विशेष लोकसभा चुनाव : राज्य के मुद्दे, फिर हासिये पर

Publish 29-03-2019 12:35:58


विशेष लोकसभा चुनाव :  राज्य के मुद्दे, फिर हासिये पर

पैठाणी/गढ़वाल (देव कृष्ण थपलियाल): बहुप्रतिक्षित लोक सभा चुनाव 2019 का बिगुल बज चुका हैं, देश की सत्रहवीं लोक सभा  के गठन लिए प्रदेश में आगामी 11 तारीख अप्रैल को  प्रथम चरण में ही मतदान सम्पन्न होगा, इसके लिए सरकारी मशीनरी की तैयारियॉ भी अंतिम चरण में हैं, वही आम मतदाताओं में भी खुब उत्साह देखा जा रहा है, अब ये नतीजे ही बतायेंगें की जनता नें किस पार्टी/प्रत्याशी पर भरोसा जताया है ? यों तो राज्य की राजनीति में कुछ क्षेत्रीय दलों, उत्तराखण्ड क्रॉन्ति दल, उत्तराखण्ड प्रगतिशील पार्टी के साथ समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, माकपा, भाकपा, सीपीआई, व आम आदमी पार्टी जैसी राष्ट्रीय स्तर की पार्टियॉ भी हैं, किन्तु अपनी नगण्य उपस्थिति के चलते अस्तित्वविहीन जैसी स्थिति में हैं। राज्य के मैदानी हिस्सों हरिद्वार, उधमसिंहनगर, व हल्द्वानीं जैसे शहरों में सपा, बसपा अपनीं उपस्थिति जरूर दर्शाती रही हैं, किन्तु उत्तर प्रदेश में बतौर गठबंधन साथ आई इन दोंनों सियासी पार्टियों नें राज्य की राजनीति में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई ? अतः ऐसी स्थिति मे इस कैडर के मतदाताओं का बिखराव होना निश्चित है।

देव कृष्ण थपलियाल
देव कृष्ण थपलियाल


राज्य की राजनीति के असली किरदार में दो ही सियासी दल कॉग्रेस और भाजपा हैं, इन्हीं दोंनों सियासी दलों के बीच मुख्य मुकाबला भी हैं। भाजपा पर जहॉ 2014 की विजयगाथा को दोहरानें का दबाव है, वहीं कॉग्रेस अपनें वजूद के लिए ही जद्दोजहद में है, राष्ट्रीय नेतृत्व की अक्षमता, दिशाहीनता के साथ-साथ विगत दो सालों से राज्य की सत्ता से बाहर होंनें के बाद कॉग्रेस स्वयं से जुझ रही है, उसे पार्टी/संगठन पर आम लोंगों का भरोसा बनाये रखनें की बडी चुनौती है ? संगठन के अंदर जितनें नेता हैं, उतनें ही खेंमेंबाजी और धडे भी हैं, गुटों में बॅटी, पार्टी के लिए अपनों से जुझना बडी समस्या है । जिससे अंतिम पायदान पर खडे कार्यकर्ता का मनोबल लगातार गिरा है, कई बार तो ऐसा आभास होता है, की प्रदेश में कॉग्रेस संगठन नाम की कोई चीज ही नहीं हैं, हालॉकि प्रदेश में कॉग्रेस पार्टी के पास कद्दावर नेता है, जिनका उपयोग पार्टी और राज्य हित में किया जा सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत नैंनीताल सीट व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह टिहरी लोक सभा सीट से मैंदान में हैं, पौडी संसदीय सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के बडे चेहरा मेजर जन0 (से0नि0) भुवन चन्द्र खण्डूडी के पूत्र मनीष खण्डूडी को कॉग्रेस खास रणनीति के तहत अपनें टिकट पर लडा रही है। अल्मोडा-पिथौरागढ (सुरक्षित) सीट पर कॉग्रेस के राज्य सभा सांसद और साफ चेहरा प्रदीप टमटा को भाजपा के युवा सांसद व केन्द्रीय मंत्री अजय टमटा के खिलाफ मैंदान में उतारा हैं, हरिद्वार सीट पर भाजपा के पूर्व सी0एम0 व तेजतर्रार नेता डॉ0 रमेश पोखरियाल ’निशंक‘ के खिलाफ कॉग्रेस नें अंबरीश कुमार को मैंदान में है।


