जाने कालीमठ सिद्धपीठ के बारे में , यहाँ होते है सभी के मनोरथ पूर्ण

Publish 17-02-2019 23:06:17


जाने कालीमठ सिद्धपीठ के बारे में , यहाँ होते है सभी के मनोरथ पूर्ण

रुद्रप्रयाग (संतोष):  देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के  सरस्वती नदी के किनारे स्थित प्रसिद्ध शक्ति सिद्धपीठ श्री कालीमठ मंदिर स्थित है यह मंदिर समुन्द्रतल से 1463 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है । भारत के प्रमुख सिद्ध शक्ति पीठों में से एक माना जाता है । कालीमठ मंदिर तन्त्र व साधनात्मक दृष्टिकोण से यह स्थान कामख्या व ज्वालामुखी के सामान अत्यंत ही उच्च कोटि का है ।
स्कन्दपुराण के अंतर्गत केदारनाथ के 62 अध्धाय में माँ काली के इस मंदिर का वर्णन है  कालीमठ मंदिर से 8 किलोमीटर की खड़ी ऊंचाई पर स्थित दिव्य चट्टान को ‘काली शिला’ के रूप में जाना जाता है , जहां देवी काली के पैरों के निशान मौजूद हैं और कालीशीला के बारे में यह विश्वास है कि माँ दुर्गा ने शुम्भ , निशुम्भ और रक्तबीज दानव का वध करने के लिए कालीशीला में 12 वर्ष की बालिका के रूप में प्रकट हुयी थी  कालीशीला में देवी देवता के 64 यन्त्र है , माँ दुर्गा को इन्ही 64 यंत्रो से शक्ति मिली थी   इस स्थान पर 64 योगनिया विचरण करती रहती है मान्यता है कि इस स्थान पर शुंभ-निशुंभ दैत्यों से परेशान देवी-देवताओं ने मां भगवती की तपस्या की थी । तब मां प्रकट हुई और असुरों के आतंक के बारे में सुनकर मां का शरीर क्रोध से काला पड़ गया और उन्होंने विकराल रूप धारण कर युद्ध में दोनों दैत्यों का संहार कर दिया।

कालीमठ मंदिर की  प्राचीन मान्यता
इस मंदिर में एक अखंड ज्योति निरंतर जली रहती है एवम् कालीमठ मंदिर पर रक्तशिला, मातंगशिला व चंद्रशिला स्थित हैं कालीमठ मंदिर में दानवो का वध करने के बाद माँ काली मंदिर के स्थान पर अंतर्ध्यान हो गयी , जिसके बाद से कालीमठ में माँ काली की पूजा की जाती है कालीमठ मंदिर की पुनर्स्थापना शंकराचार्य जी ने की थी   भारतीय इतिहास के अद्वितीय लेखक कालिदास का साधना स्थल भी यही रहा है । इसी दिव्य स्थान पर कालिदास ने माँ काली को प्रसन्न कर विद्वता को प्राप्त किया था । इसके बाद कालीमठ मंदिर में विराजित माँ काली के आशीर्वाद से ही उन्होंने अनेक ग्रन्थ लिखे हैं , जिनमें से संस्कृत में लिखा हुआ काव्य ग्रन्थ “मेघदूत” जो कि विश्वप्रसिद्ध है “रुद्रशूल”नामक राजा की ओर से यहां शिलालेख स्थापित किए गए हैं , जो बाह्मी लिपि में लिखे गए हैं । इन शिलालेखों में भी इस मंदिर का पूरा वर्णन है।
हर साल नवरात्रि में कालीमठ मंदिर में भक्तो की भीड़ का तांता लगा रहता है और दूर-दूर से श्रद्धालु माँ काली का आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते है इस सिद्धपीठ में पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालु मां को कच्चा नारियल व देवी के श्रृंगार से जुड़ी सामग्री जिसमें चूड़ी, बिंदी, छोटा दर्पण, कंघी, रिबन, चुनरिया अर्पित करते हैं । देशभर में कालीमठ मंदिर एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ पर माँ काली , माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी के अलग अलग मंदिर बने हुए है ।
कालीमठ मंदिर के बारे में यह मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गयी मनोकामना या मुराद जरुर पूरी होती है इसलिए यदि आप देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में घूमने आते है तो दिव्य कालीमठ मंदिर के कालीमठ मंदिर तक पहुंचने के लिए सर्वप्रथम रुद्रप्रयाग से गौरीकुंड हाइवे के जरिए 42 किमी का सफर तय कर गुप्तकाशी पहुंचे । उसके बाद गुप्तकाशी से सड़क मार्ग से आठ कि.मी. सफर तय कर कालीमठ मंदिर पहुंचा जा सकता है।

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