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सरकार की नई पहल, स्कूलों में अब लोक भाषाओं में हर सप्ताह होगी भाषण और निबंध प्रतियोगिता

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posted on : जून 11, 2025 12:54 पूर्वाह्न

देहरादून : उत्तराखंड की पर्वतीय घाटियों में जब हवा लोकगीतों की तरह बहती है, तो लगता है जैसे कोई बूढ़ी दादी कहानी सुना रही हो। लेकिन, वक्त की मार, पलायन की पीड़ा और नई पीढ़ी की अनभिज्ञता ने इन बोली-भाषाओं को हाशिये पर ला खड़ा कर दिया है। अब इसी खोती विरासत को नया जीवन देने के लिए सरकार ने कुछ ठोस कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी प्रत्येक सप्ताह स्कूलों में स्थानीय लोक भाषा में निबंध और भाषण प्रतियोगिता करने के निर्देश दिए हैं।

स्कूलों में अब बोले जाएंगी स्थानीय बोलियां

स्कूलों में अब हर हफ्ते स्थानीय भाषा में भाषण और निबंध प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएँगी। गढ़वाली में बालक बोलेगा “म्यर गौं, म्यर माटी”, तो कुमाऊंनी में बालिका लिखेगी “हमर लोक संस्कृती”। रवांल्टी में कहेगा आमरी संस्कृति, आमारी पछाण, यह पहल न केवल भाषा को जीवित रखेगी, बल्कि बच्चों के भीतर अपनी जड़ों से जुड़ाव भी बढ़ाएगी।

साहित्य भूषण पुरस्कार की राशि में बढ़ोतरी

उत्तराखंड साहित्य भूषण पुरस्कार की राशि अब 5 लाख से बढ़ाकर 5,51,000 रुपये कर दी गई है। यह सिर्फ राशि में इज़ाफा नहीं, बल्कि सम्मान में गहराई है। इसके साथ ही, दीर्घकालीन साहित्य सेवा करने वालों को अलग से दीर्घकालीन साहित्य सेवी सम्मान भी प्रदान किया जाएगा। यह उस साधना का मूल्यांकन है, जो दशकों से चुपचाप लोक साहित्य के दीप जलाए हुए थी।

ई-लाइब्रेरी और डिजिटल अभिलेखागार

अब लोककथाएं, लोकगीत, पहाड़ी किस्से और दादी-नानी के वे अनुभव डिजिटल रूप में संरक्षित होंगे। एक ष्ई-लाइब्रेरीष् की स्थापना की जा रही है जिसमें उत्तराखंड की 13 प्रमुख भाषाओंकृगढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी, बंगाणी, थराली, रंवाई, जौनपुरी, गंगोली, मारछी, रजि, जाध, रंवाल्टी और पछाईकृकी समृद्ध विरासत को संग्रहित किया जाएगा। ऑडियो-विजुअल फॉर्मेट में इनका दस्तावेजीकरण आने वाली पीढ़ियों के लिए खजाना बनेगा।

राष्ट्रीय स्तर पर होगा उत्तराखंड साहित्य का उत्सव

एक बड़ा और प्रभावशाली कदम यह भी है कि अब साहित्य महोत्सव आयोजित किए जाएंगे, जिसमें देशभर के साहित्यकार आमंत्रित होंगे। उत्तराखंड के लोक साहित्य और भाषाई समृद्धि को देश के कोने-कोने तक पहुँचाने का यह प्रयास, भाषाई पर्यटन की राह भी खोल सकता है।

13 भाषाओं का होगा ‘भाषाई मानचित्र’ तैयार

उत्तराखंड की भाषाओं और बोलियों के भौगोलिक और सांस्कृतिक विस्तार को दिखाने के लिए एक ‘भाषाई मानचित्र’ तैयार किया जाएगा। यह न सिर्फ अकादमिक शोध के लिए उपयोगी होगा, बल्कि इससे हर व्यक्ति समझ सकेगा कि कहां कौन-सी बोली सांस लेती है, किस घाटी में कौन-सी जुबान गूंजती है।

बुजुर्गों की जुबान तक सिमटी

उत्तराखंड में तेजी से हो रहे पलायन और भाषाई उपेक्षा के कारण आज कई बोलियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं। ये बोलियां आज केवल बुजुर्गों की जुबान पर हैं। यदि अब भी प्रयास न हुए, तो ये भाषाएं इतिहास की किताबों में दफन हो जाएंगी।

जन-जागरूकता जरूरी

सरकार के प्रयास केवल नीति के स्तर पर सफल होंगे यदि जनमानस में चेतना जगे। स्थानीय मीडिया, स्कूल, पंचायतें और गांव के बुजुर्ग मिलकर यदि इस अभियान को अपनाएँ, तो हमारी बोली-बानी फिर से जनजीवन का हिस्सा बन सकती है।

भाषा सिर्फ संवाद नहीं, पहचान है

उत्तराखंड की भाषाएं केवल शब्दों का संग्रह नहीं हैं, ये पूरी सभ्यता का आईना हैं। इनका संरक्षण केवल भाषाई उत्तरजीविता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण है। अब समय आ गया है कि हम सब अपने गांव, अपनी बोली, अपने लोक को गर्व से अपनाएं और नई पीढ़ी को भी इसके रंग में रंगें।

उत्तराखंड की 13 भाषाएं 

उत्तराखंड की 13 भाषाओं में गढ़वाली, कुमांउनी, जौनसारी, जौनपुरी, जोहारी, रवांल्टी, बंगाड़ी, मार्च्छा, राजी, जाड़, रंग ल्वू, बुक्साणी और थारू शामिल हैं. यह सभी जानते है कि उत्तराखंड में दो मंडल हैं. एक गढ़वाल और दूसरा कुमांऊ इन दोनों की अपनी अलग-अलग भाषाएं हैं.

