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    उत्तराखण्ड विशेष : तो शराब फैक्ट्री से होगा, राज्य का विकास ?

    06-08-2019 15:04:11

    उत्तराखण्ड (देव कृष्ण थपलियाल): राज्य सरकार नें धार्मिक दृष्टि से पवित्रतीर्थ़ नगर देवप्रयाग में शराब प्लांट निर्माण का काम शुरू कर दिया है, तथापि राज्य के कई और हिस्सों मे इस तरह की फैक्ट्री लगानें की कार्ययोजना विचाराधीन है। देवप्रयाग के बाद सतपुली मे शराब डिस्टलरी स्थापित करनें पर भी विचार चल रहा है। इससे पहले की आम जनता में इसकी कोई प्रतिक्रिया सामनें आये, सूबे के मुखिया तथा उनके कुछ मंत्री व नेंताओं नें बाकायदा इसके फायदे गिनानें शुरू कर दिये ? महिला आयोग की अध्यक्ष व पुर्व मंत्री विजया बडथ्वाल, महिला हिंसा में शराब की  प्रमुख भूमिका को स्वीकार करनें के बावजूद, भी उसे रोजगार और आर्थिक समृद्वि के लिए बहुत जरूरी मानती है, स्वयं पहाड की महिला होतें हुऐ भी वे ये भूल गईं की पहाड में नशा,शराब विरोधी ऑदोलनों में महिलाओं की भूमिका कितनीं बडी रहीं हैं ? या ये कहें की अंतिम क्षणों तक महिलाओं नें शराब बंद करानें के खातिर अपना सर्वोच्च बलिदान तक दिया, गॉव-गॉव में शराब के खिलाफ ऑदोलन चलानें के लिए बिना पुरूषों के सहयोग से कई रणनीतियों को अपनाया, शराबियों का गॉव में सार्वजनिक बहिष्कार, शारीरिक प्रताडना, जुर्माना जैसे तरीकों से वे शराब के खिलाफ लडतीं रहीं,   सडक से लेकर सत्ता प्रतिष्ठानों तक में उन्होंनें शराब के खिलाफ संधर्ष किया ? कारण शराब से ही महिलाऐं बेबस और असहाय हैं ? पहाड की कितनीं महिला-बालिकाओं की जिंदगी नरक तुल्य बन गई, कितनीं ही महिलाओं को रोज-रोज की प्रताडना झेलनी पडती, आज भी सूदूरवर्ती क्षेत्रों-गॉवों में जो सामाजिक-आर्थिक विकृतियॉ मौजूद उसके पीछे की मुख्य वजह शराब है ? सबसे दुःखद पहलु ये भी रहा की पहाड की महिलाओं की अभिव्यक्ति की पीडा को स्वर देंने वाले राज्य के सबसे लोकप्रिय जन गायक नरेन्द्र सिंह नेगी जी को भी शराब फैक्ट्री लगानें में कोई बुराई नजर नहीं आती ? वे इसे राज्य के किसानों के हित और रोजगार सृजन की दिशा में एक अनुकूल कदम मानते हैं।  भाजपा की वरिष्ठ नेत्री उमा भारती जी जिनका (आध्यात्मिक कारणों से) उत्तराखण्ड से नजदीकी का सम्बन्ध रहा है, नें भी अपनीं सरकार की ही पैराकारी ज्यादा दिखाई, उन्होंनें खुलकर कुछ बोलनें से परहेज कर दिया ? भले उन्हें भी ’बाटलिंग प्लांट’ से ज्यादा तकलीफ हो ऐसा प्रतीत नहीं हुआ ?  

    देव कृष्ण थपलियाल


     सरकार व बुद्विजीवियों के राज्य में ’शराब प्लांट’ के प्रसार को लेकर अपनें-अपनें तर्क हो सकते हैं, जो सही और गलत ठहराये जा सकते हैं ? कहा जा रहा है, की शराब प्लांट से रोजगार के निर्माण और छोटे-मझोले किसानों को सीधे लाभ मिलेगा उनके उत्पाद बिकेंगें जिससे उन्हें सीधे आर्थिक लाभ होगा ? परन्तु जब इन तर्कों की तह तक जानें की कोंशिश होगीं तो वे बेमानीं सिद्व होंगें ? सवाल ये भी है, कि पहाड में कितनें लोग खेती-किसानी से जुडे हुऐ हैं और कितनें लोग इससे मुनाफा कमा रहे हैं ? सच्चाई ये है की पहाड में वैसे ही खेती-किसानीं सिसकियॉ ले रहीं हैं, रही-सही कसर बंदर और जंगली जानवर पूरी कर जाते हैं, इन जंगली जानवरों के भय से जो इलाके पारम्परिक फसलों, फलों और सब्जियों के लिए विख्यात थे, आज विरान पडे हुऐ हैं। सरकार इस पर तो कोई विचार करती नहीं ? फिर किन किसानों को फायदा पहुॅचनें की बात हो रही  है ?

