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19 सीटों पर कांग्रेस को तलाशने होंगे नए उम्मीदवार, दावेदारों को साधना चुनौती

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posted on : अगस्त 10, 2026 1:26 पूर्वाह्न

-दूसरी पांत के नेताओं को साधना आसान नहीं, कई सीटों पर दावेदारों की लंबी कतार

गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच सत्ता में वापसी की कोशिश में जुटी कांग्रेस के सामने अब 19 विधानसभा सीटों पर नए प्रत्याशियों के चयन की चुनौती खड़ी हो गई है। 2022 में इन सीटों पर चुनाव लड़ने वाले कई नेता भाजपा अथवा अन्य दलों का रुख कर चुके हैं, जबकि डोईवाला सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी रहे हीरा सिंह बिष्ट के निधन के बाद यहां भी नए चेहरे की तलाश करनी होगी। ऐसे में दूसरी पांत के नेताओं को टिकट देकर साधना कांग्रेस के रणनीतिकारों के लिए आसान नहीं होगा।

2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कई सीटों पर अपने पुराने और अनुभवी नेताओं को मैदान में उतारा था। चुनाव में जीत हासिल करने वाले 20 कांग्रेस विधायक मौजूदा विधानसभा में पार्टी का आधार बने हुए हैं। इनमें से अधिकांश की 2027 के लिए दावेदारी मजबूत मानी जा रही है। दूसरी ओर जिन सीटों पर पार्टी को हार मिली थी, उनमें से कई पर उस समय के प्रत्याशी अब कांग्रेस के साथ नहीं हैं।

बदरीनाथ विधानसभा सीट इसका प्रमुख उदाहरण है। कांग्रेस ने 2022 में राजेंद्र सिंह भंडारी को प्रत्याशी बनाया था और वह गढ़वाल संसदीय क्षेत्र की एकमात्र सीट जीतने में सफल रहे थे। हालांकि 2024 में भंडारी कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने लखपत बुटोला को प्रत्याशी बनाया और उन्होंने भाजपा के भंडारी को हराकर विधानसभा में प्रवेश किया। ऐसे में बदरीनाथ सीट पर कांग्रेस के सामने फिलहाल नए चेहरे की तलाश की मजबूरी नहीं है। बुटोला की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है, हालांकि पार्टी के भीतर अन्य नेता भी टिकट के लिए सक्रिय हैं।

इसके विपरीत पुरोला, यमुनोत्री, गंगोत्री, धनोल्टी, पौड़ी, लैंसडाउन, चैबट्टाखाल, यमकेश्वर, खानपुर, रुड़की, कालाढूंगी, रुद्रपुर, भीमताल, बागेश्वर और धर्मपुर जैसी सीटों पर 2022 में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे कई नेता अब भाजपा अथवा अन्य दलों में जा चुके हैं। डोईवाला में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हीरा सिंह बिष्ट के निधन से पार्टी के सामने एक और सीट पर नए चेहरे के चयन की चुनौती है।

इन सीटों पर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती दूसरी पांत के नेताओं को लेकर है। पार्टी में दावेदारों की कमी नहीं है और कई नेता लंबे समय से अपनी-अपनी विधानसभा सीटों पर सक्रिय हैं। ऐसे में टिकट वितरण के दौरान किसी एक दावेदार के पक्ष में फैसला लेना पार्टी के लिए भीतरघात और असंतोष की चुनौती भी पैदा कर सकता है।

कांग्रेस के लिए यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी इस बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चुनावी तैयारियों में जुटी है। पार्टी के भीतर संगठन विस्तार से लेकर चुनावी रणनीति तक पर काम चल रहा है। वहीं भाजपा के आंतरिक सर्वे में कुछ मौजूदा विधायकों की स्थिति कमजोर होने की चर्चाओं ने कांग्रेस की उम्मीदों को और बढ़ाया है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि भाजपा एंटी इनकंबेंसी से निपटने के लिए कुछ सीटों पर नए चेहरों को मैदान में उतार सकती है।

ऐसे हालात में कांग्रेस के सामने खाली हुई सीटों पर मजबूत और जिताऊ चेहरे तलाशने की चुनौती है। पार्टी को ऐसे प्रत्याशी चुनने होंगे जो न केवल संगठन को एकजुट रख सकें, बल्कि भाजपा के संभावित नए चेहरों को भी कड़ी चुनौती दे सकें।

कांग्रेस चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉ. हरक सिंह रावत पहले ही पार्टी के 40 से 45 सीटों पर जीत दर्ज कर सरकार बनाने का दावा कर चुके हैं। ऐसे में उनके इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रत्याशी चयन बेहद अहम माना जा रहा है।

अब नजर इस बात पर रहेगी कि कांग्रेस 2022 में खाली हुई इन सीटों पर दूसरी पांत के नेताओं में से किसे मौका देती है। टिकट वितरण में संतुलन साधने और दावेदारों को एकजुट रखने की रणनीति ही कांग्रेस की चुनावी सफलता की पहली बड़ी परीक्षा साबित हो सकती है।

 

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