गढ़वाली

गढ़वाल मंडल के सातों​ जिले पौड़ी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, देहरादून और हरिद्वार गढ़वाली भाषी लोगों के मुख्य क्षेत्र हैं. गढ़वाली का अपना शब्द भंडार है जो काफी विकसित है.

कुमांउनी

कुमांऊ मंडल के छह जिलों नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत और उधमसिंह नगर में कुमांउनी बोली जाती है. वैसे इनमें से लगभग हर जिले में कुमांउनी का स्वरूप थोड़ा बदल जाता है. लोग गढ़वाली और कुमांऊनी दोनों ही भाषा को बोल और समझ लेते हैं. कुमाउं में कुछ दस उप भाषाएं बोली जाती है.

जौनसारी

गढ़वाल मंडल के देहरादून जिले के पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्र को जौनसार भाबर कहा जाता है. यहां पर जौनसारी भाषा बोली जाती है. यह भाषा मुख्य रूप से तीन तहसील चकराता, कालसी और त्यूनी में बोली जाती है.

जौनपुरी

टिहरी जिले के जौनपुर विकासखंड में इस भाषा का प्रयोग किया जाता है. टिहरी रियासत के दौरान काफी पिछड़ा क्षेत्र रहा है. लेकिन इससे यहां की अलग संस्कृति और भाषा भी विकसित हुई है.

रवांल्टी

उत्तरकाशी जिले के पश्चिमी क्षेत्र को रवांई कहा जाता है. यह यमुना और टौंस नदियों की घाटियों तक फैला हुआ है. जहां से गढ़वाल के 52 गढ़ों में से एक राईगढ़ स्थित था, जिसके कारण इसका नाम रवांई पड़ा है. इस क्षेत्र में गढ़वाली भाषा बोली जाती है और अन्य क्षेत्रों में भिन्न भाषा बोली जाती है.

जाड़

उत्तरकाशी जिले के जाड़ गंगा घाटी में रहने वाले लोग जाड़ जनजाति के है और जाड़ भाषा ही बोली जाती है. यहां पर उत्तरकाशी के जादोंग, निलांग, हर्षिल, धराली, भटवाणी, डुंडा, बगोरी आदि में इस भाषा के लोग मिल जाएंगे. ये सभी जाड़ भोटिया जनजाति का ही एक अंग है.

बंगाणी

उत्तरकाशी जिले के मोरी तहसील के अंतर्गत पड़ने वाले क्षेत्र को बंगाण कहा गया है. इसमें मासमोर, पिंगल तथा कोठीगाड़ सामिल है. जिनमें बंगाणी बोली जाती है.

मार्च्छा

गढ़वाल मंडल के चमोली जिले की नीति और माणा घाटियों में रहने वाली भोटिया जनजाति मार्च्छा और तोल्छा भाषा बोलती है. इतना ही नहीं इस भाषा के तिब्बती में कई शब्द मिलते हैं.

जोहारी

यह भी भोटिया जनजाति की एक भाषा है ​जो पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी क्षेत्र में बोली जाती है.

थारू

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के तराई क्षेत्रों, नेपाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षेत्राों में ​थारू जनजाति के लोग रहते हैं. कुमांऊ मंडल में यह जनजाति मुख्य रूप से उधमसिंह नगर के खटीमा और सितारगंज विकास खंडो में रहती है. यहां पर मौजूद सभी लोग थारू भाषा बोलते है.

बुक्साणी

कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक तराई की पट्टी में रहने वाले लोग बुक्साणी भाषा को बोलते है. इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से काशीपुर, बाजपुर, गदरपुर, रामनगर, डोईवाला, सहसपुर, बहादराबाद, दुगड्डा, कोटद्वार आदि शामिल हैं.

रंग ल्वू

कुमांऊ में मुख्य रूप से पिथौरागढ़ की धारचुला तहसील के दारमा, व्यास और चौंदास पट्टियों में रंग ल्वू भाषा बोली जाती है. इसे तिब्बती बर्मी भाषा का अंग माना जाता है.

राजी

राजी कुमांऊ के जंगलों में रहने वाली जनजाति थी. यह नेपाल की सीमा से सटे उत्तराखंड़ के पिथौरागढ़ के लोगो की भाषा राजी होती है, लेकिन यह भाषा अब वहां से खत्म होती जा रही है. क्योंकि वहां पर इस भाषा को लोग बहुत कम इस्तेमाल करते है.

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