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जाने कुली बेगार प्रथा के बारे में, किस तरह कुमाऊँ में जगी थी क्रांति की अलख

14-01-2020 15:40:27 By: एडमिन

उत्तराखण्ड (प्रदीप रावत "रवांल्टा"): 14 जनवरी 1921 ये साल और तारीख दोनों ही उत्तराखंड के इतिहास के लिए खासे महत्वपूर्ण और बड़े हैं। बागेश्वर में सरयू के किनारे लगने वाले मेले को भी इस दिन से गहरा नाता है। मेला भले ही धार्मिक महत्व रखता है, लेकिन उत्तराखंड के इतिहास से भी इस मेले का उतना ही गहरा नाता है। 14 जनवरी 1921। इसी दिन उत्तराखंडियों को अंग्रेजों के गुली-बेगार प्रथा से मुक्ति मिली थी।

 

 

इसी दिन 1921 में बागेश्वर के उत्तरायणी के मेले में कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे की मार्गदर्शन और नेतृत्व में कुली-बेगार के रजिस्टरों को सरयू में बहा दिया गया था। कुली-बेगार एक ऐसी प्रथा थी, जिसमें आम लोगों को बिना भाड़े और महनताने के अंग्रेजों के लिए जबरन कुली बना दिया जाता था। इस प्रथा से तब लोग खासे परेशान थे। लोगों की पीड़ा और अंग्रेजों के दमन को देखते हुए कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे और अनुसूया प्रयाद प्रसाद बहुगुणा ने योजना बनाई और कुली-बेगार प्रथा से लोगों को मुक्ति दिलाई।
 

काॅमरेड इंद्रेश मैखुरी ने कुली-बेगार प्रथा को लेकर फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर आंदोलन के अग्रजों को याद किया है. उन्होंने लिखा है कि कुली-बेगार आम लोगों को अंग्रेजों के लिए बिना किसी भाड़े के जबरन कुली बनाने के प्रथा थी। अंग्रेज अफसर के इलाके के दौरे पर आने पर पधान (प्रधान) और पटवारी का जिम्मा होता था कि वह अंग्रेजों के लिए मुफ्त के कुली उपलब्ध करवायें। इस शोषणकारी प्रथा के विरुद्ध कुमाऊं में लड़ाई के नेता बद्री दत्त पांडे थे और गढ़वाल में अनुसूया प्रसाद बहुगुणा। अंग्रेज राज में इस उत्पीड़नकारी प्रथा को सरयू बगड़ में बहा देने वाले संग्रामियों को सलाम।

 

वीडियो साभार : वरिष्ठ पुलिस अधिकारी प्रमोद शाह