लाशें गिनने का काम चील और गिद्ध करते हैं - राजनाथ सिंह

Publish 01-04-2019 17:10:45


लाशें गिनने का काम चील और गिद्ध करते हैं - राजनाथ सिंह

"आँसुओ के बीच टूटते रहे लोगो के आवास"
कालागढ़/पौड़ी |
कालागढ़ में ध्वस्तीकरण की कार्यवाही बड़े पैमाने पर शनिवार को शुरू हो गयी । राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के आदेशों के तहत कालागढ़ में आखिरकार व्यापक स्तर पर प्रशासन का बुलडोजर चलना शुरू हो गया है । जिसमे आवासों के साथ साथ सरकारी भवनों को भी जमीदोंज कर दिया गया । राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के आदेशों के अनुसार 21 सितम्बर तक प्रशासन को कालागढ़ से अवैध लोगो को हटाकर भूमि वन विभाग को सौंपनी थी । जिसका अनुसरण करते हुए प्रशासन ने 31 अगस्त को देहरादून में बैठक कर ध्वस्तीकरण की रणनीति बनाई गई । जिस क्रम में जिलाधिकारी पौड़ी ने 11 सितम्बर को कालागढ़ में अधीनस्थों की बैठक लेकर एनजीटी के आदेशानुसार बड़ी संख्या में ध्वस्तीकरण की कार्यवाही निश्चित की । इस बैठक के बाद लोगो को पुलिस के माध्यम से नोटिस तामील कराये गए जिसके बाद से ही जनता में भय का माहौल बन गया था । जिसके बाद स्थानीय प्रतिनिधियों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार को पत्र लिख न्याय की गुहार भी लगाई थी परन्तु मानवाधिकार आयोग ने भी कोई उत्तर नही दिया ।


14 सितम्बर देर शाम को पुलिस का काफिला कालागढ़ आना शुरू हो गया और एसडीएम कोटद्वार ने बीती शुक्रवार रात को अधिकारियों के साथ बैठक कर ध्वस्तीकरण की रूपरेखा तैयार की । जिसमे सरकारी अस्पताल , गैस एजेन्सी, डाकघर, सिचाई विभाग कार्यालय उत्तर प्रदेश, पुलिस थाना के साथ साथ पीपी एक्ट में मुकदमा हारे लोगों के निवास तोड़ना सुनिश्चित किया। 15 सितम्बर की सुबह को ध्वस्तीकरण की कार्यवाही शुरू की गई पुलिस , सिंचाई विभाग व वन विभाग की संयुक्त टीमों के नेतृत्व में अलग अलग क्षेत्रों में ध्वस्तीकरण कर सरकारी कार्यालयों व आवासों को जमीदोंज कर  दिया गया ।


प्रशासन की हुई इस कार्यवाही में लाखों के सरकारी भवनों को जमीदोंज कर दिया गया । और लोगों के भारी विरोध के बीच आवासों को तोड़ा गया । प्रशासन की इस कार्यवाही से कई परिवार सड़क पर आ गए है और अभी भी पूरे क्षेत्र में भय का माहौल बना हुआ है और । इस कार्यवाही के बाद से लोगो मे भारी रोष है और पीड़ित लोगों ने बताया कि की प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का अनुपालन ना करते हुए विधिक रूप से कार्यवाही नही की बल्कि जबरन बलपूर्वक आवासों को खाली कराया गया । साथ ही नागरिकों का आरोप है पुलिस के तामील कराये नोटिस में 24 घण्टे का समय दिया गया था परन्तु प्रशासन ने निर्धारित समय से पहले ही बेदखली कर नियमों की धज्जियां भी उड़ाई है ।

"आखिर क्या है पूरा मामला"
कालागढ़। साठ के दशक में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यहां एशिया का सबसे बडी मिटटी के बहुउद्देश्यीय कच्चे डैम का निर्माण किया गया था। डैम के निर्माण के लिये वन विभाग से सशर्त भूमि अधिग्रहीत की गयी थी। सत्तर के दशक में निर्माण कार्य पूरा होने के बाद डैम का राष्ट्र को समर्पित कर दिया गया। इसी बीच डैम निर्माण के दौरान कार्यरत कर्मचारियों को छटनी करके नौकरी से बाहर कर दिया गया तथा कुछ को सिंचाई विभाग की अन्य परियोजनाओं में स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बाद 1978 में राज्य सरकार द्वारा कालागढ को नोटिफाईड एरिया घोषित कर दिया गया। जिसके कारण छटनीशुदा कर्मचारियों सहित अन्य लोगों ने आजीवन यहीं पर रहने की उम्मीद करते हुये पैतृक स्थानों की जमीन तथा मकान बेचकर यहीं पर कारोबार अथवा अन्य रोजगार शुरू कर दिये। लेकिन नोटिफाईड एरिया घोषित होने के बाद परियोजना भत्ता समाप्त होने की आशंका के चलते कर्मचारी संगठनों के भारी विरोध के कारण सरकार द्वारा 1981 में नोटिफाईड एरिया को बिखण्डित कर दिया गया। इसके बाद 1999 के दौरान किसी बात को लेकर विभागीय अधिकारियों के आपसी विवाद के चलते वनाधिकारियों द्वारा एनजीओ के माध्यम से कालागढ की आवासीय कालोनियों को कार्बेट के भीतर बताते हुये खाली कराकर वन विभाग को सौंपे जाने की मांग कर न्यायालय में रिट याचिका दाखिल कर दी गयी।


