कवयत्री डॉ पुष्पलता की एक रचना "एक रिश्ता है रिसता रहता है"

Publish 28-10-2018 17:58:45


कवयत्री डॉ पुष्पलता की एक रचना "एक रिश्ता है रिसता रहता है"

एक रिश्ता है रिसता रहता है
दर्द किश्तों में हँसता रहता है
आँख नम होके सूख जाती है
दिल ये पाटों में पिसता रहता है
जिंदगी छूट कर कहाँ दौड़े
इसके कंधों पे बस्ता रहता है
इसको आदत है कैद होने की
यूँ सलाखों में रस्ता रहता है
सबको पिंजरे में दर्द होता है
दिल भी पिंजरे में खिंचता रहता है
 सांस खुलकर नहीं मिली कोई
ख़ौफ़ साँसों को कसता रहता है
रूह तो बेलगाम घोड़ी है
वक्त  चाबुक पटकता रहता है
अब तो उड़ने का वक्त है नादां
फिर तू काहे सुबकता रहता है

                       डॉ पुष्पलता अधिवक्ता (मुजफ्फरनगर)

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