चुनाव आयोग और डबल इंजन की नाकामी का नतीजा है चुनाव बहिष्कार

Publish 13-04-2019 19:29:36


चुनाव आयोग और डबल इंजन की नाकामी का नतीजा है चुनाव बहिष्कार

देहरादून (प्रदीप रावत "रवांल्टा") :  लोकतंत्र के महापर्व के पहले चरण में उत्तराखंड में भी प्रत्याशियों का भाग्य मत पेटियों में कैद हो चुका है। जीत और हार का पता 23 मई को चलेगा, लेकिन इन चुनावों में प्रदेश के पांच जिलों में अलग-अलग गांवों के लोगों ने अपनी नैतिक जीत हासिल कर ली है। ग्रामीणों ने पहले ही चुनाव बहिष्कार का एलान किया था। सरकार और चुनाव आयोग को बाकायदा नोटिस भी थमाया गया था। यह सब आचार संहिता से पहले ही एलान कर दिया गया था कि अगर ग्रामीणों की मांगों पर अमल नहीं किया गया, तो चुनाव बहिष्कार किया जाएगा। बावजूद इसके चुनाव आयोग ने लोगों की बातों को गंभीरता से नहीं लिया। चुनाव आयोग जागरूकता कार्यक्रम पर करोड़ों लुटाता रहा, लेकिन किसी ने यह जहमत नहीं उठाई कि बहिष्कार का एलान करने वाले लोगों को मना लिया जाए।
प्रदेश में 14 मतदान स्थलों पर मतदाताओं ने मतदान का बहिष्कार किया। टिहरी में दो, चमोली में तीन, नैनीताल में एक, बागेश्वर में दो, अल्मोड़ा में एक, चंपावत में दो और पिथौरागढ़ में तीन मतदान स्थलों पर मतदाताओं ने मतदान का बहिष्कार किया। पिथौरागढ़ के मेतली गांव के ग्रामीणों को 12 किलोमीटर की दूरी रोजाना गांव से सड़क तक पहुंचने के लिए नापनी पड़ती है। चुनाव आचार संहिता लगने से पहले ग्रामीणों ने जिला निर्वाचन अधिकारी को ज्ञापन देकर बहिष्कार की चेतावनी दी थी। इसके बाद ग्रामीणों को मीटिंग के लिए गांव से दो किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत भवन में बुलाया गया। हैरत की बात यह है कि ग्रामीण तो वहां पहुंच थे, लेकिन चुनाव आयोग का कोई भी अधिकारी ग्रामीणों से वार्ता के लिए नहीं पहुंचा। लोगों की शिकायतों को निर्धारित समय के भीतर समाधान का दावा भी किया जाता रहा, लेकिन जिला निर्वाचन अधिकारी को कई मर्तबा फोन करने के बाद भी फोन नहीं उठाया गया।
राज्यसभा सांसद और अलमोड़ा संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप टम्टा के गोद लिये गये बचम गांव के 828 से अधिक मतदाताओं ने डबल इंजन की सरकार के प्रति नाराजगी प्रकट करते हुए मतदान का बहिष्कार किया। बागेश्वर जिले के कापकोट विधानसभा क्षेत्र में स्थित बचम गांव के ग्राम प्रधान आनंद राम ने बताया कि हमने बार-बार राज्य सरकार को याद दिलाया, अपने जूनियर उच्च विद्यालय को उच्च विद्यालय में परिवर्तित करने को कहा, लेकिन राज्य सरकार ने मांगों पर ध्यान नहीं दिया। ऐसे में हमने चुनाव का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। प्रधानमंत्री की ओर से घोषित आदर्श ग्राम योजना के तहत गांव को गोद लेने वाले टम्टा के मुताबिक, राज्य सरकार ने इलाके में विकास योजनाओं को पूरा करने में सहयोग नहीं किया।

दूसरे गावों की भी ऐसी ही कहानी है। कहीं पुल नहीं बना, तो कहीं सड़क नहीं है। अस्पताल और शिक्षा के लिए लोग तरस रहे हैं। गाँवो  से पलायन का भी मुख्य कारण यही है। सरकारें लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देती हैं। सरकार हवाई वादों और हवाई कामों से जनता को बरगलाने का काम कर करती हैं। जनता को हर बार चुनाव और वोट के नाम पर ठगा जाता है। कोई मोदी के नाम पर ठग रहा है, तो कोई राहुल के नाम की ठगी कर रहा है। बहरहाल चुनाव बहिष्कार के लिए संबंधित जिलों के निर्वाचन अधिकारियों से जवाब मांगा जाना चाहिए। सरकार से जनता हिसाब खुद लेती है। कुछ भी हो, एक बात तो साफ हो गई है कि जनता जो ठान लेती है। वह करके भी दिखाती है। चुनाव बहिष्कार के ये मामले जहां चुनाव आयोग के लिए नाकाम होने जैसा है। वहीं, सरकारों के लिए सबक भी है और चेतावनी भी।

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