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30-03-2019 18:25:45


सुख, समृद्धि एवं खुशहाली का पर्व गणेश चतुर्थी
कोटद्वार (गौरव गोदियाल)|
भारतीय परम्परा में गणेश चतुर्थी के दिन ही बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता भगवान गणेश का जन्म हुआ था। इस पर्व को देश भर में खास तौर से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में बहुत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।10 दिन तक चलने वाला यह उत्सव गणेश चतुर्थी से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है. गणेश चतुर्थी के दिन भक्त प्यारे बप्पा की मूर्ति को घर लाकर उनका सत्कार करते हैं। फिर 10वें दिन यानी कि अनंत चतर्दशी को विसर्जन के साथ मंगलमूर्ति भगवान गणेश को विदाई जाती है। साथ ही उनसे अगले बरस जल्दी आने का वादा भी लिया जाता है।
भारत के लोकप्रिय त्योहारों में गणेश चतुर्थी धार्मिक आस्था तथा सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय पर्व भी है। सन् 1893 में महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक ने सार्वजनिक समारोह के रूप में पूणे, महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी की शुरुआत की। इस त्योहार को तब शुरू करने का मुख्य उद्देश्य था स्वतंत्रता संग्राम के संदेश को जन जन तक फैलाना और एकता, देशभक्ति की भावना को मजबूती प्रदान करना। तब से लेकर महाराष्ट्र,गोवा, कनार्टक और आंध्र प्रदेश में गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान् गणपति के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में यह गणेशोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। सार्वजनिक रूप से विशाल गणेशोत्सवों का आयोजन किया जाता है। यह दस दिवसीय त्योहार भाद्रपद की चतुर्थी से प्रारम्भ होकर शुक्ल पक्ष की अनंत चतुर्दशी को सम्पन्न होता है। मान्यता है कि इन दस दिनों में भगवान् गणपति पृथ्वी पर आकर मनुष्यों को अपने वरदानों से कृतार्थ करते हैं। इस त्योहार के प्रथम दिन घरों, अस्थायी पूजा केंद्रों अथवा पंडालों में भगवान गणेश की मूर्तियों की स्थापना की जाती है। दस दिन तक विधि विधान के साथ यह त्योहार मनाते हए ग्यारहवें दिन इन प्रतिमाओं का जल में विसर्जन किया जाता है।पूणे शहर तथा पूरे महाराष्ट्र भर में गणेश उत्सव के अवसर पर महीने तक विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। कलाकार, गायक, नृत्यशिल्पी अपनी कलात्मक प्रस्तुतियों को भगवान् गणेश के चरणों में समर्पित करते हैं। हिन्दू धर्म परंपरा में भगवान गणपति आदिदेव हैं घर या परिवार में किसी भी शुभकार्य की शुरुआत निर्विघ्न सिद्धि के लिए ‘ॐ गणेशायः नमः’ मंत्र के उच्चारण के साथ की जाती है।किसी भी देवी-देवता के मंदिर में भगवान गणेश का स्थान ज़रूर रहता है।
'ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक तिथि किसी न किसी देवता की स्मारक तिथि होती है गणपति का प्राकट्य भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को होता है इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि चतुर्थी तिथि के स्वामी स्वयं गणपति है इसीलिए पुरे बारह महीनों में प्रत्येक चतुर्थी को गणेश चतुर्थी की भी संज्ञा दी गई है।
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान् गणेश को देवी पार्वती की दिव्य सृष्टि माना जाता है। उन्होंने चंदन के आटे से गणेश की सृष्टि की और उसमें जीवन का संचार किया। एक दिन देवी पार्वती स्नान के लिए जा रही थी तो उन्होंने गणेशजी को दरवाज़े की रखवाली के लिए कहा और यह भी कहा कि कोई भी अंदर न आ सके। उसी समय संयोग से भगवान् शंकर तपस्या से लौटकर आए और अपनी पत्नी पार्वती से मिलना चाहा। लेकिन गणेश जी ने उनको अंदर जाने से रोक दिया। इस पर शंकर जी ने क्रुद्ध होकर गणेश जी का गला काट दिया। शोरगुल की आवाज़ सुनकर देवी पार्वती दौड़कर आई, आकर अपने पुत्र की इस अवस्था को देखकर रो पड़ी। उसके बाद भगवान् शिव को अपनी गलती का पछतावा हुआ। उन्होंने देवी पार्वती से वादा किया कि वे अपने पुत्र को पुनः जीवन प्रदान करेंगे और जो भी जीवन्त प्राणी उनके रास्ते में सबसे पहले आएगा उसका मस्तक पुत्र को लगा देंगें और वह हाथी था जिसका मस्तक काट कर शंकर जी ने गणेश के कटे हुए गले पर लगा दिया। सिद्धि विनायक गणेश भगवान् शिव और माता पार्वती के परम प्रिय पुत्र हैं। गौरी-शंकर सुत गणेश हर जीव-जगत के हृदय में विराजमान हैं। सुख-सौख्य, शौर्य और रिद्धी-सिद्धी के प्रदाता हैं। बुद्धि और मंगल के देवता गणेश जी की कृपा से ही जीवन में सफलता और निर्विघ्न कार्य सम्पन्न करने का हमें आशीर्वाद मिलता है। माता-पिता के प्रति असीम सम्मान प्रदर्शित करने के कारण गणेश जी सभी देवताओं में प्रथम पूजन के अधिकारी बने।