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भगवान विष्णु के साथ शिव-पार्वती से जुड़ा है आमलकी या रंगभरी एकादशी

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posted on : मार्च 3, 2023 4:37 अपराह्न

दिल्ली : आमलकी एकादशी व्रत आज 3 मार्च को है। होली से पहले आमलकी एकादशी का विशेष महत्व है। क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ शंकर-पार्वती के साथ होली खेलने की परंपरा है, इसलिए इसे रंगभरी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, आमलकी एकादशी के दिन आंवले से श्रीहरि की पूजा करने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है। आंवला हमारे जीवन में बहुत महत्व रखता है।


आंवले का धार्मिक महत्व

पौराणिक मान्यता के अनुसार जब ब्रह्म देव श्रीहरि से अपनी उत्पत्ति का उद्देश्य जानने आए तो वह नारायण को देखकर भावुक हो गए। जमीन पर उनकी आंखों से छलके आंसू जहां गिरे वहां आंवले का वृक्ष उत्पन्न हो गया। कहते हैं कि भगवान विष्णु ने आंवले को आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया। तभी से ये पेड़ ‌विष्णु जी को अति प्रिय है और इसे पूजनीय माना जाने लगा। इसमें त्रिदेव का वास होता है। ब्रह्माजी आंवले के पेड़ के ऊपरी हिस्से में, शिवजी बीच में और भगवान विष्णु आंवले के पेड़ की जड़ में रहते हैं।  मान्यता है कि आमलकी एकादशी पर आंवले का दान करने एक हजार गायों के दान के बराबर फल मिलता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

रहेंगे खास योग

इस बार रंगभरी एकादशी 2023 के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है, ऐसे में ये इसे और भी शुभ बना रहा है। ज्योतिष के जानकारों के अनुसार सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 06 बजकर 32 मिनट से प्रारंभ होकर रात 10 बजकर 08 मिनट तक चलेगा। वहीं रात 10 बजकर 08 मिनट तक रंगभरी एकादशी में पुष्य नक्षत्र रहेगा।

महत्व

रंगभरी एकादशी का अपना एक विशेष महत्व है। इसका संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से भी है। मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान शिव पहली बार माता पार्वती को काशी लाए थे। माना जाता है कि बाबा विश्वनाथ जब शादी के बाद पहली बार माता गौरी को काशी लाए, तो यहां उनका रंग और गुलाल से स्वागत किया गया। इसी कारण काशी में हर साल रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की पूजा की जाती है और नगर में विवाह के बाद गौना या विदाई की शोभायात्रा भी निकाली जाती है। इस दिन बाबा विश्वनाथ और माता पार्वती की मूर्तियों को पूरे शहर में निकाला जाता है और रंग-बिरंगे गुलाल और फूलों से उनका स्वागत किया जाता है। रंगभरी एकादशी पर काशी विश्वनाथ मंदिर में विशेष पूजा और कई उत्सवों का आयोजन किया जाता है।

पूजा विधि

  • भगवान की पूजा के पश्चात पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करें। सबसे पहले वृक्ष के चारों की भूमि को साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें।
  • पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमंत्रित करें।
  • कलश में सुगंधी और पंच रत्न रखें। इसके ऊपर पंच पल्लव रखें फिर दीप जलाकर रखें। कलश पर श्रीखंड चंदन का लेप करें और वस्त्र पहनाएं।
  • अंत में कलश के ऊपर श्री विष्णु के छठे अवतार परशुराम की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुरामजी की पूजा करें।
  • रात्रि में भगवत कथा व भजन-कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें।
  • द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मण को भोजन करवा कर दक्षिणा दें साथ ही परशुराम की मूर्तिसहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें। इन क्रियाओं के पश्चात परायण करके अन्न जल ग्रहण करें।

 

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