जाने कुम्भ के बारे में आद्यशंकर कैलाश पीठ उत्तर गोदावरी धाम नेपाल के श्री श्री 1008 जगदाचार्य ब्रह्मर्षि स्वामी गौरीशंकराचार्य जी महाराज के द्वारा

Publish 15-01-2019 14:04:00


जाने कुम्भ के बारे में आद्यशंकर कैलाश पीठ उत्तर गोदावरी धाम नेपाल के श्री श्री 1008 जगदाचार्य ब्रह्मर्षि स्वामी गौरीशंकराचार्य  जी महाराज के द्वारा

हरिद्वार/प्रयागराज (अवनीश) : देश विदेश में आज कुम्भ को लेकर बड़ी चर्चा है. कुम्भ क्या है और कुम्भ में क्या होता है क्या प्रभाव है कुम्भ के इन सभी बातो को लेकर आद्यशंकर कैलाश पीठ उत्तर गोदावरी धाम नेपाल के श्री श्री 1008 जगदाचार्य ब्रह्मर्षि स्वामी गौरीशंकराचार्य  जी महाराज से एक विशेष साक्षात्कार.
कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभ का अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं। जहां जब ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब कुंभ का आयोजन होता है। उन तीन नदियों के नाम है:- गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा । कुम्भ को लेकर आद्यशंकर कैलाश पीठ उत्तर गोदावरी धाम नेपाल के श्री श्री 1008 जगदाचार्य ब्रह्मर्षि स्वामी गौरीशंकराचार्य  जी महाराज से कुम्भ को लेकर एसकेजी न्यूज़ पर एक साक्षात्कार  में बताया कि .........


कुम्भ क्या है
आद्यशंकर कैलाश पीठ उत्तर गोदावरी धाम नेपाल के श्री श्री 1008 जगदाचार्य ब्रह्मर्षि स्वामी गौरीशंकराचार्य  जी महाराज ने बताया कि कुम्भ का वास्तविक प्रतीक अर्थ है पूर्णता का प्रतीक जैसे समाज एवं संसार में मनुष्य अनेक प्रकार की धन सम्पदा युक्त जीवन जीने के पश्चात भी अंतर जगद सदा खाली रहता है संसार के वैभव में यदि स्वर्ग का सिंहासन भी प्राप्त हो जाए तो वह रिक्त ही रहता है उस रिक्त को भरने का एक ही साधन है आध्यात्म अर्थात आत्मा की और , निज की ओर है . भौतिक जगद में जो कुम्भ का आयोजन किया जाता है. समाज एवं जगद के संत जन उस अमृत का पान कराकर या यूँ कहे उस परम आनन्द का अनुभव कराकर मनुष्य के जीवन को पूर्णता की और अग्रसर कराने का साधन कराते है . इस महान पर्व पर सनातन वैदिक धेम के ऋषि मुनि आचार्य एकत्रित होकर समाज को धर्ममय एवं आध्यात्म्य अर्थात पूर्णता की और अग्रसारित करने का साधन प्रदान करते है .


दान और कुम्भ है एक दुसरे के पर्याय : ब्रह्मर्षि स्वामी गौरीशंकराचार्य  जी महाराज
भारतीय शास्त्रों में चार स्थानों पर कुम्भ की स्थापना का व्याख्यान है . इन चार स्थानों के कुम्भ का प्रतीक मनुष्य के अन्दर चार मन का प्रतीक है जिनको चेतन, अवचेतन, अचेतन व अनिचेतन कहा गया है. इन चारो मनो से पार जाने की जो विधा है उसी का नाम पूर्णता अर्थात कुम्भ है . इस समय ब्रह्माण्ड ओर जगद का जो मिलन होता है सोमरस धरा पर टपकता है जिसे अमृत भी कहा जाता है उस समय किये हुए कार्य कई गुना अधिक फलदायी होते है मनुष्य के दुखो के जीवन का फल भी इन कुम्भ परम्पराओ में शामिल है. दान और कुम्भ एक दुसरे के पर्याय है . दान का महत्व कुम्भ से अलग भी एक बहुत बड़ा महत्त्व है . मनुष्य के जीवन में तीन बड़ी अशुद्धि होती है इसलिए शास्त्र कहते है मन की शुद्धि के लिए जाप , धन की शुद्धि के लिए दान व आत्मा की शुद्धि के लिए ध्यान बहुत ही महत्वपूर्ण है. कुम्भ के समय किया गया दान , किसी असहाय की कि गयी सेवा कई गुणा फलदायी होती है जिससे मनुष्य तन मन धन से वैभवशाली और सम्पन्न होता है .

