*** लाइव एसकेजी न्यूज़ पर आप अपने लेख, कविताएँ भेज सकते है सम्पर्क करें 9410553400 हमारी ईमेल है liveskgnews@gmail.com *** *** सेमन्या कण्वघाटी समाचार पत्र, www.liveskgnews.com वेब न्यूज़ पोर्टल व liveskgnews मोबाइल एप्प को उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश राजस्थान, दिल्ली सहित पुरे भारत में जिला प्रतिनिधियों, ब्यूरो चीफ व विज्ञापन प्रतिनिधियों की आवश्यकता है. सम्पर्क 9410553400 *** *** सभी प्रकाशित समाचारों एवं लेखो के लिए सम्पादक की सहमती जरुरी नही है, किसी भी वाद विवाद की स्थिति में न्याय क्षेत्र हरिद्वार न्यायालय में ही मान्य होगा . *** *** लाइव एसकेजी न्यूज़ के मोबाइल एप्प को डाउनलोड करने के लिए गूगल प्ले स्टोर से सर्च करे liveskgnews ***

इन्वेस्टर्स समिट:परिणामों का करना होगा इंतजार

04-11-2018 15:48:37

पैठाणी (देव कृष्ण थपलियाल)। विगत माह अक्टूबर की 6-7 तारीख को राज्य में औद्योगिक विकास, आर्थिक समृद्वि व युवाओं को रोजगार सृजन के लिए राज्य सरकार की मेजबानी में एक ‘बृहत्तर इन्वेस्टर्स समिट‘ का आयोजन राजधानी देहरादून में सम्पन्न हुआ। राज्य निर्माण के बाद पहली बार आयोजित हुए, इस तरह के समिट में देश-विदेश के कई ख्यातिनामा उद्योगपतियो नें शिरकत की, और कई औद्यौगिक घरानों नें राज्य में अपनें कारोबार को विस्तार देनें के लिए अनेक बडे एम0ओ0यू0 पर दस्तखत किए, जो आगे चलकर राज्य के विकास में ’मील का पत्थर’ साबित होंगें। हालॉकि इनके परिणामों की तत्काल उम्मीद करना, बेमानीं होगा, क्योंकि स्वाभाविक रूप से यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। परन्तु अगर दृढ राजनीतिक इच्छा और साफ नीयत से यह ’समझौते’ सम्पन्न हुऐ है, तो आगे चलकर ये राज्य के विकास के लिए अग्रणीं भूमिका निभायेंगें, इसमें कोई संदेह नही है ? इसके लिए राज्य सरकार नें खास मल्टीनेशनल कम्पनी ’अनस्टेंन यंग’ को कंसल्टेंट बनाया था, जिसे देश-विदेश में उद्योग स्थापित करनें का अच्छा-खासा अनुभव है।
 इस आयोजन को मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत स्वयं पसीना बहानें में आगे रहे, देशभर के औद्यौगिक घरानों से लेकर विदेशों तक का सफर तय किया। यह आयोजन उनका और उनकी टीम का अभिनव प्रयोग माना जायेगा । स्वयं उन्हीं के शब्दों में ’अगर ’नीयत’ साफ हो तो हर काम संभव है’। फिलहाल वे उद्यमियों का विश्वास जितनें में कामयाब रहे, राज्य में उनके (इन्वेस्टर्स) हर तरह के ’इन्वेस्टमेंट’ के लिए हर सम्भव मदद दी जायेगी, उन्हें किसी तरह की सरकारी लेटलतीफे से मुक्त रखा जायेगा ? इस गरज से स्वयं मुख्यमंत्री के दफ्तर में एक ‘स्पेशल सैल’ का गठन कर उद्यमियों को स्पष्ट रूप से यह सन्देश देंनें की कोशिश की है, वे (उद्यमी) उनके लिए कितनें महत्वपूर्ण हैं ? इसका नतीजा भी समिट के दौरान हुऐ एम0ओ0यू0 की कुल राशि रू0 1,24,366 (एक लाख चौबीस हजार तीन सौ छासठ रूपये) से भी परिलक्षित हो जाती है।  