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जन सहभागिता से ही होगा पर्यावरण संरक्षण, उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र में विश्व पर्यावरण दिवस पर संगोष्ठी आयोजित

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posted on : जून 6, 2026 5:45 अपराह्न

देहरादून : विश्व पर्यावरण दिवस पर यूसैक मे आयोजित कार्यशाला मे पर्यावरण संरक्षण में अंतरिक्ष प्रोधोगिकी की भूमिका को रेखांकित किया गया । विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (यू-सैक) द्वारा पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन तथा जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के समाधान में अंतरिक्ष प्रोधोगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया। कार्यशाला मे वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखंड प्रोधोगिकी विश्वविध्यालय, देहारादून के प्राध्यापकों द्वारा प्रतिभाग किया गया।

प्रथम सत्र मे संगोष्ठी की संयोजक यूसैक की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ अरुण रानी ने कहा कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में वन, जल स्रोत, हिमनद, जैव विविधता तथा आपदा संभावित क्षेत्रों की निगरानी एवं प्रबंधन के लिए उपग्रह आधारित सुदूरसंवेदी (Remote Sensing) एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जा रहा है। इन आधुनिक तकनीकों के माध्यम से भूमि उपयोग एवं भू-आवरण परिवर्तन, वनाग्नि, भूस्खलन, हिमनदों में परिवर्तन तथा जल संसाधनों की स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण संभव हो रहा है। यूसैक द्वारा विकसित भू-स्थानिक डेटाबेस एवं निर्णय सहयोगी प्रणालियां राज्य सरकार के विभिन्न विभागों को पर्यावरणीय योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में सहयोग प्रदान कर रही हैं। उपग्रह आंकड़ों के उपयोग से जलागम विकास, वनीकरण, आपदा प्रबंधन तथा जलवायु अनुकूल विकास योजनाओं को भी सुदृढ़ बनाया जा रहा है।साथ ही ड्रोन प्रोधोगिकी और भू-स्थानिक तकनीकों का समन्वित उपयोग पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल रहा है।

केंद्र के वैज्ञानिक डॉ गजेन्द्र सिंह कार्यक्रम में वानिकी एवं पारिस्थितिकी प्रभाग के वैज्ञानिक डॉ गजेन्द्र सिंह ने उत्तराखण्ड की समृद्ध जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान प्रणाली तथा स्थानीय समुदायों की पर्यावरण संरक्षण में भूमिका पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि उत्तराखण्ड के वन, जलस्रोत,पर्वत, नदियाँ तथा जैव विविधता केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं,बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक एवं सामाजिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। उत्तराखण्ड की भोटिया, राजी, थारू,बोक्सा एवं जौनसारी जैसी जनजातियाँ तथा स्थानीय समुदाय सदियों से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। औपचारिक कानूनों और नियमों के अभाव में भी स्थानीय समाज ने पवित्र वनों, देव-वनों, नौला,धारों,गौचर भूमि तथा पारंपरिक सामाजिक व्यवस्थाओं के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की प्रभावी परंपरा विकसित की है। वेदों, पुराणों तथा लोक साहित्य में प्रकृति संरक्षण को धर्म और संस्कृति से जोड़ा गया है। उत्तराखण्ड की लोक परंपराएँ लोकगीत,स्थानीय स्थानों के नाम तथा पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ पर्यावरणीय चेतना को पीढ़ी.दर.पीढ़ी हस्तांतरित करती रही हैं। वर्तमान समय में जैव विविधता ह्रास, जलवायु परिवर्तन तथा प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक अध्ययनों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के ज्ञान एवं सहभागिता को भी समान महत्व देना होगा। कार्यक्रम में उत्तराखण्ड के विभिन्न पारिस्थितिक क्षेत्रों के अनुरूप स्थानीय एवं देश, प्रजातियों के रोपण, जल स्रोतों के संरक्षणए संसाधनों के सतत उपयोग तथा नागरिकों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया गया।

