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दरमानी लाल के रिंगाल के उत्पाद का हर कोई है मुरीद, रिंगाल से रोजगार, पारम्परिक हस्तशिल्प कला को मिली पहचान

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posted on : अक्टूबर 27, 2021 10:55 अपराह्न

चमोली । दरमानी लाल के रिंगाल के उत्पाद का हर कोई है मुरीद, रिंगाल से रोजगार, पारम्परिक हस्तशिल्प कला को मिली पहचान । एक जनपद, दो उत्पाद योजना से चमोली की हस्तशिल्प कला को नयी पहचान मिलने की उम्मीद जगी है। विगत दिनों उत्तराखंड में एक जनपद दो उत्पाद (ओडीटीपी) योजना लागू हो गई है। इसके तहत बाजार में मांग के अनुरूप कौशल विकास, डिजाइन विकास और कच्चे माल के जरिये नई तकनीक के आधार पर प्रदेश जिले में दो उत्पादों का विकास किया जाएगा। उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में वहां के स्थानीय उत्पादों की पहचान के अनुरूप उनका विकास करना है। इससे स्थानीय काश्तकारों एवं शिल्पकारों के लिए जहां एक ओर स्वरोजगार के अवसर पैदा होंगे, वहीं दूसरी ओर हर जिले के स्थानीय उत्पादों की विश्वस्तरीय पहचान बन सकेगी।

गौरतलब है कि उत्तराखंड में करीब 50 हजार से अधिक हस्तशिल्पि हैं जो अपने हुनर से हस्तशिल्प कला को संजोये हुए है। ये हस्तशिल्पि रिंगाल, बांस, नेटल फाइबर, ऐपण, काष्ठ शिल्प और लकड़ी पर बेहतरीन कलाकरी के जरिए उत्पाद तैयार करते आ रहें हैं। युवा पीढ़ी अपनी पुश्तैनी व्यवसाय को आजीविका का साधन बनाने में दिलचस्पी कम ले रही है। परिणामस्वरूप आज हस्तशिल्प कला दम तोडती और हांफती नजर आ रही है। सीमांत जनपद चमोली जनपद के कुलिंग, छिमटा, पज्याणा, पिंडवाली, डांडा, मज्याणी, बूंगा, सुतोल, कनोल, मसोली, टंगणी, बेमरू, किरूली गांव हस्तशिल्पियों की खान है। इन गांवों के लोगों की आजीविका का मुख्य साधन हस्तशिल्प है।

चमोली के दरमानी लाल के रिंगाल के उत्पाद का हर कोई है मुरीद

उम्र के जिस पडाव पर अमूमन लोग घरों की चाहरदीवारी तक सीमित होकर रह जाते हैं, वहीं सीमांत जनपद चमोली की बंड पट्टी के किरूली गांव निवासी 65 वर्षीय दरमानी लाल इस उम्र में हस्तशिल्प कला को नयी पहचान दिलाने की मुहिम में जुटे हुए हैं। वे विगत 42 सालों से रिंगाल के विभिन्न उत्पादों को आकार दे रहें हैं। रिंगाल के बने कलमदान, लैंप सेड, चाय ट्रे, नमकीन ट्रे, डस्टबिन, फूलदान, टोकरी, टोपी, स्ट्रैं सहित विभिन्न उत्पादों को इन्होंने आकार दिया गया है। इनके बनाए गए उत्पादों का हर कोई मुरीद हैं। कई जगह ये रिंगाल हस्तशिल्प के मास्टर ट्रेनर के रूप में लोगों को ट्रेनिंग दे चुके हैं, वहीं अपने पिताजी दरमानी लाल के साथ रिंगाल के उत्पादों को तैयार कर रहे राजेन्द्र कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में रिंगाल के उत्पादों की भारी मांग है। हस्तशिल्प रोजगार का बड़ा साधन साबित हो सकता है। यदि हस्तशिल्प उद्योग और हस्तशिल्पियों को बढ़ावा और प्रोत्साहन मिले तो पहाड़ की तस्वीर बदल सकती है। बाजार की मांग के अनुरूप हमें नये लुक और डिजाइन पर फोकस करना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में एक जनपद, दो उत्पाद योजना के अंतर्गत चमोली की हस्तशिल्प कला को मिलेगी नयी पहचान मिलेगी और हस्तशिल्पियों को रोजगार के अवसर।

