रवांई घाटी में पर्यटन की अपार संभावनाओं पर सरकारी ग्रहण

Publish 30-03-2019 18:25:45


रवांई घाटी में पर्यटन की अपार संभावनाओं पर सरकारी ग्रहण

यमुनाघाटी/रवाई घाटी (प्रदीप रावत "रवांल्टा"):  यमुना घाटी में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। इन संभावनाओं को कभी कभी मूर्तरूप में ढालने का इमानदार प्रयास नहीं किया गया। यमुना घाटी में ऐतिहासिक और पौराणिक दोनों ही तरह से खासी महत्वपूर्ण है। यमुनाघाटी को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला हिस्सा रवांई-जौनपुर और दूसरा हिस्सा जौनसार को आता है। जिसका ज्यादातर हिस्सा देहरादून जिले में आता है। जबकि शेष हिस्सा उत्तरकाशी जिले में ही है। इसके अलावा जहां तक रवांई की बात है, तो रुपिन-सुपिन नदियों की घाटियां और इन दोनों के संगम के बाद की टौंस घाटी का अपना अलग महत्व है।
रवांई-जौनपुर-जौनसार धार्मिक दृष्टि से बेहत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पूरे क्षेत्र में महासू देवता की पूजा की जाती है। अलग-अलग स्थानों के अपने अलग देवता भले ही हों, लेकिन महासू देवता का महासू मंदिर संपूर्ण रवांई-जौनपुर और जौनसार के लोगों को आस्था का केंद्र है। जहां तक पर्यटन की बात है तो इन क्षेत्रों में कई ऐसे स्थल हैं, जिनको पर्यटन के रूप में डवलप किया जा सकता है, लेकिन आज तक उस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया।
मंदिरों को छोड़ भी दिया जाए तो यमुना में कई ऐसे रूट हैं, जो सीधे हिमाचल तक जाते हैं। हरकीदून विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है, लेकिन सरकारों की उदासीनता के चलते आज तक उसको जगह नहीं मिल पाई। इसके अलावा यमुना घाटी में कई ऐसे ताल हैं, जिनको पर्यटन के नक्शे पर आने का इंतजार है।
हिमाचल से लगे सरुताल को हिमाचल ने डवलप कर लिया, लेकिन उत्तराखंड सरकार ने अपने हिस्से में आने वाले सरुताल पर आज तक फोकस ही नहीं किया। सरुताल को लेकर कभी गंभीरता नहीं दिखाई गई। हिमाचल की सीमा से इतर एक दूसरा सरुताल रवांई घाटी के सरनौल गांव के कुछ आगे चलकर है। यहां पहुंचने के लिए आज तक रास्ते तक नहीं बनाए गए। मोरी विकासखंड में भरासर ताल समेत कई अन्य छोटे ताल भी हैं। उनको भी सरकार ने कभी पर्यटन के लायक नहीं समझा।
यमुना घाटी की सबसे बड़ी विशेषता रवांई की समृद्ध संस्कृति और भवन शैली है। भवनशैली को ग्रामीण पर्यटन के लिहाज से प्रचारित किया जा सकता है। जिससे गांवों की आर्थिकी भी मजबूत होगी। कई ऐसे भवन हैं, जो 100 से 450-500 साल तक पुराने हैं। ऐसे भवनों को पर्यटन केंद्रों के रूप में भी विकसित किया जा सकता है। लेकिन, वह तब तक संभव नहीं, जब तक सरकार इस दिशा में गंभीरता से काम ना करे।
सरकार ने भी ग्राम दर्शन योजना चलाने के दावे किए, लेकिन अब तक ग्राम दर्शन की कोई भी योजना शुरू नहीं की गई है। बल्कि सरकार देहरादून में बैठकर कुछ ऐसी योजनाओं पर काम कर रही है, जिससे ग्रामीण पर्यटन पर बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है। इतना ही नहीं, उससे पलायन को भी बढ़ावा मिलेगा। एक तरफ जहां सरकार पलायन आयोग बनाकर पलायन रोकने का ढौंग कर रही है। वहीं, दूसरी ओर देहरादून में उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति को पार्क में कैद करने की योजना भी बना रही है। सरकार ने इसके लिए बाकायदा रिसोर्स पर्सन भी नियुक्त किए हैं, जिनको इस पार्क में पहाड़ से पुराने भवनों से लेकर अन्य विरासतों को उखाड़कर लाने का जिम्मा दिया गया है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सरकार की ये योजना कितनी नुकसान देने वाली हो सकती है।
शराब प्रदेश में जानलेवा होने के साथ ही पहाड़ की आर्थिकी को गहरी चोट पहुंचा रही है। सरकार को भले ही शराब से बड़ा राजस्व मिल रहा हो, लेकिन पहाड़ के हर गांव के पास खुदे अंग्रेजी शराब के ठेकों पर मजदूरी करके कमाने वाले लोगों की जेबें खाली हो रही हैं। सरकार ने अपने ही राज्य के लोगों की जेबों को ढीला करने के लिए शराब को जरिया बनाया है। जिससे आर्थिक और शारारिक दोहरा घाटा हो रहा है। अगर सरकार को आर्थिकी बढ़ाने और राजस्व बढ़ाने की चिंता है, तो उसके लिए पर्यटन सबसे बड़ा जरिया है।
धार्मिक पर्यटन की संभावनाओं का भी आजतक पूरा लाभ नहीं उठाया गया। केवल बदरी-केदार दो ही धामों पर अधिक फोकस किया जाता है। गंगोत्री और यमुनोत्री को लेकर किसी भी सरकार की चिंताएं नहीं रही। इसके अलावा कई बड़े मंदिर और धाम उत्तराखंड में है। इन मंदिरों को जोड़ने के लिए धार्मिक सर्किट और पर्यटन सर्किट बनाने की घोषणाएं कई बार हो चुकी हैं, लेकिन आज तक किसी भी सर्किट को धरातल पर उतारे का प्रयास ही नहीं किया गया। पर्यटन विभाग ने योजनाएं तो कई बनाई हैं, लेकिन कागजों में दफन फाइलों में कैद योजनाओं को बाहर निकाल कर धरातल पर उतारने का प्रयास ही नहीं किया गया।
सरकार को योजनाएं बनाने के साथ इस बात भी ध्यान रखना चाहिए कि वो योजनाएं सरल हों। उन योजनाओं से सीधे आम जनता का लाभ हो। योजनाएं दीर्घकालिक होनी चाहिए। होम स्टे योजना की तरह नहीं, जिसके गति पकड़ते ही सरकार ने उस योजना को व्यावसासिक बनाकर सीधे होटल व्यवसाय में बदलकर रख दिया। नतीजा यह रहा कि जो लोग होम स्टे की ओर बढ़ रहे थे, उनके कदम ठिठक गए। सरकार को पर्यटन की संभानाएं जंगलों के अलावा गांवों भी तलाशनी होंगी। गांवों से ही तरक्की का रास्ता निकलेगा। वहीं से राज्य की समृद्धि की राह भी निकलेगी।

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