बर्फवारी से ऊंचाई वाले स्थानों पर जनजीवन अस्त व्यस्त

Publish 10-02-2019 18:06:02


बर्फवारी से ऊंचाई वाले स्थानों पर जनजीवन अस्त व्यस्त

पिथौरागढ़ | लोक गायिका कबूतरी देवी का निधन“आज पनि झौं-झौ, भोल पनि झौं-झौं, पोरखिन त न्है जूंला” और “पहाड़ों को ठण्डो पाणि, कि भलि मीठी बाणी” आदि लोकगीतों को हाई पिच पर गाने वाली सुर साम्राज्ञी और उत्तराखंड की जानी मानी लोक गायिका कबूतरी देवी का आज शनिवार को पिथौरागढ़ के जिला अस्पताल में सांस की तकलीफ के कारण निधन हो गया। 73 वर्षीय कबूतरी देवी के निधन से उत्तराखंड की लोक संस्कृति की अपूरणीय क्षति हुई है। इस शोक समाचार के सामने आने के बाद उनका परिवार और प्रशंसक शोक में डूबे हुए हैं।
उत्तराखंड की तीजनबाई कही जाने वाली कबूतरी देवी पिथौरागढ़ के क्वीतड़ ब्लॉक मूनाकोट की रहने वाली थीं। इनका जन्म काली-कुमाऊं (चम्पावत जिले) के एक लोक गायक परिवार में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा इन्होंने अपने गांव के देब राम और देवकी देवी और अपने पिता श्री रामकाली जी से ली, जो उस समय के एक प्रख्यात लोक गायक माने जाते थे। पहाड़ी गीतों में प्रयुक्त होने वाले रागों का निरन्तर अभ्यास करने के कारण इनकी शैली अन्य गायिकाओं से अलग है। विवाह के बाद इनके पति श्री दीवानी राम जी ने इनकी प्रतिभा को पहचाना और इन्हें आकाशवाणी और स्थानीय मेलों में गाने के लिये प्रेरित किया। उस समय तक कोई भी महिला संस्कृतिकर्मी आकाशवाणी के लिये नहीं गाती थीं। वे पहली महिला लोक गायिका थी जिन्होंने ठेठ कुमाऊनी के लोकगीतों को आकाश वाणी के मंच पर भी लोकप्रिय बनाया था।
70 के दशक में इन्होंने पहली बार दूर दराज पहाड़ के गांव से स्टूडियो पहुंचकर रेडियो जगत में अपने गीतों से धूम मचा दी थी। कबूतरी देवी ने आकाश वाणी के लिए लगभग 100 से अधिक गीत गाए। उनके द्वारा गाए गीत आकाशवाणी के रामपुर, लखनऊ, नजीबाबाद और मुंबई के केन्द्रों से प्रसारित होते रहे हैं। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित कबूतरी देवी ने पर्वतीय लोकगायन की विधा को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया था।उत्तराखंड की बोली,भाषा और संस्कृति को जीवंत रखते हुए उसे एक नई पहचान दिलाने में कबूतरी देवी जी का योगदान उत्तराखंड कभी नहीं भुला सकता है।जीवन के लगभग 20 साल तक संघर्षपूर्ण जीवन बिताने के बाद 2002 से उनकी प्रतिभा को उचित सम्मान मिलना शुरू हुआ और उन्हें राष्ट्रपति सम्मान से विभूषित किया गया। इसके बाद उन्हें सामाजिक संस्थाओं द्वारा भी कई सम्मानों ने नवाजा गया। वर्ष 2002 में नवोदय पर्वतीय कला केन्द्र, पिथौरागढ़ ने उन्हें छोलिया महोत्सव में बुलाकर सम्मानित किया तथा लोक संस्कृति कला एवं विज्ञान शोध समिति ने अल्मोड़ा में सम्मानित किया। इसके अलावा इन्हें पहाड संस्था ने सम्मानित किया। साथ ही उत्तराखंड के संस्कृति विभाग ने भी उन्हें पेंशन देने का भी फैसला किया। कबूतरी जी वर्तमान में पिथौरागढ़ में अपनी पुत्री के साथ रह रहीं थीं।

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