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कवि विक्रमादित्य सिंह की एक रचना "मैं हिन्दुस्तां की आवाज़ हूँ मैं बोल रहा हूँ....."

26-06-2019 19:10:51

मैं हिन्दुस्तां की आवाज़ हूँ मैं बोल रहा हूँ.....

मैं हिन्दुस्तां की आवाज़ हूँ मैं बोल रहा हूँ
अपने मन के जज़बातो को सामने खोल रहा हूँ

बहा हूँ पता नहीं कबसे हिमल मेँ शीत पवन बनके
मैं गंगा-यमुना के पानी मेँ गूंजा हूँ कल-कल बहके
लहलहाते गेहूं की सुनहरी लचक मेँ भी मैं हूँ
सरसो की लहर धान की बाली में मैं डोल रहा हूँ
अपने मन के जज़्बातों को सामने खोल रहा हूँ

मैं हिन्दुस्तां की आवाज़ हूँ मैं बोल रहा हूँ
अपने मन के जज़बातो को सामने खोल रहा हूँ

जवां धड़कन में दबी एक चीख बनकर बैठा हूँ
फड़कती हुई नसों में उबाल बना मैं बहता हूँ
दौर के बोझ तले शहरी की छूटती सांस में हूँ
बूढ़ा बनके अकेले ही रिश्तों को तोल रहा हूँ
अपने मन के जज़्बातों को सामने खोल रहा हूँ

मैं हिन्दुस्तां की आवाज़ हूँ मैं बोल रहा हूँ
अपने मन के जज़बातो को सामने खोल रहा हूँ

दबी सिसकी छुपा आँचल में सुबकती सी भी हूँ
सबकी बंदिश में बंधी अरमानो की ख्वाहिश भी हूँ
नुची और घाव से भरी बिलखती टूट रही हूँ
ऐसे आँचल घूँघट पर्दो के साये में झूल रहा हूँ
अपने मन के जज़्बातों को सामने तोल रहा हूँ

मैं हिन्दुस्तां की आवाज़ हूँ मैं बोल रहा हूँ
अपने मन के जज़बातो को सामने खोल रहा हूँ

मैं हूँ झुलसे हुए मजदूर के बहते धार पसीने में
किसान की बंजर आँखों में उमड़ती उम्मीदों में मैं
भूख और प्यास से तरसी हुई हर घूँट भर में मैं
मैं ही वर्दी में उठा बन्दूक हल्ला बोल रहा हूँ
अपने मन के जज़्बातों को सामने तोल रहा हूँ

मैं हिन्दुस्तां की आवाज़ हूँ मैं बोल रहा हूँ
अपने मन के जज़बातो को सामने खोल रहा हूँ

 
                                             - विक्रमादित्य