पूरे उत्तराखण्ड में मनाया जाता है फूलदेई का त्योहार , जाने फूलदेई के बारे में

Publish 14-03-2019 15:28:44


पूरे उत्तराखण्ड में मनाया जाता है फूलदेई का त्योहार , जाने फूलदेई के बारे में

कोटद्वार (गौरव गोदियाल)। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और आपाधापी में हम न जाने कितनी अच्छी परंपराओं और रिवाजों को भूल चुके हैं। लेकिन ऐसे अनेक परंपराएं थी जो निस्वार्थ थी, वे “वसुधैव कटुम्बकम” और “सर्वे भवन्तु सुखिन:” का संदेश देती थीं। “फूल देई, फूल-फूल माई” उत्तराखंड की ऐसी ही एक बेजोड़ परंपरा है। फूलदेई उत्तराखंडी परम्परा और प्रकृति से जुड़ा सामाजिक, सांस्कृतिक और लोक-पारंपरिक त्योहार है यह त्योहर चैत्र संक्रांति -चैत्र माह के पह्ले दिन से शुरू होता है और अष्टमी (आठ दिन) तक चलता है। इसे गढ्वाल मे घोघा कहा जाता है। पहाड के लोगों का जीवन प्रकृति पर बहुत निर्भर होता है, इसलिये इनके त्यौहार किसी न किसी रुप में प्रकृति से जुड़े होते हैं। प्रकृति ने जो उपहार उन्हें दिया है, उसे वरदान के रूप मे स्वीकर करते है और उसके प्रति आभार वे अपने लोक त्यौहारों के माध्यम से प्रकट करते है।


फूलदेई त्योहार का संबंध भी प्रकृति के साथ जुडा है। यह बसंत ऋतु के स्वागत का प्रतीक है, बसंत ऋतु में चारो और रंग बिरंगे फूल खिल जाते है, बसन्त के आगमन से पूरा पहाड़ बुरांस और की लालिमा और गांव आडू, खुबानी के गुलाबी-सफेद रंगो से भर जाता है। फिर चैत्र महीने के पहले दिन इतने सुंदर उपहार देंने के लिये गांव के सारे बच्चों के माध्यम से प्रकृति मां का धन्यवाद अदा किया जाता है। इस दिन छोटे बच्चे खासकर लड़कियां सुबह ही उठकर जंगलों की ओर चले जाते हैं और वहां से प्योली/फ्यूंली, बुरांस, बासिंग आदि जंगली फूलो के अलावा आडू, खुबानी, पुलम के फूलों को चुनकर लाते हैं। फिर बच्चे और महिलाये मिलकर घोघा देवता की डोली सजाते है। एक थाली या रिंगाल की टोकरी में चावल, हरे पत्ते, और खेतों और जंगल से तोड़ कर लाये ताजे फूलों को सजाकर घोघा देवता की पूजा करते है और यह गीत गाते हुए बच्चे बारी-बारी से घोघा देवता की डोली को कंधे पर उठाकर नचाते हुए गीत गाते है ।


घोघ देवता की डोली और फूलों की थाली और डलिया लेकर बच्चो की टोली पूरे ग़ाव मे घर-घर पर जाती है” और हर घर की देहरी पर फूल डालते है, वे घर की समृद्धि के लिए अपनी शुभकामनाएं देते हैं। ये फूल अच्छे भाग्य के संकेत माने जाते हैं। महिलाए घर आये बच्चों का स्वागत करती है , उन्हे उपहार मे ,चावल, गुड़, और कुछ पैसे और आशीर्वाद देते है। इस तरह से यह त्योहार आठ दिन तक चलता है। आठ्वें दिन सारे बच्चे किसी एक घर या किसी सामुहिक स्थान पर उपहार मे मिले गुड़ चावल दाल आदि से हलवा और अन्य पारम्परिक व्यंजन बनाते है। इसमे बडे लोग भी उनकी मदद करते है। इस प्रसाद से सबसे पहले देवता को चढाया जाता है बाद में सभी को बॉटा जाता है। बच्चे बडे स्वाद से ये पकवान खाते हैं और सब गॉव वालों को खिलाते है। इस प्रकार प्रकृति –पूजा का यह फ़ूलदेई त्योहार चैत्र मास के आठ्वें दिन सम्पन्न हो जाता है।

फूलदेई पर प्रतियोगिता का आयोजन
फूलदेई पर्व को बचाने के लिए राजकीय इंटर कॉलेज कोटद्वार के अध्यापक संतोष सिंह नेगी ने सभी लोगों से इस पर्व को मनाने की अपील की और कहा कि जिससे की हमारी पुरानी रीति रिवाज को बचाया जा सके ।इसके लिए उनके द्वारा फोटो प्रतियोगिता का आयोजन किया जिसमें फूलदेई से संबंधित फोटो बना कर उसे  फेसबुक ग्रुप में पोस्ट करना है । जिसके लिए उन्होंने  नकद पुरस्कार की भी घोषणा की है ।

 

 

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