महिला दिवस : मेरा अस्तित्व - स्त्री

Publish 06-03-2019 21:46:10


महिला दिवस : मेरा अस्तित्व - स्त्री

उज्जैन (रूचि दुबे ):  यकीनन बेटों से ज्यादा प्यार बेटी के हिस्से में आता है, और उतनी ही ज्यादा जिम्मेदारी भी आ जाती है। घर के हर एक सदस्य का ख्याल रखना अपने आप आ जाता है। हंसते खेलते बचपन के दिन कब निकलते हैं पता ही नहीं चलता जैसे - जैसे बेटी बड़ी होती है, उसको सबसे बोलना सीखा दिया जाता है, कब बोलना है? कैसे बोलना है? किससे नहीं बोलना है। सब कुछ... और उससे अपनी सुरक्षा करना सिखा दिया जाता है, और सीखाया जाना चाहिए। आज के वक्त में अहम है। वक्त के हिसाब से ढलना सबसे जरूरी होता है।  फिर धीरे - धीरे रसोई के काम भी सीखा दिए जाते हैं, क्योंकि लड़कियों को किसी और के घर जाना है। हर काम में दक्ष कर दिया जाता है।  और इस उम्र में सबसी बड़ी जिम्मेदारी या दायित्व ये होता है, कि कहीं उसकी वजह से या वो कुछ ऐसा ना करे जिससे उसके परिवार की इज्जत पर आंच आ जाए, जो जिम्मेदारी बहुत जरूरी है। पढ़ाई घर के साथ साथ उसको अपने भविष्य के लिए भी तैयार रहना होता है, क्योंकि किसी का भविष्य किसी ने नहीं देखा। वह सबके बारे में सोच कर भी चलती हैं, और अपने सपने पूरे करने के लिए संघर्ष भी करती है। संतुलन बना कर चलना होता है।


हर स्त्री की पहली पहचान उसके पिता के नाम से होती है, और शादी के बाद पति के नाम से पहचान होती है। इस बात से खुशी होती है, कि जो जिंदगी में सबसे अहम व्यक्ति है, उनसे हमारी पहचान है। पर मेरा मानना है, कि महिलाओं का अस्तित्व पिता और पति के नाम में ही खत्म न हो बल्कि उसकी खुद का भी कुछ अस्तित्व होना चाहिए। हर किसी को उसके नाम, उसके काम, उसके हुनर से पहचाना जा सके। क्योंकि सब को हक है अपना अस्तित्व को उभारने का...  हम क्या करते हैं?? हम क्या है?? वो हमारी पहचान हो हम किसी और के अस्तित्व में खुद की तलाश क्यों करें? क्यों ना हम से किसी की पहचान हो, ना की किसी से मेरी पहचान हो... " खुद की तलाश में निकलो कभी . लगने लगेगा, वाकई खूबसूरत है जिंदगी" हाँ, हर महिला के लिए उसका घर, परिवार, पति, बच्चे सबसे जरूरी होते है, वो उनके लिए जितनी सहज होती है, उनके लिए उतनी ही मजबूती से खड़ी भी रहती है, चाहे परिस्थिति जो हो । जितना वो उनके मायके के लिए लगाव रखती है, उससे कई ज्यादा अपने ससुराल वालों के लिए समर्पित होती है। जो छोटे - छोटे दुख से डरती है, वहीं विपरीत स्थिति में संघर्ष करती है।


स्त्री वह शक्ति है, जिनके बिना शिव भी अधूरे हैं। जन्म से लेकर मृत्यु , धर्म से लेकर कर्म स्त्री के बिना एक पुरुष का अस्तित्व अधूरा होता है। हम खुद अपने लिए खास होते हैं क्योंकि हमारे खुश रहने से ही हमारा परिवार खुश रहता है। शायद आपकी मुस्कान उन सब के लिए जरूरी है जो आपकी जिंदगी के अहम हिस्से है।  कभी कभार हम सबको समझते समझते कभी खुद को समझने की कोशिश तक नहीं कर पाते हैं । क्योंकि हमारे लिए तब सबकी खुशी का ध्यान होता है। अपनी अहमियत कहाँ होती है यह तक भूल जाते हैं। कहते हैं महिलाओं को समझना मुश्किल है पर हकीकत यह है समझाना आसान है, पर स्वीकार कर पाना मुश्किल है।"माँ, बहन, प्रेमिका,पत्नी, बेटी, बहू" हर रूप में महिला ही साथ होती है।  हर महिला खूबसूरती की मूरत हो यह नहीं हो सकता, खूबसूरती से किसी की पहचान हो ये जरूरी नहीं है, आप जैसे है जो है अपने आप में सही है। क्योंकि ये आप है। क्यों किसी की नजर के लिए मैं खुद बदलूं...  किसी और के लिए खुद को बदल देना, मैं नहीं मानती सही है। ना आप जैसा कोई है ना हो सकता है, यह हकीकत स्वीकार कर सकना जरूरी है हम उस दुनिया के लिए दिखावा क्यों करे जो सिर्फ मतलबी है, खुश रहे, आपकी मुस्कान असली हो। असल में दिखावे की दुनिया में जीना आसान है पर हकीकत अपना पाना  मुश्किल है पर, आवश्यक है। खुद में इतना आत्मविश्वास में रखे कि कभी रंग, रूप कभी आपके लिए ना मायने रखे।  हर नजर को पहचान पाना हर महिला की ताकत या फितरत में होता है, कोई उन्हें किन नजरों से देख रहा है?? उसके नजरें कैसी है?? कोई महिलाओं को दूर से भी घूर रहा हो तो इस बात का अहसास बहुत जल्दी हो जाता है। आज की महिला वो है जो अपना जीवन अकेले अपने दम पर निकाल सकती है, एक अकेली माँ भी हो तो वो अपने बच्चों को बेहतर और सुरक्षित भविष्य दे सकती है।

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