कोटद्वार । कर अधिवक्ताओं ने शुक्रवार को कर प्रणाली को लेकर एक ज्ञापन सौंपा जिसमें उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में कर प्रणाली जटिल होती जा रही है जिसे समझना हर व्यवसायी के बस की बात नहीं है इसलिए इस कर प्रणाली में शिथिलता अपनानी चाहिए । उन्होंने बताया कि हर व्यवसाय के पास कंप्यूटर सिस्टम को समझने की क्षमता नहीं है । व्यवसाई कर कानूनों का पालन करने की स्थिति में भ्रम में ही रहता है साथ ही तनावपूर्ण भी रहता है ।छोटे और मझोले करदाताओं को खरीद-फरोख्त, रिकवरी, बैंक लोन, अकाउंटिंग, टैक्स लॉ की पूर्ति जैसे काम खुद करने पड़ते हैं। पिछले तीन से पांच वर्षों में कर कानूनों के तहत प्रावधान अधिक से अधिक कठोर और दमनकारी हो गए हैं । ई-गवर्नेंस और शक्तियों के बावजूद कर विभाग कर चोरी को गिरफ्तार करने में विफल रहे हैं । इसलिए हर साल सरकार ईमानदार करदाताओं पर जटिल प्रावधानों और अनुपालन का बोझ लगाती है। छोटे, मझोले ईमानदार व्यापारियों को सबसे ज्यादा परेशानी होती है। ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिनसे निपटना सामान्य क्षमता से परे है ।
यहां तक कि अगर कोई कानून को नहीं समझता है तो इतने सारे अलग-अलग रिटर्न और जानकारी प्रस्तुत की जानी है । आपको प्रत्येक अधिनियम की आवश्यकता पर विचार करते हुए जानकारी रखनी होगी। कुछ रिटर्न और टैक्स पेमेंट मासिक है और कुछ तिमाही। जीएसटी कानून रिटर्न में सुधार या संशोधन की अनुमति नहीं देता है। वास्तविक और अनजाने में गलती का कोई बहाना नहीं । इससे तनाव बढ़ता है। हमारी एकमात्र चिंता यह है कि छोटे और मझोले व्यवसायों पर कर कानूनों के अनुपालन का बोझ कम किया जाना चाहिए और उन्हें और अधिक सहनीय बनाया जाना चाहिए । उन्होंने जीएसटी को रद्द करने की बात कही । ज्ञापन देने में रमेश वर्मा, अमिताभ अग्रवाल, धीरेन्द्र रावत, द्वारिका प्रसाद अग्रवाल, विजेन्द्र अग्रवाल, अतुल अग्रवाल, संजीव सक्सेना सहित अन्य अधिवक्ता भी मौजूद रहे ।





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