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हवा में घुलते जहर से बढ़ रहे अस्थमा के रोगी, एलोपैथिक के अलावा आयुष पद्धति का इलाज भी है कारगर, विश्व अस्थमा दिवस के अवसर पर एम्स के विशेषज्ञों ने दी सलाह

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posted on : मई 6, 2026 3:37 अपराह्न

ऋषिकेश : अगर आपको अस्थमा की शिकायत है तो वायु प्रदूषण वाले इलाकों में काम करने से विशेष परहेज रखिए। चिकित्सकों के अनुसार बढ़ते प्रदूषण वाले हवा मे मौजूद धूल, धुंए और अन्य तत्वों के हानिकारक कण अस्थमा के मामलों को तेजी से बढ़ाने में सहायक हैं। एम्स विशेषज्ञों के अनुसार एलोपैथिक इलाज के अलावा आयुर्वेद में भी अस्थमा का इलाज संभव है। अस्थमा के रोगियों को स्वास्थ्य में सुधार के लिए आयुष पद्धति को भी अपनाना चाहिए।

विश्व अस्थमा दिवस अस्थमा रोग के प्रति आम लोगों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से मई माह के पहले मंगलवार को मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इन कार्यक्रमों के लिए इस वर्ष की थीम ’अस्थमा से पीड़ित सभी लोगों के लिए सूजनरोधी इनहेलर की उपलब्धता – अभी भी एक अत्यावश्यक आवश्यकता’रखी गयी है। यह थीम इस बात पर जोर देती है कि अस्थमा (दमा) के मरीजों, विशेष रूप से बच्चों के लिए इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स का मिलना कितना जरूरी है, जो दौरे को रोकते हैं।

कारण- डॉक्टरों ने बढ़ते वायु प्रदूषण को अस्थमा के मामलों में तेजी से बढ़ोत्तरी का प्रमुख कारण बताया है। धुआं, धूल और पर्यावरण में मौजूद अन्य हानिकारक कण आम लोगों में सांस की बीमारियों को बढ़ा रहे हैं।

स्थिति- अस्थमा, श्वास रोगी की एक पुरानी बीमारी होती है, जिसका शत प्रतिशत इलाज संभव नहीं है, लेकिन इसे उचित उपचार से नियंत्रित किया जा सकता है।

सामान्य लक्षण – खांसी (विशेषकर रात के समय होने वाली), सांस लेने में दिक्कत, घरघराहट और सीने में जकड़न। अस्थमा एक दीर्घकालिक श्वसन रोग है, जिसमें वायुमार्ग में सूजन और संकुचन के कारण सांस लेने में कठिनाई होती है।

विशेषज्ञों की सलाह – एम्स ऋषिकेश की कार्यकारी निदेशक प्रो. मीनू सिंह ने बताया कि अस्थमा के मरीजों को इनहेलर का उपयोग करना चाहिए। यह फेफड़ों तक दवा को सीधे पहुंचाता है। उन्होंने बताया कि एलोपैथिक इन्हेलर थेरेपी, जिसको इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉयड्स अर्थात् सांस के माध्यम से लिए जाने वाले स्टेरॉयड्स के रूप में जाना जाता है, अस्थमा उपचार के लिए एक बेहतर चिकित्सा उपचार है। उन्होंने बताया कि अस्थमा रोगी धूल और धुएं से हर संभव अपना बचाव करें। खासकर वायु प्रदूषण वाले स्थानों में मास्क का इस्तेमाल करना न भूलें।

आायुष चिकित्सा पद्धति भी है कारगर

अस्थमा के उपचार तथा रोकथाम में एविडेंस-बेस्ड कॉम्प्लिमेंट्री तथा इंटीग्रेटिव मेडिसिन (साक्ष्य-आधारित पूरक एवं एकीकृत चिकित्सा) बेहतर विकल्प के रूप में उभरकर आयी है। प्रो. मीनू सिंह ने इस बारे में बताया कि आयुर्वेद, योग तथा नैचुरोपैथी में कई ऐसे परीक्षण (आरसीटी) आधारित शोध पत्र उपलब्ध हैं, जो यह दर्शाते हैं कि इन चिकित्सा पद्धतियों का उपयोग एलोपैथिक उपचार के साथ किया जाए तो अस्थमा के लक्षणों की गंभीरता में कमी आने के साथ ही जीवन की गुणवत्ता में बेहतर सुधार आता है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद में वर्णित बहु-औषधीय बूटियां जैसे अष्टांग अवलेह, व्याघ्रही, तुलसी, वासा, पिप्पली, हरिद्रा, सुंठी तथा मेथी, अस्थमा के श्वास नली में जमें बलगम को हटाने में लाभदायक हैं। इसी प्रकार पंचकर्म, जिसमें वमन, विरेचन तथा बस्ती शामिल है, भी अस्थमा उपचार में लाभदायक है। प्रो. मीनू सिंह ने बताया कि इसके साथ ही योग भी अस्थमा में फेफड़ों की क्षमता के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें सूर्यनमस्कार, गोमुखासन और धनुरासन आदि शामिल हैं। जबकि अनुलोम-विलोम, नाड़ी शोधन, भ्रामरी आदि प्राणायाम क्रियाएं भी अस्थमा में पल्मोनरी फंक्शंस के साथ-साथ सिम्प्टम सीवेरिटी को कम करते हैं।

दूषित हवा से बच्चे भी हो रहे प्रभावित

एम्स में पिडियाट्रिक पल्मोनरी विभाग की हेड और संस्थान की कार्यकारी निदेशक प्रो. मीनू सिंह ने कहा कि बढ़ते प्रदूषण की वजह से छोटे बच्चे भी सांस की बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। उन्होंने इसे चिंताजनक बताते हुए इसके लिए एजर्जी, संक्रमण और प्रदूषण को मुख्य कारण बताया। कहा कि कुछ हद तक इसके लिए जीन्स और मोटापा भी जिम्मेदार है। बताया कि प्रदूषण के कारण सांस की नली में सूजन आने से बच्चों में यह समस्या बढ़ रही है।

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सेमन्या कण्वघाटी हिन्दी पाक्षिक समाचार पत्र – www.liveskgnews.com

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