उत्तराखंड के रवांई की लोक संस्कृति और भाषा को जाने , पढ़े पूरा समाचार

Publish 28-11-2018 21:59:07


उत्तराखंड के रवांई की लोक संस्कृति और भाषा को जाने , पढ़े पूरा समाचार

यमुनाघाटी/उत्तराखंड(प्रदीप रावत "रवांल्टा"): ...इस महोत्सव  को ऐसा करा सकते थे या फिर वैसा करा सकते थे...इस तरह के बहुत सारी बातों से हमारा भी सामना हो रहा है। बहरहाल...मेरा योगदान रवांई लोक महोत्सव में बहुत अधिक नहीं था, लेकिन थोड़ा बहुत जरूर था। आयोजक नहीं था, लेकिन खुद को आयोजक की भूमिका में देख रहा था। ठीक ऐसे ही...थोड़ा देरी से ही सही पर कुछ लिखने का वक्त है। लिखना बेहद जरूरी है। रवांई लोक महोत्सव। एक ऐसा महोत्सव है, जिस सपने को दिल्ली से देखा गया, देहरादून में बुना गया और नौगांव में साकार किया गया। इस बार का लोक महोत्सव दूसरा लोक महोत्सव था। पहले यह बताना आवश्यक है कि महोत्सव बेहद शानदार रहा। सबसे पहले दर्शकों का आभार, जिन्होंने तीन दिनों तक महोत्सव में आकर हौसला बढ़ाया। हमारा भी और हमारे कलाकारों का भी। महोत्सव को सफल बनाने का असल श्रेय आप दर्शकों को ही जाता है। टीका-टिप्पणी करने वाले चंद लोग होते हैं। सकारात्मक बातों का स्वागत हृदय से और नकारात्मक टिप्पणियों का उतनी ही तीव्रता से प्रतिकार किया जाना चाहिए।


लोक संस्कृति हमारी जड़ और चेतन है। हमारी पहचान पूरे देश-दुनिया में हमारी संस्कृति से ही है। सिर्फ संस्कृति नहीं, बल्कि लोक संस्कृति। रवांई लोक महोत्सव भी उसी लोक संस्कृतिक को और विस्तार देने का एक प्रयास है। शशि मोहन रावत (रवांल्टा) और टीम रवांई लोक महोत्सव की पूरी टीम को खुले मन से बधाई और शुभकामनाएं। लोक की जिस संस्कृति को हम विस्तार देना चाहते हैं। वो जिंदा तो है, लेकिन आधुनिकता में कहीं खोती जा रही है। रवांई लोक महोत्सव आधुनिकता में खोती संस्कृति को धीरे-धीरे उसके मूल स्वरूप में लेजाने का एक अभियान है। इस अभियान में मीडिया की भूमिका बेहद अहम है और उन्होंने हमें पूरा सहयोग किया। देहरादून से मनोज ईष्टवाल, दिनेश कंडवाल, भार्गव चंदोला, इंद्र सिंह नेगी, सुभाष तरान, राजीव नयन बहुगुणा और भी कई लोग आए थे। आकाशवाणी से अनिल दत्त शर्मा भी कार्यक्रम में पहुंचे और उसे सफल बनाने के में अपने-अपने ढंग से आहुति दी, सभी का दिल से आभार। स्थानीय स्तर पर अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिन्दिस्तान, सहारा समय से लाकर डिजिटल मीडिया के साथियों ने भी पूरा सहयोग दिया। तमाम चैनलों का भी पूरा सहयोग मिला।
जब भी कोई आयोजन होता है, उसमें कुछ कमियां रह जाती हैं। उन कमियों को खोजकर अगली बार जब भी हम आयोजन करें, तो इस साल की कमियां बिल्कुल भी नजर नहीं आएंगी। कमियां बताने वाले लोगों का स्वागत है, लेकिन अगर कमियां केवल खामियां गिनाने के लिए है, तो उनको महत्व नहीं दिया जा सकता। अगर किसी के पास सुझाव हों, तो उनका हर पल स्वागत है। पहले दिन से लेकर आखिरी दिन तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही। एक से बढ़ कर एक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दी। एक नजर में अगर देखा जाए तो जिस लोक संस्कृति को हम संरक्षित करने और विस्तार देने की बात कर रहे हैं, उसमें हमारे लोक कलाकार पूरे नंबरों से पास हुए हैं।
सरनौल गांव के पांडव दल ने कार्यक्रम को बेहतर बनाया। निधी राणा के गीतों ने मुझे व्यतिगततौर पर प्रभावित किया। सुरेंद्र राणा ने अच्छे गाने गाए। बेसारी बंधुओं में सबसे छोटे बेसारी ने मुझे प्रभावित किया। आवाज और हर साज-बाज को बजाने का उनका हुनर वाकई शानदार है। प्रख्यात साहित्यकार लोक संस्कृति और अपनी लोक भाषा के चितेरे महावीर रवांल्टा जी के सानिध्य में कवि सम्मेलन ने खूब वाहवाही लूटी और अब भी साराहा जा रहा है। रवांई के लोकरत्नों के नाम से जो पुरस्कार दिए गए और उनके लिए जिन पात्र लोगों का चयन किया गया। उसकी लोगों ने खूब सराहना की है। जिन लोगों का चयन किया गया। उनके चयन के लिए टीम रवांई लोक महोत्सव को साधुवाद। उम्मीद करते हैं। रवांई की लोक संस्कृति को और विस्तार देने और फलक पर चमकाने के लिए सभी का साथ बना रहेगा।

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