हाथी ने आतंकित होकर जिप्सी पर किया हमला

Publish 10-03-2019 19:16:27


हाथी ने आतंकित होकर जिप्सी पर किया हमला


2 मांह से कर्मचारियों को नहीं मिला बेतन
अल्मोड़ा 22 अगस्त, 
यहां 1836 में स्थापित करबला स्थित लेप्रोसी मिशन शासन, प्रशासन व दानवीरों की उदासीनता के चलते बंद होने की कगार पर पहुंच रहा है। हालत यह है कि कुष्ठ रोगियों को समर्पित इस संस्था को विगत आठ सालों से कोई फंड नही मिला है, वहीं कार्यरत स्टॉफ को विगत दो माह से तनख्वाह नहीं मिल पाई है। इस बेरूखी का शिकार बने स्टॉफ के सामने से सबसे अधिक दिक्कत यह है कि उनकी कोई विगत आठ सालों से सुन नही रहा और लोकल फंडिंग भी पहले नोटबंदी फिर जीएसटी जैसे प्रावधान लागू होने के बाद न के बराबर रह गई है। आलम यह है कि समाज का राजैतिक व प्रबुद्ध वर्ग भी कुष्ठ रोगियों की मदद को लेकर अब कंजूसी बरतने लगा है। इन हालातों में यहां कार्यरत स्टॉफ के बीच अनशन पर बैठने की सुगबुगाहट शुरू हो रही है। यदि ऐसा होता है तो यह मामला इतिहास में केंद्र व प्रदेश सरकार की सबसे बड़ी नाकामी के रूप में गिना जायेगा। उल्लेखनीय है कि करबला स्थित लैप्रोसी मिशन की स्थापना अक्टूबर 1836 को हुई थी। एक समय में कुष्ठ रोग लाइलाज माना जाता था और समाज भी कुष्ठ रोगियों का त्याग कर देता था। तब कुष्ठ रोगियों की सेवा और उन्हें रोग मुक्त करने के लिए इस आश्रम की स्थापना हुई थी। वर्तमान में यहां एक चिकित्सक, नर्स, प्रबंधक, फार्मासिस्ट, चौकीदार, चालक आदि को मिलाकर कुल आठ लोगों का स्थायी स्टॉफ है। इसके अतिरिक्त यहां आम जनता से मदद को चंदा वसूलने के लिए स्वयं सेविका भी है। इस आश्रम में स्वयंसेविका के रूप में जुड़ी सरिता मैसी का कहना है कि पहले समाज का प्रबुद्ध वर्ग खुलकर आर्थिक मदद करता था, लेकिन नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद लोग बडी मदद नही कर रहे हैं। प्रभारी अधीक्षक, लेप्रोसी मिशन अस्पताल आनंद सिंह ने कहा कि पहले दिल्ली हेड ऑफिस से ग्रांट आती थी। इंग्लैंड और वेल्स से मदद मिला करती थी, लेकिन आठ सालों से ग्रांट बंद हो गई है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में यहां कुल 28 कुष्ठ रोगी रह रहे हैं। महिला व पुरूषों के लिए अलगकृअलग वार्ड व सारी सुविधाएं हैं। हालांकि इन कुष्ठ रोगियों के लिए राशनकृपानी की वर्तमान में पर्याप्त व्यवस्था है, लेकिन दो माह से तनख्वाह नही आने से स्टॉफ बहुत परेशान है। वही दूसरी ओर जिस तरह से लोकल मदद नही मिल रही उससे आने वाले समय में कुष्ठ रोगियों के लिए भी दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। उन्होने कहा कि अब स्टॉफ ने तय किया है कि बहुत जल्द इस मसले को लेकर वह जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपेंगे। यदि फिर भी उनकी कही सुनवाई नही होती है तो अनशन पर बैठने के अलावा कोई अन्य विकल्प नही बचता है। अलबत्ता देखना यह है कि मौजूदा सरकार और जिला प्रशासन लैप्रोसी मिशन को बचाने के लिए क्या कदम उठाता है।

अक्टूबर 2010 से नही मिली ग्रांट
अल्मोड़ा 22 अगस्त,
लेप्रोसी मिशन ट्रस्ट इंडिया ने समाज में तिरस्कृत कुष्ठ रोगियों की पीड़ा मिटाने को मुफ्त उपचार व सुविधा देने का बीड़ा उठाते हुए सन् 1836 में करबला अल्मोड़ा में लेप्रोसी मिशन अस्पताल खोला। देश में ऐसे मात्र 14 अस्पतालों में से उत्तराखंड का यह अपने तरह का अकेला है। जो शुरू से कर्मचारियों के वेतन व कुष्ठ रोगियों की व्यवस्था को ट्रस्ट ग्रांट देता रहा, मगर संकट तब उभरा जब ट्रस्ट ने अक्टूबर, 2010 से ग्रांट देनी बंद कर दी। अस्पताल से कहा कि स्थानीय स्तर से दान जुटाकर बांकी इंतजाम करे।

चंदा, दान और उधारी यही नियति है कुष्ठ रोग अस्पताल की
अल्मोड़ा 22 अगस्त,
वर्तमान में प्रतिमाह लगभग एक लाख वेतन व एक लाख रुपये मरीजों की व्यवस्था में खर्च हो रहा है। यह सब किसी प्रकार से दान या उधारी से चल रहा है। कुछ स्थायी मददगार हैं, जो कुछ रकम हर माह अस्पताल को दे देते हैं और कुछ चंदा किया जाता है। इसके अलावा कुछ राशि अस्पताल के ओपीडी से मिलता है। यही सब सहारा है। सालों से कुष्ठ रोगियों का यह अस्पताल आर्थिक संकट का जबर्दस्त सामना कर रहा है। अस्पताल की माली हालात सुधर नहीं पा रहे। दान से जुटी राशि से ही वह भी काम चला रहे हैं। ऐसे में कुष्ठ रोगियों की सेवा में लगे स्टाफ व कुष्ठ रोगियों के चेहरों पर मायूसी है।

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