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जाने मशरूम गर्ल दिव्या रावत पर बने गीत मशरूमया बाँद के गीतकार अभिषेक सेमवाल व संगीतकार पंकज सरियाल के बारे में

13-11-2018 22:27:44

देहरादून (अवनीश कुमार)| उत्तराखंड की मशरूम गर्ल दिव्या रावत पर बने गीत मशरूमया बाँद के बाद चर्चाओ में आने वाले संगीतकार पंकज सरियाल का यह गाना गाना अपने आप में रोचक है | एक इंजिनियर से संगीतकार की जिन्दगी भी पंकज की किसी फ़िल्मी कहानी से कम नही है |

पंकज सरियाल

मशरूमया बाँद के संगीतकार पंकज सरियाल का जन्म देवभूमि उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल केग्राम जाख चौरा में राजेन्द्र सिंह सरियाल के यहाँ हुआ |पंकज सरियाल कि माता का नाम सुशीला देवी है पंकज की प्राथमिक शिक्षा  सरस्वती विध्या मंदिर , कोटि कॉलोनी, विश्वकर्मा पुरम, टिहरी गढ़वाल. एवं स्नातक- Automobile Engineering ( ग्राफ़िक एरा यूनिवर्सिटी, देहरादून)से सम्पन्न हुई | पंकज ने अपने संगीत गुरु- पंडित श्री मुरलीधर जगूडी  जोगिवाला, देहरादून के सानिध्य में  संगीत - प्रभाकर की शिक्षा  प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद से  ली | पंकज को संगीत बचपन से पसंद था , गढ़रत्न श्री नरेन्द्र सिंह नेगी जी कि गीत सुनकर बड़े हुए हम तो गढ़वाली संगीत से जुड़ाव भी बहुत था, अपनी मात्रभाषा गढ़वाली से भी बहुत लगाव है परंतु शर्मीला स्वभाव होने कि कारण कभी स्कूल  में नहीं गा पाया और ना ही कभी परफ़ॉर्म किया, स्टेज पर्फ़ॉर्मन्स से बहुत घबराता था पंकज |


एसकेजी न्यूज़ से बात करते हुए पंकज बताते है कि वह बचपन से ही पढ़ाई में अच्छा था तो मेरे माता पिता चाहते थे कि उनका बेटा इंजिनियर बने क्यूँकि हमारे समाज  की ये धारणा है कि सफलता , सम्मान , पैसा और अच्छी ज़िंदगी या तो इंजीनियर  की होती है या तो डॉक्टर  की.  फिर इंटरमीडिएट करने कि बाद एक दिन मेरी मुलाक़ात मेरी एक कज़िन सिस्टर भारती रावत से हुई और इस मुलाक़ात से मेरी ज़िंदगी को नयी दिशा मिली।।भारती रावत ख़ुद एक बहुत अच्छी गायिका हैं, तो भारती ने मुझे बताया कि वो देहरादून में भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा पंडित श्री मुरलीधर जगूडी जी से सीखती हैं. तब मुझे पता चला की इन्डियन क्लासिकल म्यूजिक  भी कुछ होता है और सीखा जाता है. तो फिर मुझे विचार आया कि मैं देहरदुन  जाऊँगा, और बीएससी  में एडमिशन  लेकर साथ में गुरुजी से संगीत सीखूंगा. लेकिन ये संगीत सीखने का विचार मैंने अपने माता पिता को नहीं बताया क्योंकि मुझे पता था उन्हें ये पसंद नहीं आएगा इसलिए मैंने सिर्फ़ पापा से ये कहा कि मैं देहरादून से बीएससी  करूँगा. लेकिन पापा चाहते थे कि मैं इंजीनियरिंग  ही करूँ इसीलिए माता पिता की ख़ुशी के लिए मैंने 2010 में ग्राफिक ऐरा यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया.और फिर बिना माता पिता को बताए संगीत सीखना शुरू कर दिया और यहाँ से मेरे संगीत का सफ़र शुरू हुआ. फिर इसी तरह मैं चोरी छिपे संगीत सीखता रहा .और साथ ही साथ में गुरूजी ने मुझे संगीत की परीक्षा देने की सलाह दी और इसी तरह मैंने संगीत में डिप्लोमा भी कर लिया.

पंकज सरियाल ने बताया कि ग्राफिक ऐरा यूनिवर्सिटी का बहुत बड़ा योगदान रहा मेरे संगीत जीवन में क्योंकि ग्राफिक ऐरा के कल्चरल फेस्ट से ही मैंने स्टेज परफॉर्मेंस देनी शुरू की और ग्राफ़िक ऐरा के माध्यम से ही कई सिंगिंग कॉम्पिटिशन उसमें पार्टिसिपेट किया और इसी वजह से मेरे अंदर आत्मविश्वास पैदा हुआ कि मैं संगीत में कुछ अच्छा कर सकता हूँ और उसी दौरान मैंने निर्णय लिया कि मैं अपना करियर संगीत क्षेत्र में ही बनाऊँगा हालाँकि इस बारे में मैंने अपने माता पिता से कभी शेयर नहीं किया .