कॉग्रेस के इन लडाकों से तो प्रतीत होता है, की कॉग्रेस अपनें संगठन व विचारधारा के प्रति थोडा सजग हुई है, व पूरी गंभीरता के साथ चुनावी मैंदान में हैं। गढवाल संसदीय सीट पर भाजपा के बडे चेहरे रहे, जन0 बी0सी0 खण्डूडी के बेटे मनीष खण्डूडी भले कोई बडे सीरियस सियासतदां न हों पर उनके पिता की साफ व ईमानदार छवि का लाभ बेटे को अवश्य मिल सकता है, भले भाजपा के प्रत्याशी तीरथ सिंह रावत भी अपनें को उनका (जन0 खण्डूडी का) शिष्य व राजनीतिक उत्तराधिकारी  बताते हैं, लेकिन कोई भी पिता अपनें बेटे को आगे बढते देखना ही पंसद करेगा, इस लिहाज से भाजपा नेता पिता का आर्शीवाद स्वाभाविक तौर से अपनें कॉग्रेसी (उम्मीदवार) बेटे के साथ होगा, इस बात को गढवाल की जनता भी अच्छी तरह से जानती-समझती है, अपनें चुनावी भाषणों, व जन संपर्कों के माध्यम से मनीष भी जनता के बीच भाजपा के कद्दावर सांसद पिता का पूत्र होंनें का ऐहसास खुब कराते हैं। भाजपा सांसद रहते उनके पिता को रक्षा सबंधी संसदीय समिति से हटा देंनें व सेना में हथियारों व सैनिक की सुविधाओं की कमीं के बाबत रिर्पोट प्रस्तुत करनें के एवज मे  उनके पद से हटाये जानें से उत्पन्न सहनुभूति से न केवल भाजपा के इस कद्दावर नेता के समर्थकों को अपनें पक्ष में करनें का प्रयास होगा, अपितु भाजपा के पराम्परागत ब्राहमण वोंटों पर भी सेंधमारी करनें की जा सकती हैं। जिसका फायदा निश्चत रूप से कॉग्रेस पार्टी को होगा। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट नैंनीताल सीट से पहली बार सांसदी का चुनाव लड रहे हैं, उनके सामनें कॉग्रेसी दिग्गज हरीश रावत का अनुभव निश्चित ही उन पर भारी पडता दिख रहा है, पार्टी की वरिष्ठ सदस्य व नेता प्रतिपक्ष इन्दिरा हृदयेश से मनमुटाव उनको भारी पड सकता है, भले उनके भारी विरोध के वावजूद भी वे नैनीताल सीट से टिकट पानें में कामयाब हो गये, अब देखनें की बात ये होगी की  श्रीमती इन्दिरा हृदयेश से उनका मतभेद चुनाव को कितना प्रभावित करेगा ये उनके चुनाव प्रबंधन कौशल पर निर्भर करेगा। अल्मोडा (सुरक्षित सीट) पर भाजपा के युवा सांसद और मंत्री अजय टम्टा भले अपनीं सरल व स्वच्छ छवि के लिए जानें जाते हैं, परन्तु  मंत्री व सासंद रहते वे ’कुछ’ विशेष न कर पानें का आरोप है, ये बात उनके  संसदीय क्षेत्र व प्रदेश दोंनों पर भी लागू होती है, इस सीट पर कॉग्रेस के उम्मीदवार प्रदीप टम्टा का कद उनसे काफी बडा है। अल्मोडा सीट पर भी दोंनों पार्टियों में कॉटे की टक्कर है।  


 टिहरी सीट पर लम्बे समय से टिहरी राजघरानें का वर्चस्व रहा है, भारतीय जनता पार्टी नें यहॉ वर्तमान सांसद श्रीमती राज्य लक्ष्मी शाह को हीे रिपीट किया है, शायद ’राजघरानें के स्टेट्स’ व ’जीत’ की गाराण्टी के कारण ही पार्टी नें उन्हें पुनः मैदान में उतारा है। वहॉ कॉग्रेस से स्वयं प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह मैदान में हैं, उनकी साफ छवि भाजपा के रास्ते में ’रोडे’ अटका सकती है। लम्बे समय से प्रदेश की राजनीति में रहनें और बेदाग और बेबाक छवि के प्रीतम सिंह पर मंत्री रहते भी कोई ऐसा अरोप नहीं है, जिससे उन्हें चुनावों में दिक्कत आये। हरिद्वार में अंबरीश कुमार (कॉग्रेस) भले प्रदेश के बडे कद्दावर नेताओं में न हों परन्तु क्षेत्र में उनका ठीक-ठाक जनाधार है, उनका सीधा मुकाबला प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान सांसद डॉ. रमेश पोखरियाल ’निशंक’ से है। 2014 की मोदी लहर में कॉग्रेस हरीश रावत की पत्नी से को हराकर वे नई दिल्ली स्थित संसद में पहॅुचे थे, इस बार स्थानीय बनाम बाहरी की ‘हवा‘ से जुझना पड रहा है,  हालॉकि वाक्पटू निशंक इस हवा को बेदम बताते है, इसे विपक्षियों की साजिश मात्र बताते नकार देते हैं।  फिर हाथी ’चिंघाड’ भी रास्ते में हैं, बसपा से डॉ0 अंतरिक्ष सैंनी को टिकट दिया गया है, जिनका सामाजिक क्षेत्र में अपना योगदान है।


