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महर्षि कण्व की भूमि चक्रवर्ती सम्राट भरत की जन्मस्थली को आज भी पहचान की है दरकार

06-10-2019 20:07:54

भारतीय संस्कृति की जननी पहचान की दरकार

सरकारी उपेक्षाओं का शिकार होता रहा कण्वाश्रम

खुदाई से सामने आ सकती है नई संस्कृति

कण्वघाटी/गढ़वाल : भारतीय सभ्यता वनों में विकसित हुई गंगा यमुना मालिनी इत्यादि नदियां हमारी अराध्य देवियां हैं। इन्हीं के तटों पर भारतीय संस्कृत पनपी। कण्वाश्रम में शकुन्तला पली पोषी। लेकिन जिस दिन शकुन्तला ने पाप की अंगूठी ग्रहण की उसी दिन वह पाप भागिनी बन गई। कण्वाश्रम के मालिनी तट पर बैठे डा.हजारी प्रसाद द्विवेदी की यह पंक्तियां अभिज्ञान शकुन्तलम को बयां करती है। इस ऐतिहासिक  संस्कृति को पुनर्जीवित किये जाने और इसकेा पर्यटन से जोडने के लिये आज तक कोई प्रयास नहीं किये गये। बहरहाल पर्यटन को बढावा देने के लिये सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों अभी तक धरातल पर नहीं दिखाई दे रहे हैं। भारत नामदेव चक्रवती सम्राट भरत की जन्मस्थली व भारतीय संस्कृति, गौरवशाली शिक्षा, आध्यात्म, ज्ञान विज्ञान,  और चिकित्सा का केंद्र रहा कण्वाश्रम समय के साथ-साथ इतिहास के पन्नों में दफन होकर रह गया। साथ ही दफन हो गई भारत की गुरू शिष्य परंपरा का प्रतीक गुरूकुल और इसकी सांस्कृति विरासत भी। कण्व ऋषि की तपस्थली और महर्षि विश्वामित्र तथा स्वर्ग की अप्सरा मेनका के प्रणय से उत्पन्न शकुन्तला को महर्षि कण्व ने पाला पोषा। हस्तिनापुर के महाराजा दुष्यंत और शकुन्तला के प्रणय संबंधों से उत्पन्न अद्भुत प्रतापी पुत्र भरत के नाम से देश का नाम ‘आर्यावर्त’ भारतवर्ष पडा। प्रकति की मार और इंसान की स्वार्थी प्रवृति के इसके ऐतिहासिकता के प्रतीक अवशेषों तक को नहीं छोडा।

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हिमालय की शिवालिक पर्वत श्रंखलाओ के मध्य मालिनी नदी तट पर स्थित कण्वाश्रम कोटद्वार नगर से महज 14 किमी दूरी पर स्थित है। इसे कण्वाश्रम का दुर्भाग्य ही कहेगे कि भारत देश को पहचान दिलाने वाला यह स्थान आज अंतर्राष्ट्रीय पटल पर अपनी पहचान के लिये तरह  रहा है। सन् 1953 में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. संपूर्णानंद कण्वाश्रम आये ओर उन्होंने कण्वाश्रम में एक स्मारक की स्थापना की। उसके बाद सत्ता में आई सरकारों और शासन की उपेक्षा का शिकार हुआ कण्वाश्रम आज तक अपनी पहचान कायम नहीं कर पाया है। 80 के दशक में प्रकृति ने एक बार फिर भूस्खलन के जरिए अपने ऐतिहासिक स्वरूप को प्रमाणित करते हुए भूगर्भ से शिलापट, मूर्तियां व स्तंभ को उजागर किया। गढवाल विवि के तत्कालीन आर्कियालोस्टि व पुरातत्वविद प्रो. केपी नौटियाल ने अध्ययन और विभिन्न शोध के आधार पर उनको 12 सौ वर्ष पूर्व का बताया। इतिहासविदों ने बताया कि इस काल में कैत्युंरी वंश का वर्चस्व था। मध्य भारत में चंदेल राजाओं द्वारा मंदिरों में इस प्रकार के शिलापटों व स्थापत्य कला का निर्माण किया जाता था। 10वीं शताब्दी में उत्तर भारत में महमूद गजनवी का आक्रमण हुआ। जिसके कारण इस कला को जीवित रखने वाले लोगों ने वहां से पलायन कर यहां कण्वाश्रम में शरण ली। मानव की स्वार्थी प्रवृति के कारण 80 के दशक में कण्वाश्रम में मिले अवशेष चिन्हों को लोगों ने खुर्दबुर्द कर दिया। इतना ही नहीं 90 के दशक और उसके बाद वर्ष 2012 में भी फिर प्रकृति ने कण्वाश्रम की ऐतिहासिकता के प्रमाण देने के संकेत दिये। लेकिन संरक्षण के अभाव में कई शिलापट चोरी हो गई और कईयों को स्थानीय लोग अपने घर ले गये। राष्ट्रीय स्तर पर पुरातत्व विभाग द्वारा कण्वाश्रम में मिले अवशेष चिन्ह वाले स्थलों की खुदाई की जाये तो कण्वाश्रम की प्राचीनताऔर भारतीय संस्कृति के कई ऐसे प्रमाण मिल सकते हैं जो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कण्वाश्रम को पहचान दिला सके। सरकार अगर इस ओर ध्यान दे तो मोहनजोदडों और हडप्पा संस्कृति की तरह नई संस्कृति का सूत्रपाद भी इस स्थान से संभव है।

 

कण्वाश्रम को विकसित करने के लिऐ नाम पर शासन स्तर पर आज तक कोई पहल नहीं हुई। हालांकि इस स्थान पर बसंत पंचमी के नाम पर मेला जरूर आयोजित किया जाता है। बहरहाल चारो ओर प्राकृतिक संपदा से घिरे कण्वाश्रम के इस अनुपम सौंदर्य को सहेजने और इसको पर्यटन से जोडने के लिये अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाये गये हैं। इस स्थल को पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने के लिए हालांकि तत्कालीन प्रमुख सचिव राकेश शर्मा आश्वासन दे चुके हैं लेकिन अभी कुछ भी धरातल पर दिखाई नहीं देता। अगर सबकुछ ठीक ठाक रहा तो कोटद्वार-लैंसडौन-खिर्सू पर्यटन जोन के रूप में विकसित हो सकेगे।