इतनी बडी राशि के एम0ओ0यू का होंना, किसी भी सरकार की बडी उपलब्ष्धि है, स्वयं सरकार भी इसे अपना एक बडा एचिवमैंट, मानकर ढोल पीट रही है, तो बेशक पीटे, इसमें कुछ गलत नहीं है ?  इससे पहले राज्य में महज 50,000 करोड रूपयों का निवेश हुआ था। ये इन्वेस्टमेंट भी राज्य के मैदानीं चुनिंदा भागों देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंहनगर और हल्द्वानी, लालकुऑ जैसे शहर-कस्बों तक ही सिमट कर रह गये थे।
    लेकिन थोडा अतीत को भी खंगालें, तो हमारी खुशी बेचेंनी और आशंका से घिर जाती है, कारण इसके पहले भी विभिन्न सरकारों द्वारा उनके कार्यकाल में राज्य की आर्थिकी को मजबूत करनें की गरज से अनेक योजनाओं का सूत्रपात हुआ, कुछ छोटे-बडे इन्वेस्टमेंट भी हुए, कईयों का क्रियान्वयन भी हुआ, नीतियॉ भी ठीक-ठाक थीं परन्तु वे धरातल पर उतर नहीं पाई ? आखिर उनकी विफलता का सबसे बडा कारण क्या था ? अगर इस तथ्य की अनदेखी कर ली गई  तो इन ’इन्वेस्टर्स’ के ’इन्वेस्टमेंट’ के द्वारा दिखाये जा रहे बडे-बडे सपनों से कहीं इतनी बडी खुशी गम में न तब्दील हो जाये ? जनता के चेहरे की मायुसी अभी साफ नहीं हुई ? सबसे बडा सवाल भी यही है ? राज्य मशीनरी कहीं जानें वाली ’नौकरशाही‘ भ्रष्टाचार के आग में झूलस रही है ?  वह हर नीति-नियम व योजनाओं और परियोजनाओं पर पलीता लगानें के लिए खडी है ? आखिर जब तक उसका समुचित उपाय नहीं हो जाता, तब तक कोई देवदूत भी राज्य का भला नहीं कर सकते ?
 ’होम स्टे’ योजना’ आम गरीब की पहुंच के करीब व थोडा ’इन्वेस्ट’ कर लेंनें पर भी ठीक-ठाक व्यवसाय खडा करनें की महत्वाकॉक्षी योजना थीं परन्तु यह योजना भी नौकरशाही की लालफीताशाही की भेंट चढ गई, उत्तरकाशी जिले में ‘होम स्टे‘ योजना के तहत 200 के सापेक्ष 35 लोंगों का ही रजिस्ट्रेशन हो पाया, जबकि उत्तरकाशी के सीमान्त इलाके मिश्रित संस्कृति और सुन्दर भौगोलिक बनावट के तानेंबाने से निर्मित हैं।   नौजवान कहते हैं की सरकार की तरफ से कई योजनाऐं ’स्वरोजगार’ के लिए आकर्षित तो करती हैं, जिससे कईयों नें अपनीं मातृभूमि पहाड (गॉवों) की तरफ रूख भी किया, परन्तु सरकारी अफसरों की टालमटोल, सहयोग न करनें की प्रवृत्ति के कारण वे ठगे-हारे और निराश हो कर लौट गये ? इस समिट में इन्वेस्टर्स को बडे-बडे सपनें दिखाये गये हैं, परन्तु सरकारी अफसरों की उदासीनता उन्हें कितना प्रभावित कर पायेगी ? यह तो समय ही बतायेगा ? यद्यपि मुख्यमन्त्री नें उद्यमियों की तमाम आशंकाओं को निर्मूल साबित करनें की कोशिशों लगे हैं ?     
