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कवियित्री डॉ. पुष्पलता की एक रचना " गॉड "

12-08-2019 16:09:37

"गॉड "

अभी अज़मत में जिन्दा  है
अल्ला
वह खेलता कूदता मस्ती करता है
अपने दोस्त  दूसरे अल्ला के साथ
वह रोएगा जब दिखेगा नहीं
बकरे के रूप में उसका दोस्त
अल्ला
फिर उसकी जीभ, मुँह ,
दांतों को लगाया जाएगा अल्ला के
लहू , मांस, हड्डी का स्वाद
कहकर
इससे खुश होता है अल्ला
उसमें मर जाएगा अल्ला
जैसे  अमित में मर जाता हैं ईश्वर

जब वह कहता है
आई लव लेग पीस
 हर धर्म ,वर्ग ,देश , समाज में
 सदियों से होता है अधर्म
अंततः हो जाती है नर बलि
उससे भी खुश हो जाते होंगे
अल्ला, ईश्वर ,यीशु ,आदि
दाँत ,मुँह ,जीभ तो उनकी भी है
खून का स्वाद तो
दाँत ,मुँह ,जीभ का शोंक है
जश्न है
धर्म है
कभी भी ,कहीं भी ,कैसे भी
मनाया जा सकता है
बहाने से क्या फर्क पड़ता है
कटना तो अल्ला ईश्वर आदि को भी है

कभी -कभी सोचती हूँ धर्म किसने गढ़ा
उसने जो नहीं चाहता था
उसके मरने के बाद
उसकी स्त्री  किसी के बाहुपाश
का हिस्सा बने
गढ़ दी सती
उसने जिसे मंदिर में चाहिए था
रोज
स्त्री का जवान ताजा गर्म गोश्त
गढ़ दी देवदासी  
उसने जिसे अच्छे लगते थे
खाने में जीव जंतु
गढ़ दी बलि प्रथा
या उसने जो चाहता था
चलता रहे उसका नाम
गढ़ दिए कुछ नाम
उसने
जिसके दांतों को  लगा था
आदम जात का खून
गढ़ दी फिरकापरस्ती
फेहरिस्त लम्बी है
मगर कोई भी अकारण
किसी को पैदा नहीं करता
किसी न किसी कारण से तो
पैदा हुए

सबके गॉड
और उन्हें
खुश करने के तरीके
और हमने मान लिए
मैं अपने हिसाब से गढूंगी
अपना ईश्वर

डॉ पुष्पलता मुजफ्फरनगर