समाज का विकास और पतन उसके बौधिक स्तर से ही होता है : ब्रह्मर्षि गौरीशंकराचार्य  
कुम्भ का दूसरा अर्थ पूर्णता है.  ज्ञान  और कुम्भ दोनों अलग अलग नही है. भारतीय दर्शन और भारतीय ज्ञान का अभिप्राय चारो प्रकार के मनो से पार करने की दिशा है . भारत का दर्शन अहिंसा परमो धर्मः के मार्ग पर चलने वाला है और सत्कर्म और ज्ञान से परमात्मा की और ले जाने वाला है. भारतीय ज्ञान ही कुम्भ का प्रतीक है इसलिए कुम्भ को संतो का मेला भी कहा जाता है .  समाज का जब विकास होता है तब उसका बौधिक स्तर से ही उसका विकास और पतन होता है. किसी भी समाज की समृद्धता के लिए उसका बौधिक संतुलन प्रकृति के अनुकूल होना आवशयक है. यदि ऐसा नही होता तो समाज में कुरुतियाँ अधिक फैलने की सम्भावना अधिक हो जाति है . कुम्भ समाज को ईश्वरीय अनुरूप जीवन जीने की कला सिखाता है.


राष्ट्र निर्माण में अखाडा व धार्मिक केन्द्रों का है बड़ा महत्व -स्वामी गौरीशंकराचार्य  जी
राष्ट्र निर्माण में अखाडा , आश्रम एवं धार्मिक केन्द्रों का बहुत महत्त्व है. सुन्दर , सही राष्ट्र निर्माण के लिए धर्म का उतना ही महत्व है जितना रेगिस्तान में प्यासे को पानी की जरूरत होती है. राष्ट्र निर्माण में सरकार का योगदान भौतिक चीजो से समृद्ध बनाने को है तो धर्म अंतर जगत से समृद्ध बनाने की विधि है. अंतर्जगत से बिना समृद्ध का राष्ट्र सपने की भांति होता है इसलिए राष्ट्र निर्माण में धर्म का बहुत बड़ा योगदान है .  गंगा , यमुना और सरस्वती ये तीनो हर प्रकार के दुखो की निर्वित्ति का आधार है . दैनिक , भौतिक और आध्यत्म में गंगा, यमुना और सरस्वती का परिचय यह है कि जो 72 हजार नाड़ियो में से जो तीन प्रमुख नाड़ियो का उल्लेख किया जाता है  ऐडा, पिंगला और सुसुमना अंतर्जगत में रह रही यह तीन नाड़ियाँ भौतिक जगत में गंगा, यमुना और सरस्वती का स्वरूप है. इन तीनो नाड़ियो का मिलन ही पूर्णता एवं कुम्भ का प्रतीक इन तीनो के संगम के बिना मनुष्य के जीवन की पूर्णता सम्भव नही हो सकता है.


कुम्भ भारत और नेपाल में सौहार्द एवं एकत्व का प्रतीक - ब्रह्मर्षि
कुम्भ पूर्णतया आध्यात्म के शिखर का प्रतीक है. प्राचीन काल में भारतवर्ष के भीतर लगभग सात से नौ देश आते थे धीरे धीरे यह संकुचित होता गया फिर भी प्राचीन वैदिक ऋषि मुनियों के द्वारा दिया गया सूत्र ईश्वरीय जीवन जीने का ढंग हमारे शास्त्रों में ऋषि मुनियों ने प्रदान किया है. जहाँ तक बात नेपाल और भारत की है तो दोनों देशो की सांस्कृतिक परम्पराएँ, धर्म परम्पराएँ, देवी देवताओ की परम्पराएँ सदा से एक ही रही है. इसलिए भारत में लगने वाले चारो कुम्भ में नेपाल और भारत अलग अलग देश होने के पश्चात भी सभी श्रद्धालु एवं संतजन एकत्र होकर पूर्ण करने का प्रयास करते है. संस्कृति परम्परा ही एक दुसरे के नजदीक होने का सर्वोत्तम साधन है. कुम्भ भारत एवं नेपाल में सहानुभूति, सौहार्द एवं एकत्व की भावना का प्रतीक है.


