’केदारनाथ’ से उजागर हुआ भाजपा का ’हिन्दू प्रेम’

Publish 15-12-2018 19:17:13


’केदारनाथ’ से उजागर हुआ भाजपा का ’हिन्दू प्रेम’

पैठाणी/गढ़वाल /देवभूमि उत्तराखण्ड (देव कृष्ण थपलियाल ):  ’केदारनाथ’! धाम, जी नही, हम तो ’ए गॉय इन द स्काई पिक्चर्स’ के बैनर तले निर्देशक अभिषेक कपूर द्वारा बनाई गई फिल्म ’केदारनाथ’ की चर्चा कर रहे हैं। यह माह दिसम्बर के सात तारीख को देशभर के सभी प्रमुख सिनेमाघरों में एक साथ रिलीज हो गई, उत्तराखण्ड में वैसे तो ज्यादा सिनेमा हॉल नहीं हैं, परन्तु कुछ शहर-कस्बों में शेष बचे-खुचे सिनेमा हॉल में यह फिल्म नहीं चलाई गई ? यह ’रोक’ स्वयं सरकार द्वारा लगाई गई थी। लोंगों में इस फिल्म को लेकर गुस्सा और संशय है। फिल्म के ’टाईटिल’ स्क्रिप्ट और शूटिंग में भारी असमानता को लेकर सरकार और आम जनमानस में यह भय घर कर गया था, की फिल्म चलनें से राज्य में तोडफोड, अशांति व हिंसा भडक सकती है ? लिहाजा सरकार नें एक कमेटी गठित कर समीक्षा के बाद यह त्वरित निर्णय, जिला अधिकारियों पर छोड दिया, की वे परिस्थितियों के अनुकूल निर्णय लें ? जिसका नतीजा यह हुआ की राज्य के किसी भी सिनेंमा हॉल में यह फिल्म नही चलाई गई ? फिल्म न दिखाये जाने के पीछे अपनें कुछ तर्क हैं, जो काबिलेगैंर हैं ?
 उत्तराखण्ड में स्थित रूद्रप्रयाग जनपद के पवित्र हिमालय की गोद में बसा ’केदारनाथ धाम’ हिन्दुओं के आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित, प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में से एक है, यह सदियों हिन्दुओं के आस्था केन्द्र है, यह चार प्रमुख धामों के अलावा बारह ज्योर्तिलिंगों में प्रमुख स्थान रखता है, यहॉ हर साल देश-विदेश के करोडों हिन्दु धर्मावलम्बी दर्शनों के लिए पहुँचते  हैं, यह भक्तों की आस्था का ही प्रतिफल है, की इतनी दुरूह भौगोलिक पस्थितियों के चलते भी देश के अति सुविधा सम्पन्न लोग, आरामदेह जीवनशैली के आदि लोग भी पैदल ही बाबा के दर पर पहुँचते  हैं। इसीलिए फिल्म के ’टाइटिल’ को लेकर आम लोंगों में खासकर ’हिन्दु समाज’ के आस्थावान लोग में इस फिल्म को लेकर ज्यादा उत्सुकता इसलिए थी, की फिल्मकार नें बाबा भोलेनाथ के महान् चरित्र, गुणों और कर्मों का बखान बहुत ही रोचकता, वैज्ञानिकता व कलात्मक ढंग से संजोकर फिल्म का निर्माण किया होगा ? हिमालय के नैसर्गिक ऑचल में बसे होंनें के कारण यहॉ का प्राकृतिक दृश्य फिल्म में जीवन्त हो उठेगा ? जिन भक्तों को केदारनाथ धाम आनें का मौका न मिल पाया हो, उन्हें फिल्म से वह सब कुछ मिलेगा, जिसे भक्तगण  केदारनाथ धाम जाकर निहारते हुए महसुस करते हैं। आम लोंगों नें इसी प्रत्याषा में ही यह फिल्म देखी ? लेकिन यह सब सोचनें-निहारनें की प्रत्याषा में सिनेमा हॉल बैठे लोंगों को सिवाय निराश के कुछ हासिल नही हुआ ?
बल्कि फिल्म का ’सेकुलर’ का तडका लगानें के फेर में अभिषेक कपूर यह भी भूल गये की फिल्म स्थल/नाम करोडों हिन्दुओं आस्थाओं से जुडा है, इस लिहाज से बेहद संवेदनशील है, जहा आज देश की राजनीति में जाति, धर्म और संप्रदाय के आधार पर लोगों के बीच वैमनस्य फैलाया जा रहा है, उस हिसाब से यहॉ हल्की और सस्ती लोकप्रियता हासिल करनें वाली बंबईया फिल्म का निर्माण करना किसी भी दृष्टि से उपयुक्त नहीं है, बजाय कपूर नें इसी फार्मूले को यहॉ अप्लाई कर, क्षेत्र और आस्थावान लोंगों की भावनाओं को  चोट पहॅुचाई है, फिल्म की कहानीं, जिस तरह से सूट की गई है, वह कहीं से भी फिट नहीं बैठती है, इस क्षेत्र में घोडे-खच्चर चलानें वाले आमतौर से इसी क्षेत्र के गरीब निवासी  होते हैं, जिनके पास इस तरह के कामों के लिए कोई जगह नहीं होती, दूसरे समुदाय के लोग इस काम में यहॉ नहीं आते हैं। उत्तराखण्ड के किसी भी मंदिर का पूजारी (ब्राह्मण) अपनीं बडी बेटी के मंगेतर की शादी (उसकी इच्छानुसार) दूसरी (छोटी) बेटी के साथ हरगिज नहीं करा सकता ? सगाई को आमतौर से आधी शादी मानी जाती है। यह यहॉ की परम्परा, संस्कृति और संस्कारों से बिल्कूल भिन्न है। फिल्म में कितनें ऐसे दृश्य हैं, जो इस पहाडी राज्य की स्थानीय मान्यताओं, परम्पराओं रीति-रिवाजों से तो बिल्कुल भी मेल नहीं खाते, अपितू हिन्दु धर्म से भी दूर तक भी उसका कोई नाता नहीं है ? फिल्मांकन स्थल केदारनाथ धाम, त्रियुगीनारायण, चोपता, दुगलविट्टा, गौरीकुंड जैसे स्थान प्राकृतिक खुबसूरती के कारण भले पर्यटकों को लुभा सकते हैं, परन्तु हमारी मान्यताओं के लिहाज से ये जगहें देवी-देवताओं के निवास स्थान हैं, लिहाजा इनके प्रति हमारा भाव पूजनीय हो  है।
उम्मीद थी की 14-15 जून 2013 में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के कारण केदारनाथ धाम व उसके आसपास के इलाके में जनधन की बडी मात्रा में क्षति हुई थी, जिसका सबसे बडा कारण इस हिमालयी क्षेत्र में मनुष्यों द्वारा अपनीं सुख-सुविधाओं के विस्तारीकरण के लिए प्राकृतिक संपदा का दोहन बडी तेजी से किया जा रहा है। आम लोग भी यहॉ दर्शनों से ज्यादा सैरसपाटे और पिकनिक के लिए चले आते हैं, इनकी सुख-सुविधाओं और पैसे कमानें की खातिर यहॉ बडी-बडी इमारतों-भवनों का निर्माण किया जा रहा है, जिससे इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी को लगातार खतरा उत्पन्न कर रहा है। असल बात यह है, फिल्मकार नें त्रासदी का जिक्र तो है परन्तु उसके कारणों पर मौंन धारण कर लिया। यहॉ अपनें कामभर के लिए इस त्रासदी का किया गया है ? यह एक तरह से लोंगों को गुमराह करना अथवा तथ्यों को छुपानें जैसा है ?
 अब सरकार नें ’फिल्म’ को पूरे राज्य में प्रतिबन्ध कर दिया है, इसका कारण भी स्पष्ट है, एक सरकार को आशंका थी कि फिल्म ’लव जेहाद’ को प्रश्रय दे रही थी, वही दूसरी ओंर यहॉ के सामाजिक, सॉस्कृतिक तानें-बानें को नुकसान पहुंचा रही थी ? यह स्वीकरोक्ति सरकार में पर्यटन व संस्कृति मंत्री श्री सतपाल महाराज द्वारा भी की गई है। फिर यह उस त्रासदी को स्मरण करा रही है, जहॉ लोगों को इस त्रासदी के कारण अपनों को खोंना पडा, वे सैकडों-हजारों परिवार आज भी इस घटना को विस्मृत नहीं करा पा रहे हैं ? कॉग्रेस के क्षेत्रीय (केदारनाथ) से विधायक मनोज रावत नें सरकार पर अरोप लगाते हुए कहा है, कि सरकार इस फिल्म पर प्रतिबन्ध के नाम पर ’प्रचारित’ कर रही है, अगर सरकार इस बात को लेकर इतनीं संवेदनशील थी तो स्वीकृति देंनें पहले ही इस पर विचार होंना चाहिए था, यहॉ के पवित्रम स्थलों पर फिल्म शूटिंग हो रही थी और सरकार सब कुछ देख रही थी, कहॉ, ’लव जेहाद’ चल रहा है, और फिल्म को कैसे शूट की जा रहा है ? उस समय सरकार चुप क्यों रही ?
भारतीय जनता पार्टी हिन्दु हितों और मान्यताओं की बात करती आ रही है, परन्तु इस फिल्म के सामनें आनें पर उसका असली चेहरा सामनें आ गया है ? फिल्म की शूटिंग से पहले सरकार द्वारा स्वीकृति ली गई थी, बजाय फिल्म की शूटिंग कोई बंद कमरे में नहीं हुई, बकौल स्थानीय विधायक मनोज रावत केदारनाथ धाम, त्रियुगीनारायण, चोपता, दुगलविट्टा, गौरीकुंड जैसे धार्मिक दृष्टि से पवित्र स्थलों की गोद में जब ’लव जेहाद’ के दृश्य फिल्माये जा रहे थे तो स्थानीय प्रशासन और सरकार कहॉ सोई थी ? स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक नें इसे ’कवर’ किया था ? अच्छा होता इन खबरों की समय से सूद ले ली गई होती तो इस फिल्म को राज्य में ’प्रतिबंन्धित’ नहीं किया जाता, और नहीं भाजपा सरकार पर इसे प्रचारित करनें का आरोप लगाया जाता ?
 फिल्म ‘केदारनाथ’ की कथावस्तु बेहद हल्की और बंबईया तर्ज पर है, जिसे हम सैकडों फिल्मों और धारावाहिको में हर रोज देखते हैं, अभिषेक कपूर इस फिल्म को देश के किसी अन्य स्थान पर दूसरे ’टाईटल’ से भी बना सकते थे, वे मुंबई से केदारनाथ जैसे पवित्र और करोडों लोंगों की आस्थाओं के केन्द्र पर आयें तो उन्हें उच्च स्तरीय और गरिमामय  फिल्म का निर्माण करना चाहिए था ?    

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