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डॉ पुष्पलता की एक और रचना "जिंदगी रेत सी है मुटठी में"

22-10-2018 20:37:48

जिंदगी रेत सी है मुटठी में
वक्त यूँ ही फिसलता जाए है
मेरी सूरत उधार माँगू तो
 अब अँगूठा मुझे दिखाए है
मेरा चेहरा  कहाँ हुआ गायब
अब कभी लौट के न आए है
कुछ पुरानी रखी हैं तस्वीरें
उनसे झांके है और चिढ़ाए हैं

      डॉ पुष्पलता


 एक रिश्ता है रिसता रहता है
दर्द किश्तों में हँसता रहता है
आँख नम होके सूख जाती है
दिल ये पाटों में पिसता रहता है
जिंदगी छूट कर कहाँ दौड़े
इसके कंधों पे बस्ता रहता है
इसको आदत है कैद होने की
यूँ सलाखों में रस्ता रहता है
सबको पिंजरे में दर्द होता है
दिल भी पिंजरे में खिंचता रहता है
 सांस खुलकर नहीं मिली कोई
ख़ौफ़ साँसों को कसता रहता है
रूह तो बेलगाम घोड़ी है
वक्त  चाबुक पटकता रहता है
अब तो उड़ने का वक्त है नादां
फिर तू काहे सुबकता रहता है

 
                डॉ पुष्पलता