गैरसैंण गैर नहीं : ...सरकार और संगठन में गैरसैंण युद्ध

Publish 26-11-2018 20:52:07


गैरसैंण गैर नहीं : ...सरकार और संगठन में गैरसैंण युद्ध

गैरसैण/देहरादून(प्रदीप रावत "रवांल्टा"):   भाजपा का विरोधी दल भले ही कांग्रेस हो, लेकिन फिलहाल भाजपा सरकार और संगठन ही एक दूसरे के विरोधी नजर आ रहे हैं। गैरसैंण ऐसा मसला है, जिस पर राजनीतिक दलों ने हमेशा से उत्तराखंड को छला है। कांग्रेस ने विधानसभा भवन बनाकर एक शुरूआत की। भाजपा ने भी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए दो सत्र गैरसैंण में कराए। इस बीच भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने बयान दिया कि वे सरकार के फैसले का स्वागत करते हैं कि उन्होंने गैरसैंण में सत्र नहीं बुलाया। इस बयान पर सीएम त्रिवेंद्र सिं हरावत ने अब पलटवार किया है। पटलवार जोरदार है जरूर है, पर डर इस बात का है कि कहीं उनके पलटवार की बुनियाद कमजोर ना हो। कहीं, ऐसा ना हो कि इस बयान की बुनियाद भी बदल दी जाए...? जैसे अजय भट्ट के बयान बदल गए।
सरकार और संगठन में गैरसैंण युद्ध छिड़ गया है। गैरसैंण युद्ध के कई मायने हैं। पहली बात ये है कि अजय भट्ट के बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। पहला यह कि वो नहीं चाहते कि गैरसैंण राजधानी बने। इसको लेकर उन्होंने सफाई भी दी वो ऐसा गैरसैंण चाहते हैं, जो फिट हो। लेकिन, उन्होंने कुछ बेतुकी बातें भी कहीं कि वहां जोने से नेताओं को ठंड लगती है। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष का नाम भी लिया। इससे यह माना जा रहा है कि नेताओं की एक लौबी गैरसैंण को राजधानी नहीं बनाना चाहती। अगर ऐसा है, तो बेहद चिंता की बात है और ऐसे नेताओं को राज्य से तड़ीपार कर दिया जाना चाहिए।
सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि गैरसैंण में सत्र कराना है या नहीं। यह पूरी तरह सरकार का काम है। यह सरकार तय करेगी। इस बयान को अजट भट्ट के बयान का जवाब माना जा रहा है। एक तीर से दो निशाने वाला बयान भी कहा जा सकता है। सीएम की जो भी मंशा हो, लेकिन बयान से उन्होंने यह जताने का प्रयास किया है कि वो गैरसैंण को लेकर गंभीर हैं। उन पर एक पुस्तक भी छपी है, जिसका शीर्षक खैरासैंण का सूरज है। इसी से एक सवाल है क्या वास्तव में खैरासैंण का सूरज चमकेगा...? खैरासैंण से रौशनी भरारीसैंण तक भी पहुंचेगी।
इस बात की खुशी है कि नेताओं ने अपनी जुबान तो खोली है। नेताओं की जुबान खुलते ही प्रदीप सती, मोहित डिमरी जैसे जुवाओं से लेकर इंद्रेश मैखुरी और रुपेश कुमार सिंह जैसे गंभीर चिंतक और तमामा आंदोलनकारी भी सचेत हो गए हैं। होना भी चाहिए। नेताओं के इस तरह के बयान चिंतत तो करते ही हैं। ये इस तरह के गिरगिट हैं, जो किसी भी पल रंग बदल सकते हैं। फिलहाल एक ही दल में सरकार और संगठन में ठनी है। हम तो चाहते हैं कि हर दल, हर घर, हर संगठन में ऐसे दो धड़े बन जाएं, जो राजनीधानी गैरसैंण की चर्चा करें। इस तरह के विवाद और चर्चाओं से गैरसैंण के आंदोलन को जुबान मिलेगी और उस जुबान को आम जन की जुबान बनाने का आंदोलन उसी गति से आगे बढ़ेगा। उम्मीद करते हैं...गैरसैंण गैर नहीं रहेगा।

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