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अतीत का प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता, उसे केवल समझा जा सकता है – शशि रंजन कुमार

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posted on : जून 23, 2026 1:47 पूर्वाह्न
  • दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘द डिक्लाइन ऑफ हिंदू सिविलाइजेशन: लेसन्स फ्रॉम द पास्ट’ पुस्तक पर हुई गंभीर चर्चा, मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन रहे मुख्य अतिथि

देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में आयोजित एक विचारोत्तेजक कार्यक्रम में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के सचिव एवं लेखक शशि रंजन कुमार की पुस्तक ‘द डिक्लाइन ऑफ हिंदू सिविलाइजेशन: लेसन्स फ्रॉम द पास्ट’ पर विस्तृत चर्चा हुई। इस अवसर पर लेखक ने इतिहास को समझने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि, “अतीत का प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता, उसे केवल समझा जा सकता है।”

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तराखंड के मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन उपस्थित रहे। उन्होंने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि यह पुस्तक वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज सिद्ध होगी। वहीं दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि आजादी के बाद देश के इतिहास को एक सीमित और चयनित दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया, जबकि अब सभ्यता के इतिहास, उसके बदलावों और उनसे मिलने वाली सीख पर गंभीर चर्चा हो रही है।

पुस्तक के लेखक शशि रंजन कुमार ने बताया कि पुस्तक चार प्रमुख खंडों – ‘द ज़ेनिथ’, ‘द डिक्लाइन’, ‘द डिफीट्स’ और ‘द रीजनस’ – में विभाजित है। यह कृति गहन शोध, तुलनात्मक ऐतिहासिक अध्ययन और अनेक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित है। पुस्तक में संस्कृति, राजनीति, समाज और बौद्धिक चिंतन के विभिन्न आयामों के माध्यम से हिंदू सभ्यता के उत्थान और पतन का विश्लेषण किया गया है।

उन्होंने कहा कि इतिहास को न तो केवल गौरवगान के रूप में देखा जाना चाहिए और न ही शिकायत के रूप में। इतिहास से सीख लेकर वर्तमान को समझना और भविष्य का निर्माण करना ही उसका वास्तविक उद्देश्य है। पुस्तक में चचनामा, तबकात-ए-नासिरी, किताब-ए-यामिनी, फुतूह अल-बुलदान, किताब-उल-हिंद तथा अन्य ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर विभिन्न घटनाओं और परिस्थितियों का विश्लेषण किया गया है।

अपने व्याख्यान में शशि रंजन कुमार ने प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा, गणित, चिकित्सा विज्ञान, प्लास्टिक सर्जरी, संगीत और सौंदर्यशास्त्र जैसे विषयों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि दशमलव प्रणाली और ‘शून्य’ की अवधारणा भारतीय चिंतन की महान उपलब्धियां हैं, जिन्होंने विश्व की गणितीय सोच को नई दिशा दी।

पुस्तक के अंतिम अध्याय ‘वार इज़ डिसेप्शन’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणों के दौर में भारतीय शासकों द्वारा कौटिल्य की कूटनीतिक और रणनीतिक शिक्षाओं की उपेक्षा एक बड़ी ऐतिहासिक भूल साबित हुई। उन्होंने कहा कि तत्कालीन समय में युद्ध सामूहिक रणनीति के बजाय व्यक्तिगत वीरता का विषय बन गया था, जिसके दूरगामी परिणाम सामने आए।

मुख्य वक्ता की भूमिका में प्रो. सुरेखा डंगवाल (कुलपति, दून विश्वविद्यालय) रही जिन्होंने प्रस्तुत की ऐतिहासिक रूपरेखाओं को रेखांकित करते हुए कहा कि आज़ादी के बाद हिंदुस्तान के इतिहास को एक सेलेक्टिव तरीके से परोसा गया। आज हम सभ्यता के इतिहास, बदलावों और संरचनात्मक सीखों पर बात करने लगे हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के निदेशक एन. रवि शंकर, आईएएस ने की, जबकि कार्यक्रम का संचालन एवं समन्वय के.के. मिश्रा, पीसीएस ने किया। कार्यक्रम में इतिहासकारों, साहित्यकारों, पत्रकारों, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों तथा बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों ने प्रतिभाग कर पुस्तक पर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम में पुस्तक को इतिहास, अस्मिता और बौद्धिक आत्म-नवीनीकरण पर एक गंभीर एवं तथ्यपरक विमर्श की शुरुआत के रूप में रेखांकित किया गया।

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