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किसी कार्य को करने से पहले ही ना शब्द का नही करना चाहिए प्रयोग

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posted on : सितम्बर 20, 2020 6:22 अपराह्न

देहरादून : निष्काम कर्म के अन्र्तगत निष्काम व्यवहार भी करना चाहिए। हर व्यक्ति की राय को रिगार्ड देना है। चाहे कोई छोटा हो या बडा हो लेकिन किसी के राय को ठुकराना अर्थात अपने आप को ठुकाराना होता है।

पहले तो किसी व्यक्ति को जरूर रिगार्ड देना चाहिए, भले ही वह व्यक्ति हमें उपदेश देने का प्रयास कर रहा हो। पहले से ही उसकी बात को कट नही करना चाहिए। हमें पहले ही नही कहना चाहिए कि यह राॅग है, यह तो हो ही नही सकता। ऐसा करके हम हम उसकी राॅय का डिसरिगार्ड कर देते है। इससे उस व्यक्ति में डिसरिगार्ड की बीज पड जाता है। आज हमने उसे डिसरिगार्ड दिया है कल वह हमें डिसरिगार्ड देगा।

चूहा काटने से पहले फूक मारता है इसलिए यदि कोई व्यर्थ भी करता है तब उसे रिगार्ड देना है, इसके बाद वह शान्त हो जायेगा, शान्त होने के बाद उसकी बात को कट करना है। ऐसा करने पर वह व्यक्ति हमसे नाराज नही होगा बल्कि समझेगा की हमें श्रीमत मिल रही है। रिगार्ड देने पर वह व्यक्ति हमे अपना शुभचिन्तक मानेगा। किसी को खुश करके काम निकालना सहज होता है।

                                                                                             मनोज श्रीवास्तव

पहले ही किसी बात को कट नही करना है, क्यो, क्या की जगह बहुत अच्छा, बहुत अच्छा शब्द बोल कर रिगार्ड देना है। पहले ना शब्द का प्रयोग नही करना चाहिए। ना शब्द का प्रयोग करने वाले नास्तिक कहलाते है। पहले सदैव हाॅ शब्द का प्रयोग करना चाहिए।

चीज भले कैसी हो लेकिन उसकी डिब्बी, पैकेजिंग से लोग अधिक प्रभावित होते है। इसी प्रकार किसी के सम्पर्क में आने पर अपने व्यवहार शब्द में ना की रूपरेखा नही रखनी चाहिए। जब हम शुभ कल्याण की भावना रखते है तो शब्द युक्तियुक्त शब्द स्वत निकलता है।

पहले स्वमान सेल्फ रिस्पेक्ट में रह कर दूसरों को मान रिस्पेक्ट देना है क्योकि आजकल लोगों के पास ठुकराने के बाद ही रिस्पेक्ट लेने जाते है। इसलिए हमें पहले डिसरिगार्ड नही देना है बल्कि पहले रिगार्ड देकर तब उसकी बात काटनी है।

दूसरों की विशेषता का वर्णन पहले करना है और कमजोरी का वर्णन बाद मंे करना है। जैसे आपरेशन करते समय इन्जेक्शन देकर सुध बुध को भूला दिया जाता है। उसी प्रकार पहले रिगार्ड देकर नशे में लाकर आपरेशन किया जाता है, तभी आपरेशन सक्सेसफुल होता है।
कुछ भी करने पर उस फल की प्राप्ति जरूर होती है। लेकिन हमें कच्चा फल नही खाना है बल्कि पका फल खाना है। जो कुछ किया उसके फल की इच्छा सुक्ष्म में जरूर होती है। अर्थात किया और तुरन्त फल खाया, ऐसा करके हम फलस्वरूप नही बन सकेंगे। सभी बाते तो बीच में ही आकर अटक जाती है।

