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NCERT की कक्षा 9 की किताब में पहली बार शामिल हुआ आपातकाल का अध्याय, लोकतंत्र की बड़ी चुनौती के रूप में किया गया उल्लेख

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posted on : जून 25, 2026 10:32 अपराह्न

नई दिल्ली। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने पहली बार कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में 1975-77 के आपातकाल (Emergency) को शामिल किया है। नई पाठ्यपुस्तक में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के सामने आई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया है। इसमें कहा गया है कि उस दौरान अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे, प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई थी और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भारी दबाव पड़ा था। हाल ही में तैयार की गई सामाजिक विज्ञान की पुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ में भारतीय लोकतंत्र की विशेषताओं और चुनौतियों पर आधारित अध्याय में आपातकाल का विस्तृत उल्लेख किया गया है। एनसीईआरटी के अधिकारियों के अनुसार कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में पहली बार इस विषय को स्वतंत्र रूप से शामिल किया गया है।

लोकतंत्र के लिए चुनौती के रूप में पेश किया गया आपातकाल

पुस्तक में कहा गया है कि 1970 के दशक की शुरुआत में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई और कथित कुशासन को लेकर जन असंतोष बढ़ रहा था। इसी पृष्ठभूमि में जून 1975 में देश में आंतरिक अशांति का हवाला देते हुए आपातकाल लागू किया गया। पाठ्यपुस्तक के अनुसार आपातकाल के दौरान अधिकांश मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था, प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया और अनेक विपक्षी नेताओं तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। इस अवधि में नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज पर भी प्रभाव पड़ा।

जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का भी जिक्र

नई पुस्तक में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की भूमिका को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है। इसमें बताया गया है कि उनके नेतृत्व में चले जन आंदोलनों ने विशेष रूप से बिहार और गुजरात में छात्रों और आम नागरिकों को बड़े पैमाने पर संगठित किया। पुस्तक में उल्लेख है कि 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद आम चुनाव कराए गए, जिनमें जनता ने मतदान के जरिए अपनी राय व्यक्त की। चुनाव में तत्कालीन सत्तारूढ़ सरकार की हार को भारतीय लोकतंत्र की मजबूती और जनता की लोकतांत्रिक शक्ति का उदाहरण बताया गया है।

फेक न्यूज, क्षेत्रवाद और सामाजिक भेदभाव पर भी चर्चा

आपातकाल पर आधारित यह हिस्सा लोकतंत्र के सामने मौजूद विभिन्न चुनौतियों पर केंद्रित व्यापक अध्याय का हिस्सा है। पुस्तक में फेक न्यूज, गलत सूचना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, नियमों के उल्लंघन, गरीबी, क्षेत्रवाद, सामाजिक भेदभाव और लैंगिक असमानता जैसे विषयों को भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौतियों के रूप में शामिल किया गया है।

छात्रों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने की पहल

नई पाठ्यपुस्तक में पहली बार ‘डेमोक्रेसी एंड यू’ (लोकतंत्र और आप) नामक एक विशेष खंड भी जोड़ा गया है। एनसीईआरटी का कहना है कि इसका उद्देश्य छात्रों को केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित न रखते हुए उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में सक्रिय नागरिक के रूप में अपनी भूमिका समझने के लिए प्रेरित करना है।

लोकतांत्रिक संस्थाओं और मीडिया की भूमिका पर जोर

संशोधित पुस्तक में भारतीय लोकतांत्रिक परंपराओं और संस्थाओं पर भी विशेष फोकस किया गया है। मीडिया की भूमिका पर आधारित एक अलग खंड में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताया गया है और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा तथा जनहित के मुद्दों को सामने लाने में उसकी भूमिका को रेखांकित किया गया है।

96.8 करोड़ मतदाताओं का भी जिक्र

भारत के लोकतंत्र के विशाल स्वरूप को समझाने के लिए पुस्तक में चुनावी आंकड़ों को भी शामिल किया गया है। इसमें बताया गया है कि वर्ष 2024 में देश में 96.8 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाता थे। साथ ही देशभर में फैले मतदान केंद्रों के विशाल नेटवर्क और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी को भी विस्तार से समझाया गया है। इसके अलावा गुजरात और त्रिपुरा की पंचायतों के उदाहरण देकर जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को दर्शाया गया है। महिलाओं के मताधिकार, स्थानीय निकायों में उनके लिए आरक्षण और राजनीतिक भागीदारी पर भी अलग से चर्चा की गई है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नए पाठ्यक्रम में लोकतंत्र के इतिहास, उसकी चुनौतियों और नागरिक जिम्मेदारियों को शामिल करने से छात्रों को भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक व्यापक और व्यावहारिक रूप से समझने का अवसर मिलेगा।

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