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मसूरी गोलीकांड : दो सितंबर 1994 को शहादत ने दी थी राज्य निर्माण आंदोलन को नई धार

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posted on : सितम्बर 5, 2026 1:17 पूर्वाह्न

मसूरी। दो सितंबर 1994 का दिन उत्तराखंड के इतिहास में एक दर्दनाक और निर्णायक अध्याय के रूप में दर्ज है। पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के दौरान मसूरी में हुई पुलिस फायरिंग ने पूरे पर्वतीय क्षेत्र को झकझोर दिया था। इस गोलीकांड में छह आंदोलनकारियों और तत्कालीन डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी की मौत हुई थी। हर वर्ष दो सितंबर को शहीदों की स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित कर उनके बलिदान को याद किया जाता है।

खटीमा गोलीकांड के बाद मसूरी में भड़का आक्रोश

एक सितंबर 1994 को खटीमा में आंदोलनकारियों पर हुई पुलिस फायरिंग की खबर जब मसूरी पहुंची तो आंदोलनकारियों में आक्रोश फैल गया। इसके विरोध में उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति ने मसूरी बंद का आह्वान किया। आंदोलनकारियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन शुरू किया, लेकिन धीरे-धीरे स्थिति तनावपूर्ण होती चली गई।

प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कार्रवाई की और 46 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। गिरफ्तार किए गए लोगों में संघर्ष समिति के अध्यक्ष हुक्म सिंह पंवार भी शामिल थे। इसके अगले दिन यानी दो सितंबर को झूलाघर क्षेत्र में पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच तनाव और बढ़ गया।

झूलाघर में बढ़ा तनाव, चलीं गोलियां

दो सितंबर को झूलाघर क्षेत्र में आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई। देखते ही देखते माहौल हिंसक हो गया और पुलिस की ओर से फायरिंग की गई। इस घटना में राय सिंह बंगारी, मदन मोहन ममगाईं, हंसा धनाई, बेलमती चौहान, बलबीर नेगी और धनपत सिंह शहीद हो गए। घटना के दौरान डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी की भी मौत हुई। मसूरी गोलीकांड की खबर फैलते ही पूरे उत्तराखंड में आक्रोश की लहर दौड़ गई। मसूरी और देहरादून के साथ ही पर्वतीय क्षेत्रों में आंदोलन ने और जोर पकड़ लिया।

आंदोलन को मिली नई धार

मसूरी गोलीकांड ने पृथक राज्य आंदोलन को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। खटीमा और मसूरी की घटनाओं के बाद आंदोलन और अधिक व्यापक होता चला गया। पहाड़ के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन, धरने और जनसभाएं तेज हुईं। आंदोलनकारियों के बलिदान ने अलग राज्य की मांग को व्यापक जनसमर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लंबे संघर्ष और आंदोलनकारियों के बलिदान के बाद आखिरकार नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड देश के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। हालांकि, राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी आंदोलनकारियों के कई मूल सपने और अपेक्षाएं पूरी तरह साकार नहीं हो सकी हैं।

शहीदों के सपनों का उत्तराखंड आज भी सवालों के घेरे में

मसूरी शहीद स्मारक समिति के अध्यक्ष भगवान सिंह धनाई ने शहीदों के सम्मान और उनकी स्मृति को स्थायी रूप देने के लिए की गई घोषणाओं के लंबित रहने पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि शहीदों के नाम पर सड़कों और संग्रहालय के निर्माण की घोषणाओं को अब तक अपेक्षित गति नहीं मिली है। शहीद स्थल पर शेड निर्माण की मांग भी लंबित बताई गई है।

वहीं, उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति के तत्कालीन महामंत्री जयप्रकाश उत्तराखंडी का कहना है कि राज्य आंदोलन का मूल उद्देश्य केवल अलग राज्य का गठन नहीं था, बल्कि पहाड़ के लोगों के अधिकारों, रोजगार, संसाधनों और बेहतर भविष्य की व्यवस्था सुनिश्चित करना भी था। उनके अनुसार भ्रष्टाचार, भूमाफिया और बाहरी प्रभाव जैसे मुद्दों ने आंदोलन के कई मूल उद्देश्यों को पीछे धकेला है।

गैरसैंण, पलायन और भू-कानून जैसे मुद्दे अब भी प्रमुख

राज्य आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच आज भी गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने, पलायन रोकने, मूल निवास और मजबूत भू-कानून जैसे मुद्दे प्रमुख बने हुए हैं। उनका मानना है कि इन विषयों पर प्रभावी कार्रवाई ही आंदोलनकारियों के सपनों के उत्तराखंड की दिशा में वास्तविक कदम होगी।

हर वर्ष दो सितंबर को मसूरी गोलीकांड के शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है। यह दिन न केवल उन छह आंदोलनकारियों के बलिदान की याद दिलाता है, बल्कि उस संघर्ष की भी याद दिलाता है जिसने उत्तराखंड राज्य के निर्माण की नींव मजबूत की। आज शहीदों को याद करते हुए सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस उत्तराखंड के लिए आंदोलनकारियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया, क्या राज्य उस सपने के अनुरूप आगे बढ़ पाया है?

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