रिंगाल से रोजगार, पारम्परिक हस्तशिल्प कला को मिली पहचान

हिमालयी महाकुंभ नंदा देवी राजजात यात्रा और नंदा की वार्षिक लोकजात यात्रा में रिंगाल की छंतोली बरबस ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। रिंगाल की छंतोली के बिना आप नंदा देवी राजजात यात्रा की परिकल्पना नहीं कर सकते हैं। रिंगाल के विभिन्न उत्पाद आज भी लोगों को बेहद भाते हैं। रिंगाल से पहले जहां केवल पांच या छह प्रकार का सामान बनाया जाता था, वहीं अब 200 से अधिक प्रकार का सामान बनाया जा रहा है। पारम्परिक हस्तशिल्प से इतर अब रिंगाल को मार्डन लुक देकर रिंगाल के बेजोड हस्तशिल्पियों नें रिंगाल की छंतोली, ढोल दमाऊ, हुडका, लैंप शेड, लालटेन, गैस, टोकरी, फूलदान, घौंसला, पेन होल्डर, फुलारी टोकरी, चाय ट्रे, नमकीन ट्रे, डस्टबिन, फूलदान, टोपी, स्ट्रै, पूजा टोकरी, फाइल फोल्डर, लैंप, गैस, मंदिरों के डिजाइन, सर्विस टोकरी, झूमर, झाड़ू, कूड़ेदान, पैन स्टेंड, खूबसूरत ज्वैलरी, कलाई में बांधे जाने वाले आकर्षक बैंड, रिंगाल की राखी सहित विभिन्न प्रकार के उत्पादों को तैयार कर पहचान दिलाई है। पहाड़ में खेती और पशुपालन के सिमटने से संकट में आए परंपरागत रिंगाल उद्योग को सजावटी सामान की संजीवनी मिल गई है। जहां मॉर्डन फर्नीचर्स केवल दिखावे तक सीमित है जबकि रिंगाल के उत्पादों से घरों की शोभा वास्तविक रूप से बढती है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में रिंगाल को उच्च दर्जा प्राप्त है। फूलों की टोकरी से लेकर रिंगाल की छंतोली इसका उदाहरण है, वहीं रिंगाल का सबसे बड़ा फायदा ये है वो पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद अच्छा होता है। रिंगाल के उत्पाद बेहद हल्के होते हैं। और अन्य की तुलना में आकर्षक और सस्ते भी होते हैं। इन्हें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है।

ये है रिंगाल

रिंगाल उत्तराखंड के जंगलों में पाया जाने वाला एक पेड है। ये बांस प्रजाति का है। बांस और रिंगाल के बीच अंतर बस इतना है कि बांस आकार में बहुत बड़ा होता है और रिंगाल थोड़ा छोटा। रिंगाल और बांस की लकड़ियों की बनावट और पत्तियां लगभग एक समान ही होती हैं। इसीलिए रिंगाल को बोना बांस भी कहा जाता है। जहां बांस की लम्बाई 25-30 मीटर होती है वहीं रिंगाल पांच से आठ मीटर लंबा होता है। रिंगाल 1000-7000 फीट की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है क्योंकि रिंगाल को पानी और नमी की आवश्यकता ज्यादा रहती है वही बांस सामान्य ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आसानी से पाया जाता है। रिंगाल पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के अलावा भूस्खलन को रोकने में भी सहायक होता है। रिंगाल के बारे में बताते हुए राजेन्द्र बडवाल कहते हैं कि रिंगाल की 12 प्रजाति होती है लेकिन हमारे क्षेत्र में आठ प्रकार का रिंगाल पाया जाता है। देव रिंगाल, थाम रिंगाल, मालिंगा रिंगाल, गोलू (गड़ेलू) रिंगाल, ग्यंवासू रिंगाल, सरुड़ू रिंगाल, भट्टपुत्रु रिंगाल, नलतरू रिंगाल। लेकिन सबसे उत्तम प्रजाति का रिंगाल देव रिंगाल होता है। रिंगाल उत्तराखण्ड के लोकजीवन का अभिन्न अंग है। इसके बिना पहाड़ के लोक की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। रिंगाल से दैनिक जीवन में काम आने वाले जरुरी उपकरण तो बनते ही हैं, इनसे कई तरह के आधुनिक साजो-सामान भी बनाये जा सकते हैं।

 

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