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आयुर्वेदिक अस्पतालों का क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के अंतर्गत पंजीकरण आयुर्वेद विभाग में हो एवं दी जाए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से निजात

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posted on : सितम्बर 14, 2020 3:14 अपराह्न

देहरादून : आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सकों द्वारा क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के अंतर्गत जिला स्तर पर स्वास्थ्य विभाग में सीएमओ कार्यालय में अनिवार्य पंजीकरण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में भी अनिवार्य पंजीकरण व्यवस्था का लम्बे समय से विरोध किया जा रहा है।

राजकीय​ आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा सेवा संघ उत्तराखंड पंजीकृत के प्रदेश मीडिया प्रभारी डॉ. डी. सी. पसबोला द्वारा इन दोनों ही प्रकरणों में व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता बतायी गयी है। उनके द्वारा दोनों ही प्रकरणों के बारे जानकारी देते हुए बताया गया कि वर्तमान में क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के अंतर्गत राज्य के सभी आयुष चिकित्सालयों का पंजीकरण सीएमओ कार्यालय के अंतर्गत किया जा रहा है एवं आयुष चिकित्सालयों निरीक्षण भी सीएमओ एवं आईएमए अध्यक्ष के द्वारा किया जाता है, जिनके द्वारा निरीक्षण के दौरान आयुष चिकित्सकों के साथ भेदभाव एवं उनका उत्पीड़न (सौतेला व्यवहार) किया जाता है। जबकि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सालयों​ का क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के अंतर्गत पंजीकरण जिला/क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी के कार्यालय में ही किए जाने की व्यवस्था है। उत्तराखंड राज्य में भी ऐसी ही व्यवस्था मांग की जा रही है।

डॉ. डी. सी. पसबोला ने बताया कि आयुष चिकित्सा पद्धति के उपचार के दौरान किसी भी प्रकार का निदानात्मक (Diagnostic), उपचारात्मक (Therapeutic) एवं टीकाकरण (Immunisation) संबधी बायोमेडिकल वेस्ट उत्सर्जित नहीं होता है, फिर भी आयुष चिकित्सालयों​ को एलोपैथिक चिकित्सालयों​ की तरह बायोमेडिकल वेस्ट मेनेजमेंट एजेंसी से अनुबंध करने के लिए बाध्य किया जा रहा है, जबकि ठोस अपशिष्ट जैसे गत्ता, डिब्बा, प्लास्टिक, तेल, काष्ठ औषधीय आदि इत्यादि का प्रबन्धन नगरनिकाय की ठोस अपशिष्ट प्रबंधन करने वाली एजेंसी के माध्यम से ही किया जा सकता है, इसके लिए बायोमेडिकल अपशिष्ट प्रबंधन एंजेसी अनुबंध किए जाने की बाध्यता प्रतीत नहीं होती है। ऐसे में इन अस्पतालों एवं क्लीनिकों को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एनओसी लेने की व्यवस्था से छूट दी जाए। कई राज्यों में केरल, दिल्ली और कर्नाटक में छूट प्राप्त है। ऐसे में यह छूट उत्तराखंड राज्य में भी दी जाए।

डॉ. डी. सी. पसबोला ने बताया कि इस सम्बन्ध में निदेशक, आयुर्वेदिक एवं यूनानी सेवाएं, उत्तराखंड, देहरादून द्वारा सचिव आयुष एवं आयुष शिक्षा, उत्तराखंड शासन एवं रजिस्ट्रार, भारतीय चिकित्सा परिषद, उत्तराखंड को एक पत्र संख्या:3811-13/जी-387/चिकित्सा परिषद्/ 2019-20 देहरादून दिनांक 07 सितम्बर 2020 को प्रेषित किया गया है। इसी सम्बन्ध में निर्वाचित सदस्य भारतीय चिकित्सा परिषद्, डॉ. महेन्द्र राणा, डॉ. चन्द्रशेखर वर्मा एवं वित्त नियंत्रक, उत्तराखंड होम्योपैथिक मेडिसिन बोर्ड श्री अनिल जोशी ने भी सदस्य सचिव- उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, अध्यक्ष- उत्तराखंड होम्योपैथिक मेडिसिन बोर्ड, अध्यक्ष,भारतीय चिकित्सा परिषद्, उत्तराखंड, मुख्य सचिव, आयुष सचिव, एवं आयुष मंत्री को भी पत्र लिखा है। प्रान्तीय संघ अध्यक्ष डॉ. के. एस. नपलच्याल, उपाध्यक्ष डॉ. अजय चमोला एवं महासचिव डॉ. हरदेव रावत ने भी वर्तमान व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया है।

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