posted on : मार्च 7, 2022 4:21 अपराह्न
कोटद्वार : उत्तराखण्ड विकास पार्टी ने दी डॉ. बलबीर सिंह रावत जी को श्रद्धांजलि। आज के ही दिन सन 2016 में उनका देहांत हो गया था । डॉ. बलबीर सिंह रावत जी का जन्म 31 दिसंबर 1928 को ठाकुर सुल्तान सिंह जी और श्रीमती सरला देवी के पहले पुत्र के रूप में हुआ। उनका पैतृक गाँव गोर्ली है जो एकेश्वर ब्लॉक , जिला पौड़ी में स्थित है। उ्न्होंने हाई स्कूल, किंग जॉर्ज गवर्नमेंट हाई स्कूल लैंसडौन ( जयहरीखाल से किया। कॉलेज की पढ़ाई बलवंत राजपूत कॉलेज ( अब राजा बलवंत सिंह कॉलेज ) आगरा में की। बी- एस. सी. (कृषि ) बॉटनी हॉर्टिकल्चर , एम एस सी ( कृषि ) पशुपालन और डेरयिंग, प्रथम डिवीजन से 1953 में पास की। सबसे पहली नौकरी भोपाल के विकास विभाग के खंड में प्रसार अधिकारी के पद पर की जहाँ चार साल 250 गावों में घूम -घूम के कृषि, बागवानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेय जल, आवागमन, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के काम किये और तब उन्हें विदेश में उच्च पढ़ाई के लिए चुना गया। वहां से परास्नातक डेरी इकोनॉमिक्स की डिग्री ली और तदुपरांत शेरोन में ताजे दूध सप्लाई के प्रबंधन में डॉ.क्टरेट की उपाधि ली। वापस आने पर राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में रिसर्च ऑफिसर के पद पर नियुक्ति मिली। इस संस्थान में डेरी सम्बन्धी हर प्रकार का अनुसंधान होता है। इसके डेरी साइंस कॉलेज ( अब डीम्ड यूनिवर्सिटी ) में स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी की पढ़ाई और अनुसन्धान होता है। उन्होंने अनुसन्धान के द्वारा दूध और दुग्ध उत्पादों के मूल्य निर्धारण और उनके अववयों के लेखा जोखा की पद्धति विकसित की। अनुसंधान के नतीजों को किसानों तक पहुंचने के लिए संगठित ऑपरेशनल रिसर्च प्रोजेक्ट के 33 गावों में पशुपालन, दुग्ध उत्पादन और बिक्री की संगठित भागीदारी हुई। सामुदायिक गोबर गैस प्लांट के आर्थिक लाभों को उजागर किया गया। दूध का गुणवत्ता के अनुरूप खरीद की प्रणाली विकसित की।
डॉ. रावत एक अच्छे मार्गदर्शक थे। उन्होंने बीटेक के विद्यार्थियों को मैनेजमेंट पढ़ाया। इसके उपरांत उनके कॉलेज से हर साल 3-4 विद्यार्थी आईआईएम में सेलेक्ट होने लगे। उनके पढाने के कौशल के कारण संस्था के सालाना समारोह में उन्हें विधार्थियों द्वारा सर्वोत्तम टीचर घोषित किया जाता रहा। वे एमएससी डेरी इकोनॉमिक्स के एक दर्जन और पीएचडी के तीन विद्द्यार्थियों /विशेषज्ञों के मेंटर रहे। वे छह साल डेरी इकोनॉमिक्स, स्टेटिस्टिक्स के विभागाध्यक्ष रहे। कुछ काल के लिए संस्था स्थित ट्रेनर्स ट्रेनिंग सेंटर और कृषि विकास केंद्र के अध्यक्ष रहे। संस्थान की कई कमेटियों के अध्यक्ष और सदस्य रहे, स्टूडेंट्स यूनियन में विद्यार्थियों का एकेडेमिक और सांस्कृतिक सलाहकार रहे, कार्मिक वेलफेयर समिति का अधयक्ष रहे, इंडियन स्टैंडर्ड्स संस्था में डेरी स्टैंडर्ड्स उप कमिटी के सक्रिय सदस्य रहे जहां उनके अनुसन्धान के आधार पर आज की प्रचलित दूध खरीद नीति का निर्माण हुआ।
दिसंबर1988 में संस्था में प्रिंसिपल साइंटिस्ट के पद से सेवा निवृत हुए और 1991 से देहरादून में बस गये। तब से निरंतर सामजिक कार्यों में भाग लेते रहे। 2005 से 20012 तक अल्झाइमर से पीड़ित अपनी पत्नी की देख रेख का धर्म उन्होंने बखूबी निभाया। कहते है कि 36 घंटों उनकी देख रेख में रहे। उनके स्वर्गवास के बाद अपना समय सार्थक रूप से बिताने के लिए अपने बच्चों के कहने पर कम्प्यूटर ख़रीदा, सीखा और उत्तराखंड तथा देश के विकास से सम्बंधित हर पहलू पर सबके सम्पर्क में रहे। उन जैसे जीवट मनीषी का जाना वाकई समाज के लिए बहुत बड़ी क्षति है। उम्मीद है कि नई पीढ़ी उनके चिंतन-मनन का भरपूर लाभ उठा सकेगी।




