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सिर्फ 10 मिनट की स्क्रॉलिंग और खुद से नफरत, सोशल मीडिया बिगाड़ रहा टीनएज लड़कियों की मेंटल हेल्थ

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posted on : मार्च 3, 2026 2:30 पूर्वाह्न

आज की डिजिटल दुनिया में इंटरनेट और सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुके हैं। मनोरंजन, जानकारी और कनेक्शन के साधन के रूप में इस्तेमाल होने वाले ये प्लेटफॉर्म अब विशेष रूप से किशोरावस्था से गुजर रही लड़कियों के लिए मानसिक यातना का कारण बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों और रिपोर्ट्स के अनुसार, सोशल मीडिया पर फैल रही विषाक्त सामग्री, बॉडी शेमिंग और नफरत भरी टिप्पणियां न केवल लड़कियों के आत्मविश्वास को ठेस पहुंचा रही हैं, बल्कि उन्हें गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की ओर धकेल रही हैं।

10 मिनट की स्क्रॉलिंग और खुद से नफरत का सिलसिला

सोशल मीडिया का प्रभाव कितना तेज और गहरा हो सकता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महज 10 मिनट तक स्क्रीन पर स्क्रॉल करने से एक टीनएज लड़की को अपने शरीर और चेहरे से नफरत होने लगती है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि प्लेटफॉर्म्स पर दिखाई जाने वाली ‘परफेक्ट’ तस्वीरें और वीडियो लड़कियों में असुरक्षा की भावना पैदा करती हैं। वे खुद को उन आदर्श छवियों से तुलना करने लगती हैं, जिससे बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर जैसी समस्या जन्म लेती है। नतीजतन, लड़कियां खुद को कमजोर और असुरक्षित महसूस करने लगती हैं, और डिप्रेशन की दर लड़कों की तुलना में दोगुनी हो जाती है। कुछ मामलों में यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि लड़कियां आत्मघाती विचारों तक पहुंच जाती हैं।

लड़कियों को वस्तु की तरह पेश करने का खेल

सोशल मीडिया पर लड़कियों को इंसान के बजाय एक वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यहां उनके लुक्स की रेटिंग की जाती है, और सांकेतिक भाषा में अभद्र टिप्पणियां आम हैं। महिलाओं के खिलाफ हिंसा, दुष्कर्म जैसी गंभीर घटनाओं पर भद्दे मजाक बनाए जाते हैं, और ऐसी पोस्ट्स को हजारों लाइक्स मिलते हैं। यह न केवल समाज की गिरती मानसिकता को दर्शाता है, बल्कि कम उम्र के लड़कों को अनजाने में ऐसी अश्लीलता और नफरत भरी भाषा को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित करता है। इससे वर्षों की मेहनत से हासिल लैंगिक समानता पर पानी फिरता नजर आ रहा है।

एल्गोरिदम का कुप्रभाव और नकली मर्दानगी

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सोशल मीडिया के एल्गोरिदम विशेष रूप से टीनएजर्स को ऐसा कंटेंट दिखाते हैं जो पुरुष श्रेष्ठता को बढ़ावा देता है। इससे लड़कों के मन में यह गलत धारणा पैदा हो रही है कि लड़कियों को नीचा दिखाना ही असली मर्दानगी है। वहीं, लड़कियां जब खुद को इंटरनेट पर मौजूद ‘आदर्श’ तस्वीरों से तुलना करती हैं, तो वे मानसिक रूप से टूटने लगती हैं। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 38% महिलाएं ऑनलाइन हिंसा का शिकार होती हैं। इस खतरे को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है, ताकि उन्हें इस जहरीली मानसिकता से बचाया जा सके।

डराने वाले आंकड़े और बढ़ती चिंता

विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न सर्वेक्षणों से मिले आंकड़े चिंताजनक हैं। भारत में भी सोशल मीडिया से जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि 70% से अधिक टीनएज लड़कियां सोशल मीडिया पर बॉडी शेमिंग का सामना करती हैं, जिससे उनका आत्मसम्मान प्रभावित होता है। इसके अलावा, ऑनलाइन ट्रोलिंग और साइबर बुलिंग के मामले में लड़कियां लड़कों की तुलना में अधिक प्रभावित होती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या एक महामारी का रूप ले सकती है।

बचाव के उपाय: शिक्षा और जागरूकता जरूरी

सिर्फ तकनीकी प्रतिबंध लगाना समस्या का समाधान नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण कदम है स्कूलों और घरों में बच्चों को ऑनलाइन एथिक्स सिखाना। लड़कों को यह समझाना आवश्यक है कि वर्चुअल दुनिया में भी किसी का सम्मान करना उतना ही जरूरी है जितना वास्तविक जीवन में। अभिभावकों को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए और उन्हें सकारात्मक कंटेंट की ओर निर्देशित करना चाहिए।

विषाक्त सामग्री को सीमित करना चाहिए

इसके अलावा, सोशल मीडिया कंपनियों को अपने एल्गोरिदम में बदलाव लाकर विषाक्त सामग्री को सीमित करना चाहिए। सरकारें भी सख्त कानून बनाकर ऑनलाइन हिंसा को रोक सकती हैं। यह मुद्दा न केवल व्यक्तिगत, बल्कि सामाजिक स्तर पर ध्यान देने योग्य है। अगर हम समय रहते जागरूक नहीं हुए, तो सोशल मीडिया का यह अंधेरा पक्ष हमारी आने वाली पीढ़ियों को और अधिक नुकसान पहुंचा सकता है।

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सेमन्या कण्वघाटी हिन्दी पाक्षिक समाचार पत्र – www.liveskgnews.com

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