कॉलेज से इंजीनियरिंग कम्पलीट होने के बाद मैंने कुछ टाइम इंजीनियरिंग फ़ील्ड में जॉब की और सोचा कि मैं जॉब के साथ संगीत सीखता रहूँगा लेकिन मैं जॉब के साथ संगीत को टाइम नहीं दे पाया. और एक समय ऐसा आया जब उस टाइम के लिए संगीत छूट गया और मैं जॉब में बिज़ी हो गया लेकिन मैं जॉब से कभी ख़ुश नहीं था और एक दिन मुझे एहसास हुआ कि मैं ग़लत रास्ते पे हूँ.  फिर एक दिन मैंने जॉब छोड़ने का निर्णय लिया और घर आ गया फिर बड़ी हिम्मत से मैंने  माता पिता को बताया कि मैंने जॉब छोड़ दी है क्योंकि मैं जॉब से बिलकुल भी ख़ुश नहीं था और मैंने कहा कि मैं संगीत में अपना भविष्य बनाना चाहता हूँ ये सुनके पापा थोड़े चुप रहे और फिर उन्होंने कहा कि ठीक है बेटा जो तुम्हें अच्छा लगता है तुम वही करो ये सुनके मैं बहुत ख़ुश हुआ | फिर मैंने संगीत सीखना फिर से स्टार्ट कर दिया और फुलटाइम संगीत सीखने लगा और मैं अपने माता पिता का तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने मुझे इतना सपोर्ट इतना प्यार दिया है .

पंकज ने बताया कि वह अपने गुरुजी पंडित मुरलीधर जगूडी जी से  बहुत प्रभावित है  “गुरु “ शब्द के वास्तविक अर्थ को हमारे गुरुजी प्रदर्शित करते हैं. बेहद सरल और सौम्य स्वभाव के व्यक्तित्व हमारे गुरुजी  हर पल अपने शिष्यों के भविष्य के लिए समर्पित रहते हैं.  गुरुजी ने अपना पूरा जीवन संगीत साधना में समर्पित कर दिया. मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ जो मुझे गुरुजी का स्नेह और आशीर्वाद मिला.  गुरुजी के मार्गदर्शन और आशीर्वाद से ही मैं अपना पहला गीत “मशरूमया बाँद” बना पाया . उनके इस अतुल्य स्नेह और मार्गदर्शन के लिए मैं हमेशा गुरुजी का आभारी रहूँगा।

जाने मशरूम गर्ल दिव्या रावत पर लिखे गीत मशरूमया बाँद के गीतकार अभिषेक सेमवाल के बारे में
देहरादून |
अब जब पंकज के बारे में इतना जान चुके हो तो मशरूमया बाँद के गीतकार व पंकज के गुरुभाई यानी संगीत गुरु  पंडित श्री मुरलीधर जगूडी के शिष्य अभिषेक सेमवाल का जन्म भी टिहरी गढ़वाल के गाँव- थाती कठूर बूधकेदार के रचेंद्र दत्त सेमवालके यहाँ हुआ और अभिषेक वर्तमान में  म्यूज़िक टीचर ( lovedale academy, देहरादून में जॉब कर रहे है

अभिषेक सेमवाल

अभिषेक बताते है है कि  नई चीज़ को अपनाना अच्छा होता है लेकिन पुरानी चीज़ों को छोड़ देना अच्छी बात नहीं होती मेरे गुरु भाई पंकज सरियाल ने मुझसे अपने विचार रखे थे कि हम कितनी आसानी से गाँव को वहाँ के रीति रिवाज़ों को छोड़ देते हैं और शहर के माहौल में बड़ी जल्दी रंग जाते हैं तो उन्हीं दिनों हमें पता चला कि कुमारी दिव्या रावत जी नाम की एक शख़्सियत जो शहर में रह कर गांवों के लिए अपना लगाव नहीं छोड़ पाई और अपनी मेहनत और सोच से एक मिसाल बनी थी कि गांवों  के लिए कुछ करके भी संतुष्टि, नाम ,सम्मान पाया जा सकता है और वे आज उत्तराखंड की ब्राण्ड अंबेसडर के तौर पर पूरे देशकी ही नहीं बल्कि विश्व में अपना और अपने गाँव का नाम रोशन कर रही है बस पंकज भैय्या और मैं उनका धन्यवाद करना चाहते थे कि वे गाँव के लिए इतनी कम उम्र में भी इतना बड़ा योगदान कर रही हैं तो लगा क्यों ना गुरूजी की सिखायी गई कला संगीत के माध्यम से धन्यवाद किया जाए तो यह एक कोशिश थी मेरी क़लम और पंकज भैय्या कि आवाज़ और भाव की , कि दिव्या रावत जी के कार्यों को सराहा जाए.