उत्तराखण्ड विशेष : ये सडक है, सरकार है, की मानती नहीं ?

Publish 16-04-2019 22:12:02


उत्तराखण्ड विशेष : ये सडक है, सरकार है, की मानती नहीं ?

पैठाणी/गढ़वाल (देव कृष्ण थपलियाल):  लोक सभा चुनाव 2019 का मतदान राज्य में 11 अप्रैल को सम्पन्न हो गया, यद्यपि परिणाम आनें तक (23 मई को) यह देश के शेष भागों में (विभिन्न चरणों) में सम्पन्न होता रहेगा, लेकिन राज्य की जनता के अपनें हुक्मरानों का भाग्य मतपेटी में बंद कर अपना फैसला सूना दिया है ? इस चुनाव में जो बातें उठीं हैं उनमें काफी बातें काबिलेगौर हैं, पहली बात ये भी की पूरे चुनावकाल में जनता की उदासीनता और दूसरा मतदान प्रतिशत का गिरना। ये दोंनों चीजें किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए कतई शुभ नहीं कहीं जा सकती है ? किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को जीवित रखनें में ‘उसका जनमत’ उसके लिए प्राण की तरह काम करता है, जिस व्यवस्था में ’जन इच्छा’ न्यून अथवा ’नही’ के स्तर पर पहुँच रही हो, वह  निश्चित रूप खतरनाक स्थिति है ? इसके कारणों के पीछे राज्य की जनता का आम जनप्रतिनिधियों से भरोसा का उठना है, पिछले कई सालों से जिस तरह जनता को ‘सब्जाग’ दिखाकर राज्य की दोनों सियासी पार्टियों व उनके सदस्यों नें बारी-बारी से केद्र और सूबे की राजनीति में अपनें लिए जमीन तलाशी और सत्ता सुख भोगा, जिस काम के लिए जनता नें उन्हें उस मुकाम तक पहुँचाया था, उसे वे इस कदर भूल गये की वे वापस अपनें क्षेत्र की जनता की सूद लेंना भी भूल गये ? पिछली सरकार में गढवाल के एक सांसद एक दिन भी आम लोंगों से मिलनें नहीं पहुंचे  उनकी समस्याओं के निदान करना तो दूर की कौडी है, ऐंन चुनाव देख दूसरी पार्टी के टिकट पर अपनें बेटे को रण में उतार दिया ? इसी प्रकार उनके ही दल के अन्य चार सांसदों की कार्यशैली भी कोई खास उत्साह का संचार नहीं करती ? सूबे की पिछली सरकार में नेताओं नें मौका परस्ती के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिये थे । 18 मार्च 2016 को हरीश रावत के अपने ही बेगानें हो चले, अपनें लिए ’मुफीद’ कुर्सी की तलाश में भटके ये कॉग्रेसी अभी भी ’सलीके’ से भाजपाई नहीं बन पाये ? जन समस्याये  की बात करना तो इनके मानों कार्य क्षेत्र मे है ही नहीं ?  

देव कृष्ण थपलियाल

इसीलिए इस ’अविश्वास’ की  ’तह’ में जाना कोई मुश्किल काम नहीं है़ 18 साल के (राज्य) इस पर्वतीय क्षेत्र में अनेक कष्टों को झेला है, जिसकी परिणिति पृथक पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड  के रूप में हुई, अब उम्मीद थी, की इस धरती के बेटे इसके घावों को भरते, मरहम लगाते, लेकिन हुआ ठीक उल्टा ? ऐसी ही एक समस्या है, जिला गढवाल और चमोली सीमान्त क्षेत्र के निवासियों की जो बहुत पास होते हुऐ भी बहुत दूर हो जाते हैं।  
यों तो इस नये राज्य के कई अनुत्तरित, अनसुलझे सवाल हैं, जो इस पहाडी राज्य के आम जनमानस को गफलत में डाले हुए हैं, भला उनसे वे दिन कैसे भुलाये जा सकते हैं ? जब उन्होंने इस पहाडी इलाके को राज्य के रूप में पानें की जद्दोजहद में दिन-रात जान जोखिम में डाल कर सडको पर संघर्ष किया था, शायद ही कोई बीते दिनों के इन संघर्षों को भुल पाये ?क्या महिलाऐं क्या नौजवान, बच्चे,बुढे और बीमार, अपाहिजों नें नंगे पॉव, भुखे पेट रहकर, तत्कालीन केन्द्र और राज्य सरकारों के हर जुल्म को सहा और नये राज्य के सदियों पुरानें सपनें को साकार कर दिखाया। शायद इसलिए की हर मुमकिन मॉगों का समाधान हो सके, पहाड का जीवन खुशहाल हो सके। पहाड की भौगोलिक परिस्थितियॉ ही ऐसीं हैं कि चाहते हुए भी यहॉ का मानुष अपना विकास नही कर पा रहा था, तत्कालीन केद्र, और लखनऊ में बैठी सरकारों से तो यहॉ का दूःख-दर्द बॉटनें की उम्मीद करना ही बेकार था, मतलब साफ है ‘‘जो कॉटों में सोया ही न हो, उसे कॉटों का दर्द कैसे होगा‘‘ पहाड के जीवन मंे रचा-बसा व्यक्ति ही इन परिस्थितियों को महसुस कर सकता है, अर्थात पहाड का जनमानस ही समझ सकता है कि पहाड का जीवन हर पल संघर्ष की कहानी है,पानी के लिए संघर्ष,सडक,बिजली,स्कूल,अस्पताल,के लिए संघर्ष, यहॉ तक की जीवन यापन के लिए भी संघर्ष यहॉ की नियति है। इन्हीं सबके समाधान के लिए उसनें पृथक पहाडी राज्य का विकल्प चुना। जिसके लिए उसनें पूरे मन से संघर्ष किया,और जीत के बाद उन दुरूहताओं के छटनें के सपनें  देखने लगा।