     


    कहीं ऐसा तो नहीं की ’’उडता पंजाब’’ की तर्ज पर ’’उडता उत्तराखण्ड’’ बनानें की तैयारी हो रही हो ? जब कोई भी नई योजना पहाड में लॉच की जाती है, तो सरकार उसके बडे-बडे सब्जाग दिखानें शुरू कर देती है, जबकी उसका असली उद्देश्य किसी खास कम्पनी अथवा पूंजीपति घरानें को लाभ पहुँचाने मात्र  होता है।  राजनीतिक शह पर कई पूॅजीपतियों नें पहाड में कई ऐसे बडे स्कूल-कालेज खोले, नदियों पर बडी-बडी भीमकाय जल विद्युत परियोंजनाऐं बनाई गईं, जिससे मध्य हिमालय की संवेदनशील ही हिलनें लगी हैं तब यही कहा गया की इनसे स्थानीय और प्रदेश के लोंगों के भाग्य के पीटारे खुल जायेंगे  ? गरीब लोंगों से स्कूल के नाम पर  खरीदी गई जमीन पर महलनुमा इन संस्थानों से क्षेत्र व प्रदेश के लोंगों को कितना लाभ मिला ? पहले इसकी समीक्षा होंनी चाहिए ? जबाब मिलेगा ’’कोई लाभ नही’’ देश-प्रदेश के विभिन्न जगहों से आये इन धनाड्यों के बच्चों को यहॉ पढाई-लिखाई की बढिया सुविधाएँ  तो मुहैय्या हो गई, परन्तु जिन अभागे गरीबों की अचल संपदा (जमीन) औंने-पौंनें दामों पर हाथ से निकल गईं, वो अब ठगे से रह गये ? ताजातरीन घटनाक्रम में भी यही बात उभर कर आ रही है, सरकार और बुद्विजीवियों को शराब प्लांट लगानें और उसमें फायदे ही फायदे क्यों नजर आ रहे हैं ? कहीं नई दिल्ली स्थिति फर्म जिसका नाम ’विंदेश्वरी एक्जिम प्राइवेट लि0’ के संचालकों का दबाव उन्हें ये सब करानें को मजबूर कर रहा है ? पिछले 27 जून से फैक्ट्री निर्माण की कवायद से फिलहाल उन ग्रामीणों को आपदा संकट परेशान कर रहा है, फैक्ट्री निर्माण के मलबे से उन गॉवों का नक्शा ही बदल गया पारम्परिक रास्ते इतनें क्षतिग्रस्त हो गये हैं, की लोगो को चलनें में कइनाईयॉ महसूस हो रही है।  डडुवा गॉव के ऊपर बॉटलिंग प्लांट के निर्माण से निकला मलबा डडुवा के लिए खतरा बना हुआ है। नियमों को ताक पर रखकर प्लांट  के निर्माण से निकला मलबा प्लांट के पास ही डंप कर दिया गया । मलबे से ग्राम खोला, पाली सिमली, छाम सहित कई अन्य गॉवों को जोडनें वाला पैदल मार्ग पूरी तरह दब गया है। डडुवा और भंडाली गॉव के लोगों के जंगल व खेतों में जानें के रास्ते भी बूरी तरह मलबे से दब गये हैं।


    सरकार और राज्य के मुख्यमंत्री शराब उत्पादन के दूरगामी परिणामों से अनजान हों, ऐसा संभव नही है ? मुख्यमंत्री कई मंचों पर शराब और मादक द्रब्यों की खुलकर मुखालफत कर चुके हैं । पिछले दिनों चंडीगढ में आयोजित चार-पॉच राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ उन्होंनें इसके रोकथाम के लिए जोरदार पहल की बात कहीं,  चंडीगढ में आयोजित इस क्षेत्रीय सम्मेलन में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत  हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर नें प्रतिभाग किया सम्मेलन में ड्रग्स की समस्या और उसके निपटनें पर व्यापक विचार विमर्श किया । मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत नें कहा - नशा समाज में विकृति के रूप में उभर रही है। जो समाज के लिए बडा अभिषाप है। हमारी भावी युवा पीढी देश का भविष्य है इसलिए इस विकृति व अभिषाप को जड से उखाड फेंकनें के लिए सभी राज्यों को आपसी समन्वय से एवं सहयोग से कार्य करनें की आवश्यकता है। इस ससम्मेलन  में स्कूल-कालेजों में एंटी ड्रग कमेटी के गठन  की बातों को स्वीकार कर लिया गया ।  लेकिन अपनें राज्य में ’शराब प्लांट’ विकसित करनें के पीछे के दबाव को वे कैसे स्वीकार कर रहें हैं ? जबकि वे अच्छी भली-भॉति जानते हैं, की इस तरह के कामों से देवभूमि की पवित्र छवि को कितना धक्का पहुंचेगा ?


