भगवान का कोई वैरी नहीं है- पण्डित पप्पू मिश्रा

Publish 08-02-2019 23:07:30


भगवान का कोई वैरी नहीं है- पण्डित पप्पू मिश्रा

उन्नाव/ उत्तर प्रदेश  (रघुनाथ प्रसाद शास्त्री): जो ब्यक्ति प्रवृत्ति और निवृत्ति को नहीं जानते भगवान और वेद शास्त्रों का विरोध करना ही जिनका स्वभाव हो गया है, ऐसे आसुरी संपत्ति में अधिक रचे-पचे रहकर वैसा ही बुरा आचरण करने वाला मनुष्यों के लिए भागवत के चतुर्थ अध्याय में ‘दुष्कृताम्’ पद आया है। भगवान अवतार लेकर ऐसे ही दुष्ट मनुष्यों का विनाश करते हैं।


      यह बात ग्राम लखनापुर के हरदेव बाबा देवस्थान पर चल रही श्रीमतभागवत में भक्तों को बताते हुए आचार्य पंडित पप्पू मिश्रा ने कही।उन्होंनें कहा कि  भगवान तो सब प्राणियों में सम हैं और उनका कोई वैरी नहीं है, फिर वे दुष्टों का विनाश क्यों करते हैं क्योंकि संपूर्ण प्राणियों के परम सुहृद् होने से भगवान का कोई वैरी नहीं है; परंतु जो मनुष्य भक्तों का अपराध करता है, वह भगवान का वैरी होता है- भगवान का नाम ‘भक्तभक्तिमान’ है। अतः भक्तों को कष्ट देने वाला दुष्टों का विनाश भगवान स्वयं करते हैं। पाप का विनाश भक्त करते हैं और पापी का विनाश भगवान करते हैं। साधुओं का परित्राण करने में भगवान की जितनी कृपा है, उतनी ही कृपा दुष्टों का विनाश करने में भी है ।विनाश करके भगवान उन्हें शुद्ध, पवित्र बनाते हैं। संत महात्मा धर्म की स्थापना तो करते हैं, पर दुष्टों के विनाश का कार्य वे नहीं करते। दुष्टों का विनाश करने का कार्य भगवान अपने हाथ में रखते हैं; जैसे- साधारण मलहम पट्टी करने का काम तो कंपाउंडर करता है, पर बड़ा ऑपरेशन करने का काम सिविल सर्जन खुद करता है, दूसरा नहीं। उन्होंनें माता और पिता- दोनों समान रूप से बालक का हित चाहते हैं। बालक पढ़ाई नहीं करता, उद्दंडता करता है तो उसको माता भी समझाती है और पिता भी समझाते हैं। बालक अपनी उद्दंडता न छोड़े तो पिता उसे मारते-पीटते हैं। परंतु बालक जब घबरा जाता है, तब माता पिता को मारने पीटने से रोकती है।

उन्होंनें कहा कि यद्यपि माता पतिव्रता है, पति का अनुसरण करना उसका धर्म है, तथापि इसका यह अर्थ नहीं कि पति बालक को मारे तो वह भी साथ में मारने लग जाय। यदि वह ऐसा करे तो बालक बेचारा कहाँ जायगा? बालक की रक्षा करने में उसका पातिव्रत धर्म नष्ट नहीं होता। कारण कि वास्तव में पिता भी बालक को मारना-पीटना नहीं चाहते, प्रत्युत उसके दुर्गुण-दुराचरों को दूर करना चाहते हैं। इसी तरह भगवान पिता के समान हैं और उनके भक्त माता के समान। भगवान और संत महात्मा मनुष्यों को समझाते हैं। फिर भी मनुष्य अपनी दुष्टता न छोड़े तो उनका विनाश करने के लिये भगवान को अवतार लेकर खुद आना पड़ता है। अगर वे अपनी दुष्टता छोड़ दें तो उन्हें मारने की आवश्यकता ही न रहे। निर्गुण ब्रह्म प्रकृति, माया, अज्ञान आदि का विरोधी नहीं है, प्रत्युत उनको सत्ता-स्फूर्ति देने वाला तथा उनका पोषक है। तात्पर्य यह कि प्रकृति, माया आदि में जो कुछ सामर्थ्य है, वह सब उस निर्गुण ब्रह्म की ही है।


इसी तरह सगुण भगवान भी किसी जीव के साथ द्वेष, वैर या विरोध नहीं रखते, प्रत्युत समान रीति से सब को सामर्थ्य देते हैं, उनका पोषण करते हैं। इतना ही नहीं, भगवान की रची हुई पृथ्वी भी रहने के लिये सब को बराबर स्थान देती है। उसका यह पक्षपात नहीं है कि महात्मा को तो विशेष स्थान दे, पर दुष्ट को स्थान न दे। ऐसे ही अन्न सबकी भूख बराबर मिटाता है, जल सब की प्यास समान रूप से मिटाता है, वायु सब को प्राणवायु एक सी देती है, सूर्य सब को प्रकाश एक सा देता है, आदि। आज की कथा विराम होनें पर नन्द लाल तिवारी नें आरती उतारी।प्रधान रामकिशोर तिवारी नें भक्तो में प्रसाद का वितरण किया।

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