जाने वसंत पंचमी के बारे में ...............

Publish 09-02-2019 23:29:59


जाने वसंत पंचमी के बारे में ...............

कोटद्वार(गौरव गोदियाल): वसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है .  यह साल का वह वक़्त है जब प्रकृति की सुंदरता का कोई जवाब नहीं होता .  माघ के महीने की शुक्ल पंचमी को सारे पुराने पत्ते झड़ जाते हैऔर नए फूल आने लगते हैं .  प्रकृति के इस अनोखे दृश्य को देख हर व्यक्ति का मन मोह जाता है .  मौसम के इस सुहावने मौके को उत्सव की तरह मनाया जाता है .  वसंत पंचमी को श्री पंचमी तथा ज्ञान पंचमी भी कहते हैं . इस दिन माँ सरस्वती की पूजा का महत्व माना गया है,
 आइए जानते हैं इसकी कथा
सृष्टि की रचना का कार्य जब भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को दिया तब वे से खुश नहीं थे .  उदासी से भरा वातावरण देख वे विष्णु जी के पास गए और सुझाव माँगा .  फिर विष्णु जी के कहे अनुसार उन्होने अपने कमंडल से जल लेकर धरती पर छिड़का .  तब एक चतुर्भुज सुंदरी हुई, जिसने जीवों को वाणी प्रदान की .  यह देवी विद्या, बुद्धि और संगीत की देवी थीं, तो इन्हे सरस्वती देवी कहा गया . इसलिए इस दिन सरस्वती देवी का जन्म बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है और इनकी पूजा भी की जाती है .  इस दिन लोग अपने घरों में सरस्वती यंत्र स्थापित करते हैं .  इस दिन 108 बार सरस्वती मंत्र के जाप करने से अनेक फायदे होते हैं .  माना तो यह भी जाता है कि प्राचीन काल में इस दिन बच्चों के जीभ पर केसर रख कर निचे दिए गए मंत्र का उच्चारण कराया जाता था ताकि बच्चा बुद्धिमान बन सके .
मंत्र-‘ऊँ ऐं महासरस्वत्यै नमः’
वसंत ऋतु के बारे में ऋग्वेद में भी उल्लेख मिलता है .  प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु। इसका अर्थ है सरस्वती परम् चेतना हैं .  वे हमारी बुद्धि, समृद्धि तथा मनोभावों की सरंक्षा करती हैं .  भगवान श्री कृष्ण ने गीता में वसंत को अपनी विभूति माना है और कहा है ‘ऋतूनां कुसुमाकरः’ .

रामायण में वसंत ऋतु का संदर्भ
रामायण में जब रावण सीता माता का हरण कर लंका ले जाता है तब श्री राम और लक्ष्मण माता सीता को ढूंढ़ने में लग जाते हैं .  उनकी खोज के दौरान वे दंडकारण्य नामक स्थान पर जा पहुंचते हैं, यहीं शबरी से उनका मिलन होता है .  शबरी प्रभु राम के आने पर अत्यंत प्रसन्नता से भर जाती है और उन्हें मीठे बेर चख कर देती है .  कहा जाता है कि श्री राम वसंत पंचमी के दिन ही शबरी से मिले थे .  वहां आज तक भी लोग एक शिला की पूजा करते हैं .  माना जाता है कि यह वही जगह है जहाँ श्रीराम बैठे थे .

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