कुम्भ में पर्यावरण दूषित न करने का मार्ग प्रशस्त करेगे - जगदाचार्य आद्यशंकर कैलाश पीठ उत्तर गोदावरी धाम नेपाल
कुम्भ का दूसरा अर्थ पूर्णता है. जब व्यक्ति पूर्णता की ओर जाता है तो वह प्रकृति के अनुकूल समाज एवं वैभव का निर्माण करता है. कुम्भ के माध्यम से सभी साधू संत महात्मा पर्यावरण को दूषित न करने का ही मार्ग प्रशस्त करते है.वो चाहे नेपाल हो या भारत आज हम सभी लोग प्रकृति की चपेट में है जिसके कारण ग्लेशियर पिघलना, भूस्खलन होना, महामारी होना, सर्दी- गर्मी अधिक होना इत्यादि इत्यादि . इन सबकी सरंक्षकता के लिए पर्यावरण पर ध्यान देना हर सनातन धर्म एवं राजनैतिक व्यक्तियों का कर्तव्य होता है. इस बार आद्य शंकर कैलाश पीठ गोदावरी धाम , कैलाली नेपाल की और से पर्यावरण सरंक्षण पर विशेष जोर दिया जाएगा. इसी कड़ी में मानसिक प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए भारत में रहे चार पीठो के साथ साथ पंचम पीठ के रूप में नेपाल में आद्य शंकर कैलाश पीठ गोदावरी धाम की स्थापना की गयी है. इनके माध्यम से पर्यावरण एवं मानसिक प्रदूषण को खत्म करने का प्रयास पुरे विश्व में किया जाएगा.


धर्म की रक्षा के लिए बनायी गयी सेना ही नागा संत कहलाते है - गौरीशंकराचार्य
कुम्भ का मुख्य स्नान का मतलब विशिष्ट दिन को इंगित करता है जैसे मकर सक्रांति, बसंत पंचमी, मौनी अमावस्या आदि. इन दिनों में ग्रहों , नक्षत्रो के अनुसार प्रकृति एवं खगोल का सामंजस्य विशेष प्रभावशाली होता है. इस समय पर ग्रह, नक्षत्रो विशेषकर चन्द्रमा से सोमरस टपकने लगता है उस समय स्नान करने से उस सोमरस के कण मनुष्य के शरीर एवं मन में प्रवाहित होने लगते है. जिससे धार्मिक एवं आध्यात्म में मुख्य स्नान का विशेष महत्व होता है.  कुम्भ अनादि है . नागा परम्पराओ  का प्रचलन आदि गुरु शंकराचार्य के काल से हुआ है. आदि गुरु शंकारचार्य ने जब देखा कि सनातन धर्मं धीरे धीरे नष्ट हो रहा है तो उन्होंने धर्म की रक्षा हेतु चार पीठो की स्थापना की. इस परम्परा में उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए एक सेना का निर्माण किया. धर्म पर आंच आने पर यह सेना किसी भी हद तक जाने को तैयार रहती थी. इसी सेना को आज नागा साधू के रूप में जाना जाता है.  धर्म में राजनीति नही होनी चाहिए पर राजनीति में धर्म होना चाहिए प्राचीन काल में इलाहबाद का नाम प्रयागराज था जो मुगल साम्राज्यवादियो ने प्रयागराज का नाम बदलकर अल्लाहाबाद कर दिया था. मुझे लगता है कि राजनीति हो या धर्म यदि हमारी वैदिक परम्परा किसी भी कारण से दूषित हुई तो उसका निराकरण करना राजनैतिक एवं धर्माचार्यो दोनों का कर्तव्य बनता है.


अमृत और विष दोनों एक दुसरे के पूरक - श्री श्री 1008 जगदाचार्य ब्रह्मर्षि स्वामी गौरीशंकराचार्य  जी महाराज
नाथ सम्प्रदाय का जन्म गुरु गोरखनाथ से प्रारम्भ हुआ है. भारतीय दर्शन में जितनी भी परम्पराएँ हुई है चाहे उनका मूल पूर्णता है. भारतीय दर्शन में वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना एवं परम्पराओ पर आधारित है. जिसकी मान्यता अन्य सम्प्रदायों की है उतनी ही नाथ सम्प्रदाय की है.  अमृत और विष दोनों एक दुसरे के पूरक है. विष न हो तो अमृत की पहचान कहा . विष का भी उतना ही महत्व है जितना महत्व अमृत का है. परन्तु दोनों का सामंजस्य होना बहुत जरुरी है. समाज में विष की मात्र ज्यादा हो गयी है अमृत की मात्रा कम हो गयी है. जिसके कारण समाज दिन प्रतिदिन दूषित होता जा रहा है.धर्म अमृत और विष को संतुलित करने का विषित साधन है. 

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