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आखिर देवभूमि उत्तराखण्ड में इगास पर राजनीति क्यों ?

30-09-2019 19:43:37

गढ़वाल : देवभूमि उत्तराखण्ड वैसे तो धार्मिक रूप से देवताओ की भूमि मानी गयी है. जहाँ की संस्कृति और सभ्यता अपने आप में किसी की पहचान की मोहताज नही है आज उसी देवभूमि उत्तराखण्ड में इगास पर्व को लेकर आखिर राजनीति क्यों यह बड़ा सवाल अपने आप में उत्तराखण्ड की राजीनीति की चर्चाएँ तेज कर देता हैं कि उत्तराखण्ड में अब पर्व भी राजनीति का शिकार हो सकते है ? देवभूमि उत्तराखण्ड की सियासत में शह और मात का खेल देखने को मिल रहा है। यह अदृश्य रुप से चल रहा है, जिसे पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अपने-अपने नजरियें से देख रहे है। ताजा खबर यह है कि एक बार फिर से लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी का नाम लोगों की जुबां पर है। कभी अपने  गीतों से व्यवस्थाओं पर चोट करने की लोकप्रियता हासिल कर चुके गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी  , अब राजनीतिक रुप से मोहरें के रुप में प्रयोग किये जा रहे है या कोई उनका जानबूझकर प्रयोग कर रहा है यह तो अपने आप में बड़ा सवाल है ?

 

आपको बताते चले कि भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी एवं उत्तराखण्ड से राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी के ’’अपना वोट अपना गांव’’ की मुहिम के तहत 08 नवंबर 2019 को अपने गांव में इगास बग्वाल मनाने की मुहिम ने जोर पकड रखा है। इसे उत्तराखंड मूल की कई बड़ी हस्तियों का समर्थन मिला है। वहीं, नरेन्द्र सिंह नेगी के ताजा बयान को सांसद की इस मुहिम के खिलाफ जोड़कर देखा जा रहा है। नरेंद्र सिंह नेगी ने बयान जारी कर कहा कि यदि उत्तराखंड के लोगों को उत्तराखंड से प्रेम है तो उन्हें इगास बग्वाल मनाने के लिए उत्तराखंड आने की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली मनाने के लिए आना चाहिये। “मुझे पहाड़ी मत बोलो” गीत के जरिये पहाड़ों की दुर्दशा बयान करने वाले नेगी दा का यह बयान कई लोगों के दिलों में नही उतर रहा है। उत्तराखंड के लोग नेगी दा को एक कलाकार ही नही बल्कि उत्तराखंड की आवाज मानते है, लेकिन ताजा बयान के बाद लोगों की मिली जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली है। ऐसे माहौल को सरकार के प्रति नाराजगी के रुप में नही देखा जा सकता है। हां इतना जरुर है कि ऐसी मुहिम चलाकर लोकप्रियता हासिल कर चुके सांसद अनिल बलूनी का मनोबल गिराना, एक कारण हो सकता है। वैसे भी राजनीति में दोस्त ही दोस्त का दुश्मन कहा जाता है । देवभूमि उत्तराखण्ड की जो पहचान संस्कृति और सभ्यता और देवभूमि के त्यौहार हैं देवभूमि की पहचान इगास और बग्वाल दोनों से हैं इसलिये इगास या बग्वाल का विरोध करने की बजाय दोनों को उत्साह पूर्वक मनाया जाये और उत्तराखण्ड की सभ्यता और संस्कृति को बचाने व पहाड़ से पलायन रोकने में एक कदम बढ़ाना चाहिये.

 

जाने क्या है इगास

मान्यता है कि अमावस्या के दिन लक्ष्मी जागृत होती हैं, इसलिए बग्वाल को लक्ष्मी पूजन किया जाता है। जबकि, हरिबोधनी एकादशी यानी इगास पर्व पर श्रीहरि शयनावस्था से जागृत होते हैं। सो, इस दिन विष्णु की पूजा का विधान है। देखा जाए तो उत्तराखंड में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से ही दीप पर्व शुरू हो जाता है, जो कि कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी हरिबोधनी एकादशी तक चलता है। इसे ही इगास-बग्वाल कहा जाता है। इन दोनों दिनों में सुबह से लेकर दोपहर तक गोवंश की पूजा की जाती है।  इगाश के दिन पहाड़ों में भेलू भी खेला जाता है. भेलू नृत्य उत्तराखंड में पारम्परिक प्राचीन नृत्य है. आखिर किसी  ने तो अपने पुराने रीति रिवाजों की सुध ली लेकिन कुछ लोगों को तो हर काम मे राजनीति सूझती है और कोई अपनी जड़ों से जुड़ने की मुहिम चलाये तो भी  तथाकथित अरे बग्वाल भी मनाओ ओर इगाश भी लेकिन भाई साहब तो आखिर राजनीति  का शिकार हो ही गए ?