लेकिन राज्य निर्माण के 18 वर्षों के बाद ही वह ठगा सा महसूस करनें लगा है, इस अंतराल में उसनें केवल सत्ता को बदलते हुए देखा, सत्ता की बंदरबॉट का नजारा देखा, कई-कई छुटभय्याओं से लेकर बडे-बडे नेताओं के सिर पर सजते ताज देखे। परन्तु आम आदमी का जीवन,जिनके लिए राज्य बना था, लगातार हासिये पर चला जाता रहा,और आम जनमानस टकटकी लगा देहरादून में बैठी रंग बदलती सरकारों की ओंर देखता रहा ? इस उम्मीद से की कभी इन हुक्मरानों की नजरें उनकी और भी इनायत होंगी ? शायद वह दिन अभी आया ही नहीं,जिन उद्देश्यों के लिए राज्य की स्थापना की गई थी, वो कहीं गुम से हो गये,लगते हैं। राज्य में ऐसे कई सवाल हैं,जो मन को कुरेदते हैं,ऐसा ही एक सवाल है, एक सडक का ? जो सुदूर पहाड में बसी जनता की तमाम कठनाईयोंको देखते हुए, अस्तित्व में तो आये वर्षों हो गये,लेकिन उस पर न तो कोई वाहन चलाये जाते हैं,नहीं उस सडक का ठीक ढंग से रखरखाव ही, इसीलिए निजी वाहन चालक भी,इस इस रोड पर बस चलानें से परहेज रख रहें है।


दरअसल हम बात कर रहें हैं, जनपद चमोली और गढवाल के सीमान्त क्षेत्रों को जोडनें वाले‘‘पैठाणी-गिंदोखाल-कर्णप्रयाग मोटर मार्ग‘‘ की, जिसे बने हुऐ वर्षों बीत चुके हैं,लेकिन सीमान्त क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों की लाख मांगो  के बावजूद भी इस मार्ग पर नियमित वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया,जिससे ग्रामीणों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड रहा है। पौडी जिले के विकासखण्ड थैलीसैंण की पट्टी कंडारस्यू व चमोली जिले की चॉदपूर पट्टी विकासखण्ड गैरसैंण के सीमान्त क्षेत्र के हजारों गॉवों के आपसी रिश्तेदारी और अन्य सामाजिक,व्यापारिक समंधों के चलते उनका एक-दूसरे के पास आना जाना स्वाभाविक हैं,जिसके लिए उन्हें कई-कई किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करना पडता है, जबकि दोंनो जनपदों के बीच में करीब चौदह से पद्रह किलोमीटर के आसपास भंयकर जंगल है,जहॉ खुंखार जानवरों का भय लगभग बना रहता है, लेकिन ग्रामीणों को यातायात की सुविधा के अभाव में जान जोखिम में डालकर पैदल ही निकलना पडता है। यह स्थिति लगभग तभी से बनी हुई है,जब से इस सडक का निर्माण किया गया है,जनता की वास्तविक कठनाई को मध्यनजर रखते हुए,तत्कालीन क्षेत्रीय विधायक व,उत्तर प्रदेश के पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री डा. शिवानंद नौटियाल के प्रयासों से दोनों जनपदों की जनता की जायज मॉग को स्वीकार करते हुए इस मार्ग का निर्माण कराया गया था,जिससे क्षेत्रीय जनता को काफी सहुलियतें प्राप्त हुई, तब इस मार्ग पर एक बस का संचालन भी नियमित रूप से होंने लगा था,जिसे तुरंन्त ही एक कुटील तर्क गढ कर ,की इस मार्ग पर सवारियों का नितांत अभाव है, बस का संचालन बंद कर दिया गया,जिससे क्षेत्रीय जनता में भारी अंसंतोष है। क्षेत्रीय ग्रामीणों का तर्क है कि यह महज एक साजिश है,क्योंकि अगर सवारियों का अभाव होता तो दोंनों जनपदों के शेष हिस्सों में इस सडक पर अनाप-शनाप तरीकों से चलाये जा रहे, टैक्सिया, मैक्स व टाटा सुमों जैसी छोटी गाडियों कैसे  चल रहीं है ? जबकि वास्तविकता यही है कि इन टैक्सी चालकों के ही दबाव में यहॉ बसों का संचालन नहीं किया जा रहा है। ग्राम प्रधान खण्ड मल्ला/तल्ला बताते हैं कि वे इस संदर्भ में वे कई बार शासन-प्रशासन से कई से पत्राचार कर चुके हैं। लेकिन कोई भी सकारात्मक कार्यवाही के संकेत नहीं मिले, नेता आते है, विज्ञापन व मॉगों को सुनते है, ओर फिर भूल जाते हैं ? सवारियों के अभाव का जहॉ तक तर्क है, हो सकता है कि तब की परिस्थितियों में ये बात सही भी हो,परन्तु वर्तमान में अपेक्षाकृत गुणात्मक रूप आबादी में इजाफा हुआ है, ग्रामीण बताते हैं कि इस समय हर सीजन में 20 से 25 शादियों जनपद चमोली और पौडी के नजदीकी गॉवों से की जा रहीं हैं, यानें रिश्ते बढनें से आवाजाही में भी वृद्वि हो रही हैं,जिससे आम लोंगो की दिक्कतें बढ रहीं हैं.