देश के प्रधानमन्त्रीं श्री नरेन्द्र मोदी व उनके वरिष्ठ सहयोगियों की उपस्थिति इस ’समिट’ को और भी गंभीर बना देती है। प्रधानमंत्री का सुझाव भी अविस्मरणीय है, बिना प्राकृतिक संपदा को नुकसान पहुॅचाऐ इसे ’आध्यात्मिक स्टेट’ बनाये जानें जैसा कुछ सुझाव देकर उन्होंनें इसकी मूल पहचान को बरकरार रखनें को तरजीह दी है। उत्तराखण्ड का अधिकॉश हिस्सा पहाडी और कठीन भौगोलिक परिस्थितियों में स्थित है, संवेदनशील मध्य हिमालयी क्षेत्र में बसे होंनें के कारण प्राकृतिक आपदाओं का खतरा सदैव बना रहता है, इसीलिए बडे उद्योगों को स्थापित करनें की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पहाड की पारिस्थितिकी स्थिति ऐसीं है की घोडे-खच्चरा, भारी-भरकम जीव-जन्तुओं के पैरों से भी यहॉ की प्रकृति को नुकसान हो सकता है, अतः भारी-भरकम, मशीनों, औजारों के प्रयोग से तो और भी नुकसान हो सकता है। यहॉ क्योंकि बहुत संभव है की राज्य में उद्योंग-धन्घों को विकसित करनें की आड में इस धरा की आकूत प्राकृतिक संपदा को भी निवाला बनाया जाय ? इतिहास गवाह है, सत्ताधीशों और ठेकेदारो के गठजोडों नें कई बार ऐसा किया ? जिसे यहॉ की मातृ शक्ति नें सफल नहीं होंने दिया, उन्हें सडकों पर आनें को मजबूर होंना पडा ? वन संपदा को बचानें के लिए इस क्षेत्र को लोंगों की अद्वितीय बलिदान गाथा है, आज भी राज्य के भीतर कई प्रकृति-पर्यावरण को बचानें के लिए जारी है, (उसकी चर्चा फिर कभी)। सबसे बडी बात ये है की यह की समिट से  उद्योगपतियों को इस पहाडी राज्य की भौगोलिक बुनावट, सामाजिक-सॉस्कृतिक संरचना व सबसे जरूरी ’राजनीतिक संस्कृति’ को जाननें-समझनें का अच्छा अवसर प्राप्त हुआ, भविष्य में वे जो भी इन्वेस्ट करेंगें, इन तथ्यों को दृष्टगत रखते हुए करेंगें ?
किसी भी क्षेत्र का अर्थशास्त्र उसके समाजशास्त्र और सांस्कृतिक  गतिविधयों से जुदा नहीं होता, अर्थात इस पहाडी राज्य की सामाजिक, सॉस्कृतिक, रीति-रिवाज व परम्पराओं को जानें बिना उद्योगों को स्थापित करना समझदारी नहीं होगी ? ऐसे इन्वेस्टमेंट दीर्घकालिक होगे ? कहना संदेहपूर्ण है ? राज्य के कूल क्षेत्रफल के 67 प्रतिशत भाग पर वन संपदा खडी है, जो यहॉ के पूर्वजों द्वारा संरक्षित रही है। यहॉ प्रकृति और मनुष्य के बीच का बेहद करीबी अन्योन्याश्रितता का संबंध रहा है। अक्टूबर माह के मध्य में राज्य में आई 15 वें वित आयोग के सामनें राज्य की वन संपदा का ब्यौरा पेश करते हुए कहा गया था कि राज्य में कुल 14 लाख 13 हजार 676 करोड के बराबर वन संपदा है, जिसकी ’फ्लो वैल्यू’ 95 हजार 113 करोड है, अतः केन्द्र सरकार से मॉग की गई की इस वन संपदा में से 15 वें वित आयोग 6 हजार 832 करोड ग्रीन बोनस के रूप में राज्य को दिया जाय।  आज तक इस क्षेत्र में जो भी विकास कार्य हुए, उनमें प्राकृतिक संपदा के संरक्षण का खयाल सबसे पहले रखा गया था जिसकी बदौलत आज ग्रीन बोनस की मॉग  हो रही हैं।
