जाने देवउठनी एकादशी के बारे में , पूजा विधि सहित

Publish 15-11-2018 13:57:51


जाने देवउठनी एकादशी के बारे में , पूजा विधि सहित

उन्नाव (रघुनाथ) |  कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को हरिप्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी या देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इस बार यह एकादशी 19 नवंबर दिन सोमवार को है। कई लोग इस दिन को तुलसी विवाह के नाम से भी जानते हैं। ज्योतिष के जानकार रघुनाथ प्रसाद शास्त्री ने बताया की इस दिन भगवान विष्णु चतुर्मास कि निद्रा से जागते हैं और इसके साथ ही शुभ व मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। इसकी वजह यह है कि आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए सोने चले जाते हैं।
बैकुंठ धाम की होती है प्राप्ति
मान्यता है कि इस दिन भगवान नारायण निद्रा से जागते हैं इसलिए उपासक इस दिन व्रत रखते हैं और रात्रि जागरण करते हैं। इस दिन की गई पूजा का विशेष महत्व होता है। बताया जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से इस दिन व्रत रखकर भगवान की पूजा करते हैं, उन्हें बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। साथ ही सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन व्रत करके आप चंद्रमा के खराब प्रभाव को भी कम कर सकते हैं।
इनका लगया जाता है भोग
सभी देव भगवान विष्णु को चार मास की योग-निद्रा से जगाने के लिए घंटा, शंख, मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि के साथ श्लोको का उच्चारण करते हैं। तभी पृथ्वी पर शादी-विवाह, नया कारोबार जैसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। इस दिन, आंवला, सिंघाड़े, गन्ने और मौसमी फलों का भोग लगाया जाता है।
देवोत्थान एकादशी की पूजा विधि
नारदपुराण के अनुसार, ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान नारायण का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प करना चाहिए। इसके बाद घट स्थापना करनी चाहिए और भगवान विष्णु की मूर्ति या फिर तस्वीर के सामने बैठकर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। इसके बाद भगवान पर गंगाजल के छीटें देकर रोली और अक्षत लगाना चाहिए। फिर गाय के घी का दीपक जलाकर उनकी आरती उतारें और मंत्रों का जप करें। फिर भोग लगाकर ब्राह्मण को भोजन कराकर दान व दक्षिणा दें। इस दिन दान का भी विशेष महत्व है।
देवोत्थान एकादशी की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार लक्ष्मी ने विष्णु से कहा, ‘हे नाथ! आप दिन-रात जागते हैं और फिर लाखों-करोड़ों वर्षों तक सो जाते हैं तथा उस समय समस्त चराचर का नाश भी कर डालते हैं। आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें। इससे मुझे भी कुछ समय विश्राम करने का समय मिल जाएगा।’ विष्णु मुस्कुराए और बोले, ‘देवी तुमने ठीक कहा है। मेरे जागने से सब देवों को खासकर तुमको कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से जरा भी अवकाश नहीं मिलता इसलिए अब मैं प्रति वर्ष चार मास शयन किया करूंगा। उस समय तुमको और देवगणों का अवकाश होगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा कहलाएगी। यह मेरे भक्तों को परम मंगलकारी उत्सवप्रद तथा पुण्यवर्धक होगी।

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