इस मामले को लेकर बीते दो दशक से एनजीओ द्वारा हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट के अलावा सीईसी में अनेक याचिकायें दाखिल की गयीं। बताया जा रहा है कि एक ओर जहां कुछ एनजीओ कालागढ को खाली कराने के लिये एडी-चोटी का जोर लगाये हुये हैं। वहीं दूसरी ओर एक सामाजिक संगठन सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ता कालागढ का अस्त्ति्व बरकरार रखने के लिये लम्बं अर्से से कानूनी लडाई लड रहे हैं। हांलाकि इस बीच 1993 तथा 2003 के अलावा 2016 व 2017 चालू साल के जून माह के दौरान यहां से भारी संख्या में लोगों को बेदखल किया गया। जबकि इसी साल जून माह के दौरान प्रशासन द्वारा केन्द्रीय कालोनी स्थित सैकडों आवासों सहित भारी संख्या में नई कालोनी स्थित आवासीय तथा अनावासीय भवनों को ध्वस्त किया जा चुका है और इस कार्यवाही ने लगभग कालागढ़ को खत्म कर दिया है ।


"नम आंखे और रोते चेहरे भी नही रोक पाए प्रशासन का बुलडोजर"
केंद्रीय कालोनी में व नई कालोनी के आवासीय भवनों को जब जबरन खाली कराया जा रहा था तब महिलाओं की प्रशासन से तीखी बहस भी हुई । परन्तु प्रशासन ने बलपूर्वक उनके आवासों को खाली कराकर बुलडोजर चला दिया । रोती बिलखती महिलाओं के आंसू भी प्रशासन का बुलडोजर नही रोक सके ।

"कांग्रेस कार्यालय भी आया ध्वस्तीकरण की जद में"
प्रशासन द्वारा जहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, गैस एजेन्सी, व अन्य दफ्तर जमीदोंज हुए वही नगर कांग्रेस कार्यालय भी प्रशासन के बुलडोजर का शिकार हो गया । जिस पर कॉंग्रेस ने भी विरोध जताया ।

"बाधित रही विद्युत आपूर्ति गर्मी से लोग रहे परेशान"
कार्यवाही के दौरान अधिकारियों के आदेश पर  बिजली की आपूर्ति ठप कर दी गयी जिससे भारी गर्मी में लोगो को मुश्किलों का सामना करना पड़ा ।ध्वस्तीकरण की इस कार्यवाही के बाद से लोगो ने पलायन शुरू कर दिया है ।

एनजीटी के आदेशों के पालन किया जा रहा है। केन्द्रीय कॉलोनी तथा नई कॉलोनी स्थित अनेक सरकारी कार्यालयों सहित आवासीय भवनों को ध्वस्त किया जा रहा है। कमलेश मेहता,  एसडीएम, कोटद्वार


ध्वस्तीकरण की कार्यावाही के दौरान सुरक्षा के मद्देनजर शांति व्यवस्था कायम रखने के लिये पुलिस निरीक्षकों तथा उप निरीक्षकों सहित करीब दो सौ से अधिक पुलिसकर्मी तथा पीएसी के जवान तैनात किये गये थे। इसके अलावा आधा दर्जन दमकल वाहनों सहित एम्बुलेंस को लगाया गया था। जेआर जोशी, सीओ कोटद्वार


किसी भी दशा में कालागढवासियों के हितों की अनदेखी नहीं की जायेगी। यहां के पात्र लागों का पुर्नवास किये जाने की दिशा सकारात्मक कार्यावाही की जा रही है। सरकार द्वारा कालागढ के अवैध अध्यासियों के पुर्नवास सम्बंधी शपथ-पत्र न्यायालय में दाखिल किया जा चुका है। कालागढ के मामले को लेकर सरकार बेहद गंभीर है। डा. हरक सिंह रावत क्षेत्रीय विधायक तथा काबीना मंत्री


डबल इंजन की सरकार फेल हो चुकी है। कालागढ के मामले में राज्य सरकार की लापरवाही सामने आयी है। ध्वस्तीकरण की कार्यावाही किया जाना पूरी तरह जनता के हितों के विपरीत है। सरकार द्वारा कालागढवासियों का पुर्नवास किये जाने की दिशा में काम किया जाना चाहिये। शैलेन्द्र सिंह रावत, पूर्व विधायक कोटद्वार |

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