posted on : अप्रैल 2, 2025 10:49 अपराह्न
- डॉ. सुशील शर्मा, वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ एवं इंटीग्रेटिव मेडिसिन एक्सपर्ट, रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम, कनखल
हरिद्वार : हमारे जीवन में कई ऐसे पल आते हैं जब हम किसी व्यक्ति से मिलकर एक नई दृष्टि प्राप्त करते हैं। हाल ही में मेरे क्लिनिक में एक ऐसा ही अनुभव हुआ, जिसने मुझे जीवन के गहरे अर्थ को समझने का अवसर दिया। एक 85 वर्षीय वृद्धा व्हीलचेयर पर मेरे पास आईं। उन्हें उच्च रक्तचाप और सांस फूलने की समस्या थी, लेकिन उनके चेहरे पर अद्भुत शांति और संतोष का भाव था। उनकी आँखों में वर्षों के अनुभव की गहराई थी।
बातचीत के दौरान मैंने उनसे पूछा कि वे अपना समय कैसे बिताती हैं। उन्होंने बताया कि वे अपने घर के बाहर बैठती हैं, जहाँ मोहल्ले की महिलाएँ उनके पास आकर अपने सुख-दुःख साझा करती हैं। वे सब अपनी बातें कहकर हल्का महसूस करती हैं, लेकिन इस वृद्धा ने कभी अपनी पारिवारिक समस्याएँ उनके सामने नहीं रखीं। उन्होंने कहा, “मैं बस एक अच्छा श्रोता हूँ, यही मेरा काम है।” यह सुनकर मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने यह गुण कैसे विकसित किया। तब उन्होंने अपने पिता के एक अनमोल उपदेश को साझा किया, जो उन्हें विवाह के समय मिला था।
उन्होंने कहा, “मेरे पिता ने मुझसे कहा था— ‘बेटी, तुम एक नए घर जा रही हो। वहाँ के लोग तुम्हारे लिए अजनबी हैं, लेकिन तुम्हें उन्हें अपना बनाना है। इसके लिए दो बातें याद रखना: अगर तुम्हारी दाल में नमक कम हो, तो उसमें थोड़ा और मिला लेना। और अगर ज्यादा हो जाए, तो थोड़ा पानी डाल देना। कभी यह मत देखो कि क्या गलत है, बल्कि उसे संतुलित करने की कोशिश करो। शिकायत मत करो, समाधान ढूँढो।'” यह सीख उन्होंने जीवनभर अपनाई और अपने पारिवारिक एवं सामाजिक रिश्तों को मजबूत बनाए रखा।
इस छोटे से संवाद ने मुझे यह एहसास कराया कि हम जीवन में अक्सर दूसरों की कमियों को देखने और उन्हें अपने अनुसार बदलने की कोशिश करते हैं। इससे न केवल हमारे संबंध बिगड़ते हैं, बल्कि मानसिक तनाव भी बढ़ता है। यदि हम दूसरों की गलतियों को नजरअंदाज करना सीखें और अपने दृष्टिकोण को अधिक लचीला बनाएं, तो हम न केवल बेहतर रिश्ते बना सकते हैं, बल्कि अपने मन को भी अधिक शांति और संतोष से भर सकते हैं।
डॉ. सुशील शर्मा, वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ एवं इंटीग्रेटिव मेडिसिन एक्सपर्ट, रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम, कनखल बताते हैं कि योग भी संतुलन के इसी सिद्धांत को अपनाने पर जोर देते हैं। शरीर और मन का संतुलन बनाए रखना ही वास्तविक स्वास्थ्य की कुंजी है। जब हम अपने आहार, विचार और व्यवहार में संतुलन रखते हैं, तो हमारा जीवन सहज और आनंदमय बन जाता है। इस बुजुर्ग महिला की सीख हमें यही बताती है कि जीवन में संतुलन बनाए रखना ही सच्ची कला है। यदि हम समस्या पर ध्यान देने के बजाय समाधान ढूँढने की प्रवृत्ति विकसित करें, तो हमारा जीवन अधिक सुखद और शांतिपूर्ण हो सकता है।


