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उत्तराखंड में ST प्रमाण पत्रों की जांच की मांग, राज्य गठन के बाद बने सभी प्रमाण पत्रों की हो समीक्षा

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posted on : जून 17, 2026 1:44 अपराह्न

देहरादून। उत्तराखंड में अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाण पत्रों के जारी होने और उनके आधार पर प्राप्त सरकारी लाभों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने राज्य गठन के बाद जारी सभी एसटी प्रमाण पत्रों की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग उठाई है।

विकेश सिंह नेगी ने मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन को पत्र भेजकर कहा है कि 28 नवंबर 2000 को राज्य गठन के बाद अब तक जारी किए गए सभी अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्रों की निष्पक्ष और व्यापक जांच कराई जानी चाहिए। उनका कहना है कि यदि किसी भी प्रमाण पत्र को संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के विपरीत जारी किया गया है, तो उसके आधार पर प्राप्त सरकारी नौकरियों, पदोन्नतियों, छात्रवृत्तियों, मुआवजों, भूमि आवंटन तथा अन्य आरक्षण संबंधी लाभों की भी समीक्षा की जानी चाहिए।

नेगी ने अपने पत्र में भारतीय संविधान के अनुच्छेद-342 का उल्लेख करते हुए कहा है कि अनुसूचित जनजातियों की सूची निर्धारित करने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को प्राप्त है, जबकि उसमें किसी भी प्रकार का संशोधन या नई जाति को शामिल करने का अधिकार संसद के पास सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण को इस सूची में बदलाव करने का अधिकार नहीं है।

उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मिलिंद (2000) मामले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया था कि अनुसूचित जनजाति सूची को उसी स्वरूप में स्वीकार किया जाएगा, जैसा राष्ट्रपति की अधिसूचना में उल्लेखित है। किसी जाति, उपजाति अथवा स्थानीय पहचान को तब तक अनुसूचित जनजाति नहीं माना जा सकता, जब तक उसका स्पष्ट उल्लेख अधिसूचित सूची में न हो।

विकेश नेगी का आरोप है कि देहरादून जनपद के विकासनगर, कालसी, त्यूनी, चकराता सहित अन्य क्षेत्रों में वर्षों से एसटी प्रमाण पत्रों के जारी होने को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है। उनका कहना है कि यह मामला केवल देहरादून तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के सभी 13 जनपदों में जारी एसटी प्रमाण पत्रों की प्रक्रिया की समीक्षा की जानी चाहिए।

उन्होंने दावा किया कि कई मामलों में राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची से इतर नामों अथवा उपजातियों के आधार पर भी प्रमाण पत्र जारी किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। यदि जांच में ऐसे मामले सही पाए जाते हैं, तो यह संवैधानिक व्यवस्था और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के विपरीत माना जाएगा।

नेगी ने सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (2024) फैसले का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें सामाजिक न्याय के उद्देश्य से उप-वर्गीकरण कर सकती हैं, लेकिन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की मूल सूची में नई जाति जोड़ने अथवा नाम परिवर्तन करने का अधिकार केवल संसद के पास है।

उन्होंने बताया कि इस विषय पर केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय से भी पत्राचार किया गया था। मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जनजातियों से संबंधित विषय संविधान के अनुच्छेद-342 के अंतर्गत आता है और इस संबंध में अंतिम निर्णय संसद के माध्यम से ही संभव है।

मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में नेगी ने मांग की है कि वर्ष 2000 के बाद जारी सभी विवादित एसटी प्रमाण पत्रों की जांच कराई जाए तथा जो प्रमाण पत्र संवैधानिक और कानूनी मानकों के अनुरूप नहीं पाए जाते हैं, उन्हें निरस्त किया जाए। साथ ही उनके आधार पर प्राप्त सरकारी लाभों की विधिक समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

उन्होंने यह भी मांग उठाई कि यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके विरुद्ध विभागीय, दंडात्मक एवं आपराधिक कार्रवाई की जाए। इसके अलावा सभी विभागों, विश्वविद्यालयों, आयोगों, निगमों, शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, पंचायत और स्थानीय निकायों से ऐसे लाभार्थियों का विवरण सार्वजनिक किया जाए, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बन सके।

विकेश सिंह नेगी ने कहा कि यह विषय लाखों युवाओं के भविष्य और वास्तविक जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार इस मामले में समयबद्ध और प्रभावी कार्रवाई नहीं करती है, तो इस मुद्दे को न्यायालय तथा राष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया जाएगा।

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