    उत्तराखण्ड राज्य देवभूमि के नाम से विख्यात है, बद्रीनाथ, केदारनाथ गंगोत्री व यमुनोत्री जैसे कई तीर्थस्थल राज्य के विभिन्न जगहों पर स्थित है, जिनका अपना ठोस महत्व है, तथा साल भर में देश-विदेश के लाखों  लोंग यहॉ तीर्थाटन-पर्यटन के लिए पहुँचते  हैं। ये यात्रीगण केवल आस्था-विश्वास के कारण यहॉ आते हैं, जिससे राज्य की आर्थिकी में भी खासी वृद्वि होती है, यहॉ के लोंगों को भी उनके  विभिन्न व्यवसायों के जरिये रोजगार के अवसर मिलते है। इसलिए जाहिर सी बात है, की देवप्रयाग जैसे स्थानों पर शराब जैसी नशे उत्पादन के प्लांट विकसित किये जायेंगें तो आम लोगों की आस्था कव क्या होगा ? एक तरफ भारतीय जनता पार्टी हिन्दुत्व दर्शन की बडी पैरोकार होंनें की दावेदारी करती है, वहीं देवभूमि में घर-घर में शराब बेचकर क्या संदेश देंना चाहती है ? वैसे भी यदा-कदा  राज्य के भीतर नशे के कारोबार की खबरों का बाजार गर्म रहता है। ये नशे का सामान कहॉ से आ रहा है, इसे कोंन सेवन कर रहा है, इसे जानकर हैरत होती है, कि कहीं उत्तराखण्ड की युवा पीढी भी नशे के गिरफ्त में तो नहीं आ रही है ? हॉ ये सूंचनाऐं भी हैं, जिनसे आप विचलित भी हो सकते हैं ?

     

     
      सूदूर पहाडों में चरस और शराब बडे पैमानें पर खप रही है। चार जिलों में चरस के साथ अफीम, स्मैक गोलियॉ और इंजेक्शन का अवैध कारोबार तेजी से बढ रहा है। ये जिले है देहरादून, उधमसिंह नगर, हरिद्वार और नैंनीताल उत्तर प्रदेश, हिमाचल की सीमाओं से उत्तराखंण्ड से जुडी हैं,  जहॉ से आसानीं से नशे की खेप पहुंचाई जाती हैं। यूपी के सहारनपूर और बरेली में सिंथेटिक ड्रग स्टोर कर नेटवर्क सक्रिय है। इसका खुलासा पुलिस टींमों द्वारा एनडीपीएस एक्ट के तहत पकडे गये आरोपियों नें किया । एसटीएफ नें हरिद्वार से से एक महिला को सर्वाधिक चरस के साथ गिरफ्तार किया गया महिला सहारनपूर के मिर्जापूर की रहनें वाली थी । इस  साल कुमॉऊ में अब तक 50 से अधिक मामले स्मैक तस्करों के दर्ज हो चुके हैं। हल्द्वानीं में स्मैक तस्करों के का गढ बने वनभूलपूरा क्षेत्र में इस साल अब तक 16 मुकदमें दर्ज हो चुके हैं । उत्तराखंड में ड्रग उन्मुलन नियमावली बनाई जा रही है। इसके अलावा पुर्नवास केंद्र बनाये जा रहे हैं अभी तक एनडीपीएस एक्ट के तहत केद्र की नियमावली तहत ही कार्रवाही की जाती थी ।  पंजाब की तर्ज पर उत्तराखण्ड में भी ड्रग उन्मूलन नियमावली अस्तित्व में आयेगी । नियमावली के तहत प्रावधान रखा गया है कि युवाओं को कम उम्र से ही नशे के दुष्प्रभाव के बारे में बताना होगा इसके लिए स्कूल पहुँच बच्चों को जागरूक किया जायेगा ।  


    सरकार को इन तथ्यों की पडताल करते हुऐं, इनका संज्ञान लेंना चाहिए और इसके उन्मुलन के लिए ठोस रणनीति अपनानीं चाहिए, न की नशे के कारोबार के पक्ष में काम करना चाहिए ? कुछ लोगों की ओर से ’बॉटलिंग प्लांट’ की जगह ’कच्ची शराब’ बनानें जैसी पारम्परिेक नीति अपनायें जानें की मॉग की जा रही है, इसके पीछे का सच भी स्थानीय उत्पादों मंडूवा, और झंगोरा की खेती को प्रोत्साहित करनें व किसानों को रोजगार मुहैय्या होंनें की बात की जा रही है, परन्तु इस तर्क में भी कोई सच्चाई नजर नहीं आती है ? शराब और नशे के प्रोत्साहन से सरकार को बचना चाहिए, वरना इसके दूरगामी परिणाम होंगें ? अगर सरकार को रोजगार और स्थानीय उत्पादों को पुर्नजीवित करनें की इतनी ललक है, तो सबसे पहले व जंगलीं जानवरों व बंदरों के उन्मुलन के लिए ठोस रणनीति अपनानीं चाहिए, पहाड में पर्यटन, अथाह प्राकृतिक संपदा व तीर्थाटन के लिए  केवल माहोल बनाये जाये बस ? न की शराब प्लांट लगाया जाय !