विलुप्त होती उत्तराखण्ड की ढोल दमाऊ परम्परा , जाने पूरी खबर

Publish 08-12-2018 20:58:55


विलुप्त होती उत्तराखण्ड की ढोल दमाऊ परम्परा , जाने पूरी खबर

गढ़वाल । उत्तराखंड का प्राचीनतम हर शुभ अवसरों और मांगलिक कार्य में बजने वाला पारंपरिक ढोल - दमौ आज विलुप्त होने की कगार पर है। पाश्चात्य संस्कृति और बिगड़ते सामाजिक ताने-बाने ने इस परंपरा को भी अपनी चपेट में ले लिया। यह विद्या केवल अब शादियों, मेलो , स्टेज शो  में प्रतीकात्मक रूप में बजते दिख जाएगें। सदियों से इस परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने वाले बाजी इस विद्या से मुंह मोड़ने लगे हैं। अगर जल्दी ही इस परंपरागत विद्या को बचाने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई तो वह दिन दूर नहीं जब यह विद्या किस्से और कहानियां बनकर रह जाएगी।

 

आपको बता दें ढोल को सृष्टि का प्राचीनतम् वाद्य कहा गया है। वेदों, पुराणों महाभारत तथा रामायण में इसका उल्लेख मिलता है। ढोल को सर्वप्रथम भगवान शिव ने धारण किया और संसार के सृजन का क्रम ढोल नाद से हुआ। ढोल को ईश्वर पुत्र कहा गया है। ढोल तांबे की धातु का बना होता है जिसके विभिन्न अंग क्रमशः कंदोंटी (स्कन्द पट्टिका) चाक पट्टिका से लगा कुण्डलों, पूड़, बिजैसार (पीतल की पट्टिका) कुण्डली, कसणी, डोरी, लाकुड़ (बजाने की लगड़ी) आदि। ढोल सागर में इनका विस्तृत वर्णन किया गया हैं। इसके जो भी अंग-प्रत्यंग है। ये किसी न किसी के पुत्र हैं। यानि इनके आकार है। यहाँ तक कि उससे निकलने वाला नाद (स्वर) भी वायु पुत्र है। यदि वायुमण्डल न हो तो नाद कैसे गूंजेगा।ढोल का सहायक वाद्य है- दमौ, जिसका ढोल के साथ चोली दामन का साथ है अर्थात् दमौ के बिना ढोल अधूरा है। दमौ भी तांबे की धातु का बना होता है।  ‘नाद‘ का शास्त्रीय ग्रन्थ है ‘ढोल सागर‘ जिसमें ढोल बजाने के नियम तथा पद्धतियों का सूक्षम वर्णन किया गया है।

 

इस कार्य में ‘औजी‘ एक जाति विशेष के समुदाय ने ढोल विद्या को धार्मिक अनुष्ठानों, मांगलिक कार्यों, उत्सवों, मेलों, मंडाण अथवा सामाजिक व सांस्कृतिक पर्वों पर बजाकर अपना विशेष योगदान दिया है। ढोल विद्या के बाजगीयों का किसी समय एक विशेष स्थान होता था। चूंकि इस विद्या पर ये परम्परागत पांरगत थे। इनके वादन और ओजस्वी वाणी के समावेश से धार्मिक अनुष्ठानों की शोभा होती थी। जिनके आहवान से देवी-देवता प्रसन्न होकर प्रकट हो जाते थे। आज भी इनके वंशज इस विद्या की अलख परम्परागत निभाते चले जा रहे है। किन्तु उपेक्षित होकर आज हमारे समाज में अपनी मूल संस्कृति को छोड़ पाश्चात्य संस्कृति की और अग्रसर युवा एक चिन्ता का विषय है। आज आवश्यकता है इस विद्या के बाजीगरों को सम्मान देने की उन्हें प्रोत्साहन देने की जिससे आज हमारी पारम्परिक विलुप्त होती ढोल-विद्या का संरक्षण व संवर्धन हो सके।

To Top