मिथकों की सीट टिहरी...राजपरिवार पर भारी पड़ सकते हैं भगवान बद्री विशाल

Publish 28-03-2019 14:04:22


मिथकों की सीट टिहरी...राजपरिवार पर भारी पड़ सकते हैं भगवान बद्री विशाल

देहरादून (चंद्रशेखर पैन्यूली): आजकल पूरे देश में आम चुनाव की चर्चा है। पहले चरण के लिए नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद तय हो चुका है कि मैदान में कौन-कौन योद्धा अपना भाग्य आजमा रहे हैं। चुनाव और खेल दो ऐसी चीजें हैं, जहां मिथक और टोटकों को खूब माना जाता है। उत्तराखंड की टिहरी लोकसभा सीट भी कई तरह के मिथकों को अपने साथ लेकर चल रही है। साथ ही इस सीट पर इस बार जीत जिसकी भी होगी। नया इतिहास बनना तय है। टिहरी लोकसभा सीट उत्तरकाशी, देहरादून और टिहरी जिलों की 14 विधानसभाओं में से मिलकर बनी है।
इन आम चुनाव में इस सीट पर तीन नाम उभरकर सामने आ रहे हैं। पहला नाम बीजेपी प्रत्याशी और पिछले 7 वर्षों से यहां की सांसद माला राज्यलक्ष्मी शाह, दूसरे हैं 4 बार से लगातार चकराता विधानसभा से विधायक राज्य के पूर्व गृह मंत्री कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और तीसरा नाम उभरकर आ रहा है कथावक्ता गौ-गंगा कृपाकांक्षी गोपालमणि महाराज का। अब बात करते हैं कि ऐसा क्या होने वाला है, जिससे इस सीट पर नया अध्याय जुड़ेगा। दरअसल, बात ये है कि यदि बीजेपी प्रत्याशी तीसरी बार सांसद बनने में सफल हुई तो, वो लगातार चुने जाने के कारण हैट्रिक लगाने वाली प्रथम महिला होंगी। इसमें जो सबसे बड़ी बात है वो यह है कि वे राजपरिवार के उस मिथक को भी तोड़ देंगी जो राज परिवार के साथ जुड़ा है।
अब मिथक की बात करते हैं। मिथक यह है कि जब भी बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद रहते हैं, राजपरिवार ने कोई चुनाव नहीं जीता। इस बार भगवान बद्रीनाथ मंदिर के कपाट 10 मई को खुलेंगे जबकि वोटिंग करीब एक माह पहले यानि 11 अप्रैल को हो चुकी होगी। राजपरिवार के लिए राहत की बात यह मानी जा सकती है कि मतगणना के दिन 23 मई को बद्रीनाथ खुल चुके होंगे। लेकिन, एक बात यह भी है कि जीत हार वोटिंग पर ही तय होती है, जो पहले ही हो चुकी होगी। देखना यह होगा कि इस बार यह मिथक टूटता है या नहीं। ऐसा पहले हो चुका है। इसलिए इसे मिथक माजा रहा है। वास्तव में क्या होता है। यह देखने वाली बात होगी।
बीजेपी प्रत्याशी राज्यलक्ष्मी शाह टिहरी के दिवंगत महाराजा मानवेन्द्र शाह की बहू हैं। इससे पूर्व मानवेन्द्र शाह आठ बार सांसद रह चुके हैं। इस लोकसभा क्षेत्र की पहली सांसद उनकी माता कमलेन्दु मति शाह थी। कुल मिलाकर अभी तक 13 में से 11 बार राजपरिवार यहां चुनाव जीता है। 2 बार 1971 और 2007 में यहां राजपरिवार को हार मिली। कहा जाता है कि 1971 में बद्रीनाथ मन्दिर के कपाट चुनाव में बंद थे। तब कांग्रेस के परिपूर्णानन्द पैन्यूली ने महाराजा मानवेन्द्र शाह को हराकर पहली बार राजपरिवार के बाहर सांसद जीत हासिल की थी। 1971 के चुनाव में मिली जीत से परिपूर्णानन्द पैन्यूली इतने उत्साहित थे कि 1977 में उन्होंने जनता पार्टी के टिकट के ऑफर को ठुकरा दिया। जनता पार्टी ने परिपूर्णानन्द पैन्यूली की ना के बाद टिकट 3 बार के विधायक खांटी नेता त्रेपन सिंह नेगी को दिया था, जो 77 के बाद 80 में भी सांसद चुने गए थे। 1971 के चुनाव से मानवेन्द्र शाह 1991 तक कोई चुनाव नही लड़ा और जब लड़ा तो बीजेपी में शामिल होकर लड़ा। उसके बाद वो जीवन पर्यंत बीजेपी सांसद रहे।
दूसरी बात ये कि यदि कांग्रेस के प्रीतम सिंह जीतते हैं तो वो भी पहली बार सांसद बनने का नया अध्याय जोड़ेंगे। प्रीतम सिंह के पिता गुलाब सिंह भी यूपी में विधायक रहे। बीजेपी प्रत्याशी माला राज्यलक्ष्मी शाह और प्रीतम सिंह को राजनीति विरासत में मिली है। प्रीतम सिंह यदि ये चुनाव जीतते हैं और वो राजपरिवार की बहू बीजेपी की माला राज्यलक्ष्मी को चुनावी शिकस्त देते हैं तो एक नया इतिहास बनाएंगे। वो ये कि आज तक राजपरिवार को दो बार के चुनावी हार में ब्राह्मणों ने ही राजपरिवार को शिकस्त दी। 1971 में महाराजा मानवेन्द्र शाह को परिपूर्णानन्द पैन्यूली ने और 2007 में मनुजयेन्द्र शाह को विजय बहुगुणा ने शिकस्त दी थी। यदि प्रीतम सिंह, राज्यलक्ष्मी शाह को हराते हैं तो वे पहले गैर ब्राह्मण होंगे जो राजपरिवार को शिकस्त देंगे। शायद कांग्रेस के भीतर किशोर उपाध्याय और नवप्रभात को टिकट देने का एक फॉर्मूला ये भी रहा होगा। अब प्रीतम हाई कमान की तरह यदि जनता के भी प्रीतम प्यारे हो गए तो एक नया इतिहास प्रीतम सिंह लिख लेंगे।
तीसरे निर्दलीय प्रत्याशी कथावाचक गोपालमणि यदि चुनाव जीत जाते हैं तो वो भी एक  इतिहास लिख लेंगे कि निर्दलीय लड़कर पहली बार में ही जीत गये। या फिर यूकेडी, अन्य दल या अन्य निर्दलीय कोई जीत जाये तो वो भी टिहरी के लिए एक नया इतिहास ही होगा। हालांकि अभी किसी के भी जीतने-हारने की कोई भविष्यवाणी करना बहुत जल्दबाजी होगी। टिहरी सीट पर कोई भी जीते। नया इतिहास जरूर बनेगा।

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