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डॉ. राधाकृष्णन पिल्लई की अंतिम कृति ‘अर्थशास्त्र: द आर्ट ऑफ लीडरशिप’ का लोकार्पण

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posted on : अगस्त 17, 2026 11:56 अपराह्न

मुंबई :  दिवंगत लेखक, शिक्षक और विचारक डॉ. राधाकृष्णन पिल्लई की अंतिम साहित्यिक कृति ‘अर्थशास्त्र: द आर्ट ऑफ लीडरशिप’ का शनिवार को मुंबई विश्वविद्यालय में औपचारिक लोकार्पण किया गया। यह कार्यक्रम पुस्तक विमोचन के साथ-साथ डॉ. पिल्लई के साहित्यिक, शैक्षणिक और बौद्धिक योगदान को समर्पित श्रद्धांजलि भी बना।

डॉ. पिल्लई के निधन के कुछ महीनों बाद आयोजित इस समारोह में शिक्षाविदों, अकादमिक जगत से जुड़े लोगों, पेशेवरों, उद्यमियों, विद्यार्थियों, पाठकों और उनके शुभचिंतकों ने भाग लिया। कार्यक्रम में उनके लेखन और विचारों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक जीवन से जोड़ने के प्रयासों को याद किया गया।

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प्राचीन ज्ञान और आधुनिक नेतृत्व का संगम

‘अर्थशास्त्र: द आर्ट ऑफ लीडरशिप’ कौटिल्य के प्रसिद्ध ‘अर्थशास्त्र’ से प्रेरित है। पुस्तक में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के सिद्धांतों को आधुनिक नेतृत्व, प्रबंधन, शासन और निर्णय लेने की प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास किया गया है।

डॉ. पिल्लई प्राचीन भारतीय ग्रंथों और विचारों को सरल एवं व्यावहारिक भाषा में आधुनिक पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते थे। उनका मानना था कि हजारों वर्ष पुरानी भारतीय ज्ञान परंपरा आज के बदलते सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक परिवेश में भी मार्गदर्शन दे सकती है।

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पुस्तक में नेतृत्व के साथ जुड़ी जिम्मेदारी, रणनीतिक सोच, निर्णय क्षमता, अनुशासन और शासन जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई है। यही कारण है कि यह कृति विद्यार्थियों, युवा पेशेवरों, उद्यमियों और नेतृत्व की भूमिका से जुड़े लोगों के लिए उपयोगी मानी जा रही है।

कई विशिष्ट हस्तियां रहीं मौजूद

समारोह में डॉ. राजन वेलुकर की विशेष उपस्थिति रही। वे शिक्षाविद् एवं अकादमिक प्रशासक हैं और वर्तमान में ATLAS SkillTech University, Mumbai के कुलपति हैं। वे वर्ष 2010 से 2015 तक मुंबई विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके हैं। उनकी मौजूदगी ने कार्यक्रम को विशेष अकादमिक महत्व प्रदान किया।

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इस अवसर पर मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी डी. शिवानंदन भी मौजूद रहे। तीन दशक से अधिक लंबे अपने सेवाकाल में उन्होंने पुलिस प्रशासन, रणनीतिक पुलिसिंग और कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। नेतृत्व, निर्णय क्षमता और सार्वजनिक सेवा से जुड़े विषयों पर केंद्रित कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति विशेष रही।

डॉ. शुभदा जोशी, प्रतिष्ठित दार्शनिक, शिक्षाविद् और लेखिका, ने भी समारोह में सहभागिता की। वे मुंबई विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष रह चुकी हैं। भारतीय दर्शन और समकालीन विचारों के बीच संबंधों पर उनके अकादमिक कार्य ने कार्यक्रम को दार्शनिक आयाम प्रदान किया।

डॉ. पिल्लई की विचारधारा को आगे बढ़ाने की कोशिश

समारोह में वक्ताओं और उपस्थित लोगों ने कहा कि डॉ. पिल्लई का योगदान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं था। उन्होंने अपने व्याख्यानों, शैक्षणिक पहलों और विद्यार्थियों तथा पेशेवरों के साथ संवाद के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को वर्तमान संदर्भों में समझने के लिए लोगों को प्रेरित किया।

उनकी अंतिम पुस्तक इसी विचारधारा की निरंतरता है। इसमें कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में वर्णित शासन, रणनीति, अर्थव्यवस्था और नेतृत्व संबंधी अवधारणाओं को आधुनिक संदर्भों में देखने का प्रयास किया गया है।

कार्यक्रम में यह भी रेखांकित किया गया कि आज नेतृत्व का महत्व केवल राजनीति या प्रशासन तक सीमित नहीं है। व्यापार, शिक्षा, उद्यमिता, सामाजिक विकास और राष्ट्र-निर्माण सहित विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावी नेतृत्व की आवश्यकता है। ऐसे में प्राचीन भारतीय चिंतन में मौजूद रणनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक हो सकते हैं।

पाठकों और विद्यार्थियों ने किया स्मरण

डॉ. पिल्लई के निधन के बाद आयोजित इस समारोह का भावनात्मक पक्ष भी महत्वपूर्ण रहा। उनके विद्यार्थी, पाठक और उनसे जुड़े पेशेवर इस अवसर पर उन्हें याद करने के लिए एकत्र हुए।

उपस्थित लोगों ने कहा कि किसी लेखक की विरासत केवल उसकी पुस्तकों तक सीमित नहीं रहती। उसके विचार उन पाठकों, विद्यार्थियों और लोगों के माध्यम से आगे बढ़ते हैं, जिन्हें उसके लेखन और शिक्षाओं से प्रेरणा मिलती है।

मुंबई विश्वविद्यालय में आयोजित पुस्तक लोकार्पण समारोह इसी भावना का प्रतीक बना। कार्यक्रम में डॉ. पिल्लई के साहित्यिक सफर, भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति उनके समर्पण और आधुनिक नेतृत्व को लेकर उनके विचारों को याद किया गया।

‘अर्थशास्त्र: द आर्ट ऑफ लीडरशिप’ का लोकार्पण इस दृष्टि से डॉ. राधाकृष्णन पिल्लई की साहित्यिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। उनकी अंतिम कृति के माध्यम से भारतीय चिंतन, नेतृत्व और ज्ञान परंपरा से जुड़े उनके विचार आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचने की उम्मीद है।

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