ग्राम प्रधान हीरा सिंह कठैत ने बताया कि, जंगलो के परिवेश और उसका ताना-बाना बिगड़ रहा है। इस कारण यह समस्या दिन प्रतिदिन बड़ती जा रही है। पहले लोगो का जंगल से प्रत्यक्ष जुड़ाव था पर हाल के वर्षों में अब जंगलो मे जाना कम हो गया है। इससे जंगलो के पारंपारिक रास्तो में झाड़ियां उग आई है जो जानवरो की शरण स्थली बन गई है। पहले महिलाए समूह में जाती थी और झाड़ियों को काट देती थी। अब लोग जानवरो के भय से झाड़ियो को जला देते हैं। इससे आग पूरे जंगल में फैल जाती हैं।

र्राइकोट की 70वर्षीय गणपति देवी नें बताया कि उनके देखने में पहले जंगली जानवर भालू, गुलदार और सुअर गांव में नहीं आते थे। जंगलों में भी आग कभी कभार ही लगती थी और जब लगती भी थी तो ग्रामीण उसे तुरंत बुझाने पंहुच जाते थे पर अब तो आग हर साल लग रही है। महेशी देवी नें बताया कि पहले जानवर शोर करने पर भग जाते थे पर अब उनके व्यवहार में आक्रमकता है। देवी देवी ने खर्को के बंजर पड़ जाने को जानवरों  का गांवों में आने का मुख्य कारण बताया। सरिता देवी ने कहा कि, आग से जंगलो का चक्र बिगड़ गया है। इससे भालू और बाघ को गांवों की ओर रुख करने के लिए मजबूर कर दिया है। कुंती देवी नें कहा कि, जंगलो में आग लगने के बाद से ही सरो, हिरण और जंगली सुअर का गांवों में आना शुरू हुआ। शिव सिंह ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि आज से चार दशक पूर्व उन्होंने गांव के जंगल में मात्र एक सुअर देखा था। पर अब उनकी इतनी टोलिया हो गई है कि उन्हें अपनी फसल को बचाना एक चुनौती हो गई है।

लाटूगैर की अस्सी वर्षीय वृद्धा काशी देवी बताया कि उन्होंने अपने जीवन में जंगलो मै हो रहे परिवर्तन को प्रत्यक्ष अनुभव किया है। पहले आग की घटनाए वर्षों में कभी कभी देखने को मिलती थी। भालू भी जंगलो में कभी कभी ही दिखता था, महिलाओ का टोलियों मै होने के कारण वो देख कर भग जाता था। गुलदार पालतू मवेशी को निवाला बनता था पर जंगल में ही। उन्होंने बताया की पहले रामगंगा का प्रवाह भी काफी तीव्र और उसमे पानी भी काफी रहता था पर अब वो भी धीरे धीरे बहुत कम हो रहा है जो चिंता का विषय है। शोध एवं जन-जागरूकता अभियान में सीपी भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र के प्रबंध न्यासी ओम प्रकाश भट्ट, मंगला कोठियाल, विनय सेमवाल, वन विभाग के वन दरोगा सरिता नेगी, वन दरोगा जंगम सिंह, स्थानीय पुलिस चौकी मैथान के हेड कास्टेबल धनपाल सिंह, होमगार्ड धन सिंह फायर सर्विस गैरसैंण के प्रभारी शौकीन सिंह रमोला , धर्मेंद्र सिंह कंडारी के साथ ही वन दरोगा सरोप सिंह वन बीट अधिकारी विनय सिंह नेगी, सतीश कुमार, वन दरोगा विनोद कुमार, मोहित शुक्ला, सूरज सिंह नेगी आदि मौजूद रहे।

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