फल की इच्छाएं भी भिन्न-भिन्न प्रकार की है, जिसके कारण हमारे पास दुखों की अपार लिस्ट है। वैसे भी फल की इच्छा और उसका रिस्पान्स सूक्ष्म में जरूर होता है। बिल्कुल निष्काम वृति हो यह होना कठिन होता है। लेकिन अपने को आगे बढाने के लिए और रिजल्ट लेने के लिए अपनी उन्नति को जानना भी जरूरी होता है। अच्छे बुरे की कामना रखना अच्छी बात है।

अभी किया और अभी लिया अर्थात जमा कुछ भी नही किया। इसका अर्थ है कि हमने केवल कमाया और खाया है। जमा नही करने से विल पावर नही आती है, हम अन्दर से कमजोर रहते है। शक्तिशाली महसूस न करने के कारण खाली-खाली रहते है। भरी हुई चीज ही पावरफुल रहती है। मुख्य कारण है कि हमें पका फल खाना चाहिए और फल पकने का अवसर देना चाहिए।

एकता का अर्थ एक बार, एक नीति, एक गति और एक रीति से चलना है। एकता के आधार पर हम चैलेन्ज करने वाले बन जाते है। इसलिए क्या, क्यो और कैसे शब्द भी समाप्त हो जाते है। हम सभी प्रकार के कारण का निवारण करने वाले बन जाते है। कारण शब्द को समाप्त कर देना है। इसके लिए चेक करना है कि कारण शब्द की रचना कहा कहा होती है और कारण शब्द का बीज कहा से निकलता है।

किसी न किसी प्रकार से हमारे मन्सा, वाचा कर्मणा से जो भी कमजोरी पैदा होती है, उस कमजोरी के कारण ही कारण शब्द पैदा होता है। कारण शब्द रचना एक व्यर्थ है। इसलिए जब रचना ही उल्टी है तब उसे वहीं पर समाप्त कर देना चाहिए। हमें कारण शब्द को लेकर आगे नही बढना चाहिए। जैसे हम कहते है कि फलाने कारण का निवारण हो जब आगे बढे, जब उस कारण का निवारण हो जायेगा तभी कार्य होगा लेकिन यह विघ्न तभी हटेगा जब हमारी भाषा चेंज होगी।

जो व्यक्ति हर प्रकार के कारण का निवारण देने वाला हो वह किसी भी कारण का आधार कैसे ले सकता है। जब सभी आधार समाप्त हो जाते है तब देह अभियान, इगो स्वतः ही समाप्त हो जाता है। क्योकि जब बाते खत्म हो जायेगी तब उसका परिणाम भी समाप्त हो जायेगा।

चेक करे कि क्या हम अभी भी छोटे-छोटे कारण से भिन्न प्रकार के इगो में तो नही आ जाते है। इगो छोडने के लिए अपनी भाषा, वृति में चेंज लाना होगा। यदि किसी चीज, समय, स्थान, परिस्थिति और स्थिति में यथार्थ भाव को देखते है अर्थात जो चीज जैसी हो उसे वैसे ही देखते है तब इगो के प्रभाव से बच जायेंगे।

कोई कितना भी विघ्न स्वरूप बने लेकिन हमारा भाव उसके प्रति शुभचिन्तक सम्मान हो और अपकारी पर भी उपकार करने का भाव हो। कोई बार-बार हमें गिराने की कोशिश करें, डगमग करे फिर भी उसके प्रति शुभचिन्तक का अडोल भाव बना रहें। क्योकि इन बातों में टाइम बहुत वेस्ट हो जाता है। वैसे भी बचपन में टाइम वेस्ट हो चुका है अब समझदार बनने के बाद अपने टाइम को वेस्ट नही करना है।

हम विश्व कल्याण के निमित्त बने है। हद का कल्याण करने वाले तो बहुत मिलते है लेकिन हम बेहद का कल्याण करने वाले है। प्रत्यक्ष का फल मिलने का अर्थ यह नही है कि एक ही दिन में हम सम्पूर्ण बन जायेंगे।

अव्यक्त महावाक्य बाप दादा मुरली, 19 जुलाई 1972

लेखक : मनोज श्रीवास्तव, सहायक निदेशक सूचना एवं लोकसम्पर्क विभाग उत्तराखंड

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