वहीं जानकारों का मानना है कि इस सडक पर नियमित बसों के संचालन के दूरगामी फायदे भी हैं। यात्राकाल में ऋषिकेश-कर्णप्रयाग मोटर मार्ग पर अत्यधिक दबाव बना रहता है,तब इस मार्ग का प्रयोग वन-वे के रूप में किया जा सकता है,वहीं बरसात के दिनों में  कलियासौड व अन्य स्थानों पर टूटने-दरकनें से सडक मार्ग के बाधित होंने के कारण भी इस मार्ग का उपयोग किया जा सकता है,मजबूत चट्टानों से गुजरते इस मोटर रोड पर घोर बरसात के दिनों में भी आज तक कोई फर्क नहीं पडा,जो इसकी मजबूती व ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद होंने का प्रमाण है। कोटद्वार से वाया पाबों,पैठाणी गिदोखाल होते हुए कर्णप्रयाग से बद्रीनाथ,केदारनाथ अपेक्षाकृत काफी सुगम है। कुछ लोग इस मार्ग को पर्यटन व तीर्थाटन की संभावनाओं से जोडकर भी देखते हैं, दरअसल यह मार्ग ज्यादातर सीमित आबादी वाला प्राकृतिक शौंदर्य से युक्त है दोंनों जनपदों के बीच चौदह किमी का सफर वीरान वनों से होकर गुजरता है,जहॉ किस्म-किस्म की प्रजाति के वृक्षों से आच्छादित है,जो किसी भी प्रकृति प्रेमी को अपनी और आकर्षित करनें के लिए काफी है,मार्ग के बीच में गिंदोखाल नामक स्थान है,काफी ऊचॉई पर है,जहॉ से हिमालय का नयनाविराम नजारा साफ दिखता है,खासकर मैदानी क्षेत्र के पर्यटकों के लिए तो यह दृश्य काफी यादगार साबित हो सकता है,किन्तु जरूरत है इसके सही नियोजन और इच्छा शक्ति की।उत्तराखण्ड का कुम्भ कहे जानी वाली ’नंदा राजजात’’ यात्रा का मुख्य केंद्र नौटी इसी मार्ग पर स्थित  है,यहॉ मॉ नंदा का शक्ति पीठ है,जिसके दर्शनों के लिए श्रृद्वालु गण देश-विदेश से आतें हैं,वही सडक दूसरी छोर पर पैठाणी कस्बे में स्थित राहू मंदिर भी देश का एक मात्र राहू देवता का मंदिर हैं,हालांकि इसको सही प्रचार-प्रसार के अभाव में प्रसिद्वि नहीं मिल पाई,लेकिन थोडी कोशिश करनें पर भविष्य में इसे भी भव्यता और प्रसिद्वि मिल सकती है। स्थानीय स्तर पर तो लोग नियमित रूप से राहू मंदिर के दर्शनों का लाभ उठाते हीं हैं, अगर इस सडक मार्ग को दुरूस्त किया जाता है,तो तीर्थाटन के इच्छुक श्रृद्वालुओं को गति मिलेगी। जिससे स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार तो मिलेगा ही साथ ही नगदी फसलें आलू व दालों जैसे उत्पादों के  लिए बाजार भी उपलब्ध हो जायेगा।
निश्चित रूप इस मोटर मार्ग पर नियमित रूप से वाहनों की आवाजाही व सडक के व्यवस्थित हो जानें से सीमान्त क्षेत्र की गरीब जनता को राहत मिलेगी ही,वहीं दोंनों ओर की जनता के आदान-प्रदान में भी सुगमता होगी। सुविधाओं के साथ-साथ तीर्थाटन और पर्यटन से क्षेत्रीय ग्रामीणों के लिए रोजगार के सुनहरे अवसरों के द्वार भी खुलेंगें। लेकिन राजनीति इच्छा शक्ति इस ओंर ध्यान दे तो ?

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