चमोली जिला प्रशासन की अभिनव सोच का परिणाम है, कि अब सरस्वती नदी के पानी को प्रसाद के रूप में वितरित किया जा सकेगा ? जिससे क्षेत्र के लोंगों को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगें अपितु राज्य की आर्थिकी को बढानें में भी मदद मिलेगी, वहीं श्रृद्वालुओं को इस विलुप्त नदी के जल प्राप्ति से आध्यात्मिक शान्ति का अनुभव भी होगा। आज भी आध्यात्मवेता, दार्शनिक, भूगर्भ शास्त्री, इतिहासकार और भूगोलवेता इस बात से सहमत हैं की देश में गंगा, यमुना और सरस्वती बडी पवित्र नदियों में से हैं, इनमें से सरस्वती नदी हजारों वर्ष पूर्व विलुप्त हो चुकीं है। मगर स्थानीय मान्यताओं अनुसार अभी भी बदरीनाथ के माणा गॉव के निकट सरस्वती नदी बहती है, जो बडी पवित्र है। वहॉ की होनहार  जिलाधिकारी स्वाती एस भदौरिया के निजी प्रयासों से इस नदी के जल को प्रयोगशाला में परीक्षण कराया और इसकी शुद्वता से सिद्व होंनें पर ही इसे प्रसाद रूप वितरण करनें का फैसला लिया गया । अब आगामी यात्राकाल में तीर्थयात्रियों को स्थानीय जडी-बूटियों की धूप, अखरोट, चौलाई के लड्डू के साथ सरस्वती व कैलाश मानसरोवर का जल भी होगा। इसी तरह राज्य में अनेक विलक्षण स्थान, मंन्दिर, आकृति, प्रतीक, चिन्ह, मान्यताऐं, परम्पराऐं, रीतियॉ व स्मारक हैं, जिनका सम्बन्ध सीधे वैदिककाल अथवा हिन्दूधर्म ग्रन्थों में वर्णित अंशों से साफ-साफ मेल खाता है, अथवा सीधे जुडता है, इसीलिए  आम हिन्दु जन मानस में उत्तराखण्ड के प्रति विशेष लगाव भी है, वे इसे देवभूमि के नाम से बडी श्रृद्वा से स्मरण भी करते हैं। यहॉ आज भी वैसा ही नैसर्गिक ऑनंद व आध्यात्मिक शान्ति का अनुभव प्राप्त होता है। इसीलिए जरूरी है की उन स्थानों को पहचान कर संवारा जाय जिससे लोगों को रोजगार के साथ-साथ  तीर्थ यात्रियों/पर्यटकों के लिए अच्छी सुविधा भी जुट पाये ? अभी राज्य के 625 मंदिरों में स्थानीय उत्पादों से निर्मित प्रसाद स्थानीय लोंगों द्वारा तैयार किया जाता है, लेकिन उसकी उचित पैकेजिंग और मार्केटिंग के अभाव में लोंगों को उसका उतना फायदा नहीं मिल पा रहा है, जितना मिलना चाहिए था। इसीलिए ऐसे लघु उद्योग विकसित किये जानें की जरूरत है, जो इस प्रकार के प्रोफेशनल्स को तैयार करे, स्थानीय लोगों को उचित दिशा-प्रशिक्षण व सम्बन्धित उत्पादों के कच्चे माल को ज्यादा से ज्यादा पैदा करे ।  
    ’पर्यटन’ स्थानीय युवाओं व राज्य की आर्थिक के लिए वरदान साबित हो सकता है, भले उसके नियोजन के लिए सोच साफ हो ? उत्तराखण्ड की धरती प्रकृति प्रदत्त शौंदर्य से भरपूर है, यहॉ का हर क्षेत्र अपनें  विशेष तरह की बनावट और खुबसूरती के लिए जाना जाता है। लेकिन राज्य स्थापना के दो दशकों के बाद भी ये अभी भी प्रकृति प्रेमियों, सैलानियों से बहूत दूर हैं, राज्यवासियों व आम लोंगों को इन स्थानों के बारे में अभी पता ही नहीं है। जब तक पर्यटन और तीर्थाटन के लिए कोई ठोस नीति का निर्माण नहीं हो जाता तब तक न तो तीर्थाटन/पर्यटन सुविधाजनक होगा न ईको-फ्रेंडली। बार-बार कोर्ट को सरकार और लोंगों को नसीहत देंनीं पडेगी।  इसके अतिरिक्त राज्य के भीतर विशेष प्रकार की जडी-बूटियों का भंडार है, इसमें कुछ ऐसी भी जडी-बुटियॉ हैं, जिनसे असाध्य से असाध्य रोग भी ठीक हो सकते हैं, परन्तु इनकी समुचित खोज-खबर और उत्पादन बढानें के नाम पर सरकार मौंन है। सरकार की इस पहल (इन्वेस्टर्स समिट) से फिलवक्त ये उम्मीद तो लगाई ही, जा सकती है की उनके इन्वेस्टर्स राज्य में ऐसे उद्योगों की पहचान कर, नौजवानों को रोजगार के सुनहरे अवसर प्रदान करेंगें, और राज्य को आर्थिक शक्ति के रूप में विकसित करनें में अपना योगदान देंगें ।