 भारी बहूमत से प्रदेश और देश में सत्तारूढ हुई भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की दिक्कत ये हैं की वे 2019 का चुनाव भी मोदी की लहरों में सवार होकर पार करना चाह रहे है। यह भाजपा का अति आत्मविश्वास है, वह ’एंटी इन्कमबैंसी’ को नजरअंदाज कर रही है। राज्य में त्रिवेद्र सरकार का दो साल कार्यकाल बहुत उम्मीदों भरा नहीं है, जिस तरह का जनादेश पार्टी को केद्र और राज्य में मिला था ? प्रदेश में भले कोई बडा ’घपला’ अभी सामनें न आया हो, पर ’विकास’ के नाम भाजपा सरकार नें ’ऑन ग्राउण्ड’ कोई काम नहीं किया, विपक्ष का आरोप है की ’डबल इंजन’ की इस सरकार नें किसानों का कर्जा 15 दिन में माफ करनें का वादा किया था, जबकी अभी 2 साल बाद भी इस पर कोई पहल नहीं हुई गन्ना किसानों का भुगतान भी नहीं हुआ, इस शान्त प्रदेश के 18 साल के इतिहास में 13 किसानों नें आत्म हत्या जैसा कदम उठाया  कर दी, एनएच-47 के मामले को सीबीआई जॉच की घोषणा भी ठंडे बस्ते में है। ’बेटी पढाओं-बेटी बचाओं’ का नारा देंनें वाली सरकार के संगठन मंत्री पर यौंन उत्पीडन के गंभीर आरोप हैं। उसी तरह स्वास्थ्य, शिक्षा, सडक और रोजगार को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है।


प्रदेश का 84.37 प्रतिशत भूभाग पहाडी है, यहॉ रोजगार और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में लोगों का पलायन बडी तेजी हो रहा है, जिससे मैदानी क्षेत्रो में असन्तुलन की स्थिति है, पहाड में गरीबी का आलम ये है की 64 प्रतिशत परिवारों का गुजारा महज रू0 5,000 महिनें में हो रहा हैं। राज्य सरकार इस समस्या के लिए ’ग्राम्य विकास और पलायन आयोग’ कर चुकी है, जिसकी रिर्पोट बताती है, की पिछले 10 सालों में 3,946 ग्राम पंचायतों से 1,18,981 लोग स्थाई व 3,83,726 अस्थाई रूप से अपनें गॉव देहातों को छोड चुके हैं। गॉवों में बचे-खुचे लोगों के लिए खेती-बाडी करना मुमकिन नहीं है कारण राज्य में बंदरों का आतंक इस भयावह स्थिति में पहुँच गया है, की अकेले चलना भी मुश्किल है, जहॉ इन बन्दरों से जानमाल का खतरा है वहीं खेती-कृषि की बात करना तो सिवाय बेमानी के कुछ नहीं होगा ? इस समस्या से राज्य सरकार के आला अधिकारी से लेकर जनप्रतिधियों तक खुब  वाकिफ हैं, पर किया कुछ नहीं गया ?


त्रिवेद्र रावत सरकार जिस इन्वेस्टर्स समिट के सफल आयोजन के बाद सवा लाख करोड के एमओयू पर साइन के मार्फत राज्य में बडे निवेश व बंपर रोजगार के अवसरों की बात कर रही है, वह धरातल पर फिलहाल कहीं नहीं है, इस चुनाव में तो, उसका फायदा नहीं ही मिलेगा ? कहा तो ये भी जा रहा है की रू0 13,000 करोड रूपयों के प्रोजेक्ट पर काम शुरू भी हो चुका है, परन्तु उसके लाभार्थी भी ढुढे नहीं मिल रहे हैं ? केन्द्र सरकार के सहयोग से सहकारिता विकास के लिए 3340 करोड रूपये की राज्य समेकित सहकारिता परियोजना शुरू की गई है, जिससे 55,000 लोगों सीधे लाभ की बात भी जा रही है। परन्तु वह भी हवाई साबित हो रही है। केन्द्र सरकार द्वारा चलाई जा रही कुछ योजनाओं के बूते भाजपा अपनीं वैतरणी पार कर पायेगी, कहना मुश्किल है ?
लोकतंत्र के इस महापर्व पर ये कहना मुश्किल है, की राज्य जनता किस प्रत्याशी अथवा दल के सिर सेहरा सजाती है ?   

    

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