गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड की राजनीति में राष्ट्रीय दलों के विकल्प के तौर पर उभरने की कोशिश कर रही उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक सक्रियता को मजबूत सांगठनिक ढांचे में बदलने की है। दल के सामने जमीनी स्तर पर संगठन के विस्तार का अभाव अब भी बड़ी बाधा बना हुआ है।
यूकेडी लंबे समय से पंचायत और निकाय चुनावों को संगठन विस्तार के प्रभावी माध्यम के रूप में इस्तेमाल नहीं कर पाई। विधानसभा चुनावों के दौरान पार्टी की सक्रियता जरूर दिखाई देती है, लेकिन चुनावी गतिविधियों के बाद गांवों तक संगठन को लगातार सक्रिय रखने की चुनौती बनी रहती है। इसका नतीजा यह है कि प्रदेश के कई क्षेत्रों में यूकेडी की मौजूदगी तो है, लेकिन बूथ और पंचायत स्तर पर मजबूत संगठनात्मक ढांचा दिखाई नहीं देता।
वहीं भाजपा और कांग्रेस ने लंबे समय से अपनी राजनीति को गांव की चैपाल से लेकर बूथ तक पहुंचाने पर जोर दिया है। दोनों राष्ट्रीय दलों का पंचायत, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत और निकाय चुनावों में लगातार सक्रिय रहना उनके संगठन को जमीनी आधार देता रहा है। स्थानीय चुनावों में कार्यकर्ताओं की भागीदारी के जरिए दोनों दलों ने गांव-गांव तक अपना नेटवर्क तैयार किया है।
यूकेडी के लिए यही अंतर अब बड़ी चुनौती बनकर सामने है। पार्टी यदि 2027 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय दलों को चुनौती देने की तैयारी कर रही है तो केवल राजनीतिक मुद्दों और चुनावी सक्रियता के भरोसे यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं होगा। उसे पंचायत स्तर से नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने, बूथ कमेटियां बनाने और स्थानीय चुनावों में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत होगी।
दल के सामने दूसरी चुनौती पुराने संगठन को सक्रिय करने के साथ नई पीढ़ी को जोड़ने की भी है। राज्य आंदोलन की राजनीति से निकली यूकेडी की अपनी ऐतिहासिक पहचान है, लेकिन नई पीढ़ी के मतदाताओं के बीच इस पहचान को मजबूत राजनीतिक आधार में बदलना आसान नहीं है। इसके लिए पार्टी को स्थानीय मुद्दों पर लगातार आंदोलन और जनसंपर्क के साथ संगठन का विस्तार करना होगा।
राजनीतिक तौर पर यूकेडी को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों में हलचल बढ़ रही है। दोनों दल अपने-अपने राजनीतिक समीकरण के हिसाब से यूकेडी के संभावित प्रभाव का आकलन कर रहे हैं। लेकिन यूकेडी के सामने सवाल यह है कि संभावित राजनीतिक माहौल को वोट में बदलने के लिए उसके पास गांव और बूथ स्तर पर कितना मजबूत संगठन मौजूद है।
ऐसे में यूकेडी की असली परीक्षा केवल चुनाव लड़ने में नहीं, बल्कि चुनाव से पहले गांव-गांव संगठन खड़ा करने में होगी। यदि पार्टी पंचायत और निकाय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत कर पाती है तो वह राष्ट्रीय दलों के लिए वास्तविक चुनौती बन सकती है। वरना राजनीतिक विकल्प बनने की उसकी कोशिश संगठनात्मक कमजोरी के कारण सीमित रह सकती है।