यूसैक की वैज्ञानिक डॉ सुषमा गैरोला ने कहा कि स्थानीय जनसहभागिता की मदद से पर्यावरण को दूषित होने से बचाया जा सकता है उन्होंने पर्यावरण संरक्षण हेतु यूसैक द्वारा सुदूरसंवेदी (Remote Sensing) एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) तकनीकों के व्यापक उपयोग से क्रियान्वित की जा रही मानव जनित कूड़े के डम्पिंग साइट जोन चिनहाँकन परियोजना के बारे मे प्रतिभागियों को अवगत कराया ।

संगोष्ठी के दूसरे सत्र मे वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखंड प्रोधोगिकी विश्वविध्यालय, देहारादून के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के सहायक आचार्य डॉ सूरज ने कहा किवर्तमान मे बढ़ते शहरीकरण के फलस्वरूप बढ़ते कंक्रीट के जंगल भी पर्यावरण को प्रभावित कर रहे हैं, बढ़ते शहरीकरण के कारण भूमि और डामर कि परतें बढ़ने से मिट्टी कि जलधारण एवं जल अवशोषण क्षमता मे कमी आ रही है जिस कारण भूजल पुनर्भरण घट रहा है ,सतही अपवाह बढ़ता है तथा बाढ़ लैंसलाइड और जल संकट कि संभावनाएं बढ़ जाती है। जो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित करती है ।

वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखंड प्रोधोगिकी विश्वविध्यालय, देहारादून के ऐप्लाइएड साइंस विभाग कि सहायक आचार्य डॉ सुरभि भट्ट ने पॉलिथीन एवं फर्टिलाइजर पदार्थों के बढ़ते उपयोग से पर्यावरण को अत्यधिक नुकसान हो रहा है। हमारे द्वारा प्रयोग की जाने वाली पॉलिथीन मिट्टी एवं जलश्रोतो मे लंबे समय तक रहकर पर्यावरण को दूषित करती है यह सैकड़ों वर्षों तक भी उसी स्थिति मे रहती है । ज्यादा पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों द्वार अत्यधिक फर्टिलाइजर के उपयोग से मिट्टी कि उर्वरता घटी है और नाइट्रेट भूजल मे मिल कर जलप्रदूषण उत्पन्न करते हैं। हमें पॉलिथीन के उपयोग मे कमी और उर्वरकों के संतुलित प्रयोग एवं वर्मी कम्पोसीट खाद एवं हरित खाद के अधिक उपयोग से मिट्टी एवं जल प्रदूषण को प्रभावी रूप से कम करना होगा।

वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखंड प्रोधोगिकी विश्वविध्यालय, देहारादून के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के सहायक आचार्य डॉ परितोष ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर नागरिकों से पर्यावरण संरक्षण, जल स्रोतों के संवर्धन, वृक्षारोपण तथा प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग हेतु सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया गया।

इस अवसर पर यूसैक के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ प्रियदर्शी उपाध्याय ,वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी श्री आर एस मेहता, वैज्ञानिक -डॉ नीलम रावत, डॉ आशा थपलियाल, पुष्कर कुमार द्वारा पर्यावरण संरक्षण हेतु अपने अपने विचार प्रस्तुत किए गए । विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर यू-सैक परिसर मे अतिथियों एवं प्रतिभागियों द्वारा पौधारोपण किया गया ।

संगोष्ठी में यूसैक के प्रशानिक अधिकारी आरएस मेहता, वरिष्ठ वैज्ञानिक – प्रियदर्शी उपाध्याय, वैज्ञानिक- डॉ सुषमा गैरोला, डॉ आशा थपलियाल,डॉ नीलम रावत, डॉ गजेन्द्र सिंह, शशांक लिंगवाल, पुष्कर कुमार, डॉ दिव्य उनियाल, देवेश कपरवान, मीन पंत आदि समस्त कार्मिकों एवं शोधार्थियों द्वारा प्रतिभाग किया गया ।

 

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