आज पूरे प्रदेश में धूमधाम से मनाया जा रहा सकट चौथ का व्रत

Publish 24-01-2019 23:03:31


आज पूरे प्रदेश में धूमधाम से मनाया जा रहा सकट चौथ का व्रत

लखनऊ /उत्तर प्रदेश (रघुनाथ प्रसाद शास्त्री): पूरे प्रदेश में सकट चौथ मनाया जा रहा है। इस दिन प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की पूजा होती है। सकट चौथ का व्रत माघ महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है। मां अपनी संतान की रक्षा और लंबी आयु के लिये सकट चौथ का व्रत रखती हैं। कहीं-कहीं सकट चौथ को गणेश चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि विघ्नहर्ता गणेश जी इस व्रत को करने वाली माताओं के संतानों के सभी कष्ट हर लेते हैं और उन्हें सफलता के नये शिखर पर पहुंचाते हैं।
संतान की सफलता के लिए माताएं सकट चौथ व्रत को निर्जला रहती हैं। ज्योतिष के जानकार रघुनाथ प्रसाद शास्त्री ने बताया व्रती महिलायें शाम को गणेश पूजन और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही वो प्रसाद के साथ भोजन करती हैं। महाभारत काल में श्रीकृष्ण की सलाह पर पांडु पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने सबसे पहले इस व्रत को रखा था। तबसे अब तक महिलाएं अपने पुत्र की कुशलता के लिए इस व्रत को रखती हैं।

इन सामग्रियों का उपयोग किया जाता है
सकट चौथ के व्रत में पूजन सामग्री के अलावा गुड़, तिल, शकरकंद और मौसमी फलों का विशेष रूप से उपयोग होता है। इस दिन तिल और लाई के लड्डू भी भगवान गणेश को अर्पित किये जाते हैं। तिल को भूनकर उसे गुड़ की चाशनी में मिलाकर तिल का लड्डू बनाया जाता है और फिर से भगवान गणेश को अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि पूजन से प्रसन्न होकर प्रथम पूज्य गणेश जी अपने भक्तों के सभी कष्टों को क्षण में दूर करते हैं।
किस तरह से सकट बाबा की पूजा करें
फतेहपुर चौरासी  क्षेत्र की निवासी रामपती गंगा शंकर (70 वर्षीय) बताती हैं कि वो अपने बच्चों के लिए आज भी सकट चौथ का व्रत रखती हैं। उन्होंने बताया कि इस व्रत में तिल का विशेष महत्व होता है। पूजन स्थान पर चौक डालकर भगवान गणेश जी को आसन पर विराजमान कराया जाता है। कलश पर दीपक जलाकर रखा जाता है। लकड़ी के पाटे पर तिल से चार सकट बनाये जाते हैं। इंद्रा नगर फतेहपुर चौरासी निवासी मंजू त्रिपाठी बताती हैं कि वह वर्षों से इस व्रत को करती आ रही हैं। उन्होंने बताया कि शाम को गणेश भगवान का पूजन किया जाता है। इस दौरान एक सकट चौथ की एक कथा भी पढ़ी जाती है, जिसे घर के सभी सदस्य बैठकर सुनते हैं।
पूजा के दौरान काटा जाता है तिलकूट का बकरा दोस्तपुर शिवली निवासी मधुलिका शास्त्री बताती हैं । कि सकट चौथ पर भगवान गणेश के समीप ही प्रतीक रूप से तिल का एक बकरा बनाया जाता है, जिसे बेटे द्वारा सिक्के से कटवाया जाता है। जिसके बेटे नहीं हैं वह किसी और के बेटे से भी कटवा सकता है  और उसे कुछ  धन  भी दिया जाता है ।मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और बच्चों का कल्याण करते हैं। इस दौरान जो भी तिलकूट का बकरा काटेगा उसे तीन बार मुंह से में... में...में... का स्वर निकालना होता है। इसके बकरे में इस्तेमाल तिल को प्रसाद के तौर पर सबको वितरित किया जाता है। शाम को चंद्रदेव को अर्ध्य देने के बाद ही महिलाएं अपना व्रत खोलती हैं। लखनऊ आलमबाग निवासी अंजली मिश्रा बताती हैं हम 35 साल से या व्रत बराबर रह रहे हैं अधिकतर मेरा यह व्रत इलाहाबाद प्रयाग संगम पर ही पड़ता है क्योंकि हर वर्ष माघ के मास में हम कल्पवास करते हैं लेकिन व्रत वहां भी रहकर पूजा-पाठ पूरी तरह से करती हूं
सकट चौथ व्रत कथा
सकट चौथ व्रत कथा में भगवान गणेश की महिमा वर्णन किया जाता है। कथा के माध्यम से बताया जाता है कि जिसने भी सकट चौथ व्रत को किया, उसे धन-धान्य लेकर संतान रत्न तक की प्राप्ति हुई। कई कथाओं के माध्यम से बताया जाता है कि भगवान गणेश भक्तों के सभी कष्ट क्षण भर में दूर करते हैं। सकट चौथ की कथा में ऐसी महिलाओं के बारे में भी बताया गया है, जिनके संतान नहीं होती थी, लेकिन व्रत के प्रभाव से उन्हें संतान रत्न की प्राप्ति हुई और धन-धान्य की वृद्धि भी हुई। जिन्हें पुत्र नहीं हैं वह भी व्रत रख सकती हैं व्रत रखने से धन ऐश्वर्या का भी लाभ मिलता है।

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